पिड़िया कला के संरक्षण और विकास पर जोर

पटना,15 जुलाई। रविवार को राजधानी पटना में भोजपुरी चित्रकला और बिहार की पारंपरिक लोककलाओं को केंद्र में रखकर दो महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किए गए। अवसर था नाबार्ड के 45वें स्थापना दिवस का। इस अवसर पर बिहार की उन तीन पारंपरिक कलाओं पर विशेष चर्चा हुई, जिन्हें नाबार्ड के सहयोग से जीआई (Geographical Indication) टैग प्राप्त हुआ है। इनमें भोजपुरी अंचल की पिड़िया कला, नालंदा की बावन बूटी तथा गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला शामिल हैं।




कार्यक्रम में सबसे अधिक चर्चा भोजपुरी क्षेत्र की पिड़िया कला को लेकर हुई। सर्जना न्यास के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ चित्रकार संजीव सिन्हा ने पिड़िया कला के इतिहास से लेकर जीआई टैग मिलने तक की पूरी यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस पूरी प्रक्रिया में नाबार्ड की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विशेष रूप से नाबार्ड के तत्कालीन जिला विकास प्रबंधक (डीडीएम) रणजीत सिन्हा तथा नाबार्ड के अन्य अधिकारियों के सहयोग, मार्गदर्शन और संवेदनशील पहल के कारण आज यह ऐतिहासिक उपलब्धि संभव हो सकी। उन्होंने इसके लिए कलाकारों, नाबार्ड, बिहारवासियों और भोजपुरी भाषा-भाषियों को बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।

कार्यक्रम में नाबार्ड के पूर्व डीडीएम रणजीत सिन्हा ने कहा कि जीआई टैग केवल किसी कला की पहचान नहीं, बल्कि उसे कानूनी संरक्षण और आर्थिक अवसर भी प्रदान करता है। उन्होंने भोजपुरी चित्रकला से जुड़े कलाकारों और संस्थाओं से अपील की कि वे सर्जना न्यास के साथ संगठित होकर कार्य करें, ताकि उन्हें जीआई टैग से मिलने वाले संरक्षण और अन्य लाभों का पूरा फायदा मिल सके।

शाम के सत्र में फोकार्टोपीडिया फाउंडेशन द्वारा “टिकुली और भोजपुरी पेंटिंग की चुनौतियां” विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई। बिहार की लोककलाओं और रचनात्मक अर्थव्यवस्था पर कार्य कर रही इस संस्था की बैठक में टिकुली पेंटिंग और भोजपुरी चित्रकला के समक्ष मौजूद वर्तमान चुनौतियों पर गंभीर विमर्श हुआ।

इस अवसर पर पद्मश्री अशोक कुमार विश्वास ने टिकुली पेंटिंग की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि व्यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद गांवों में कलाकारों के प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त सरकारी सहयोग नहीं मिल पा रहा है। प्रशिक्षण के अभाव में इस कला के माध्यम से रोजगार सृजन की संभावनाएं भी प्रभावित हो रही हैं।

वहीं वरिष्ठ चित्रकार संजीव सिन्हा ने कहा कि भोजपुरी पेंटिंग पर अभी और व्यापक शोध तथा गंभीर कार्य की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती इसके मूल स्वरूप और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए समकालीन विषयों को इससे जोड़ना है, ताकि यह कला आने वाली पीढ़ियों के बीच भी प्रासंगिक बनी रहे।

कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध कला लेखक एवं नाटककार अनीश अंकुर ने किया।

पटना में गूंजा भोजपुरी चित्रकला का रंग, ‘पिड़िया कला’ बनी चर्चा का केंद्र

पटना,15 जुलाई। राजधानी पटना में रविवार का दिन भोजपुरी लोककला और उसकी विरासत के नाम रहा। एक ओर नाबार्ड के 45वें स्थापना दिवस पर बिहार की जीआई टैग प्राप्त पारंपरिक कलाओं की उपलब्धियों का जश्न मनाया गया, तो दूसरी ओर भोजपुरी चित्रकला और टिकुली पेंटिंग के भविष्य को लेकर गंभीर मंथन भी हुआ।

नाबार्ड के स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में बिहार की तीन जीआई टैग प्राप्त कलाओं, भोजपुरी अंचल की पिड़िया कला, नालंदा की बावन बूटी और गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला को विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया। हालांकि पूरे आयोजन में सबसे अधिक आकर्षण और चर्चा का केंद्र भोजपुरी पिड़िया कला रही।

सर्जना न्यास के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ चित्रकार संजीव सिन्हा ने पिड़िया कला की ऐतिहासिक यात्रा, उसके सांस्कृतिक महत्व और जीआई टैग तक पहुंचने की कहानी साझा की। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि वर्षों की मेहनत का परिणाम है, जिसमें नाबार्ड ने एक महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभाई। उन्होंने विशेष रूप से नाबार्ड के पूर्व जिला विकास प्रबंधक (डीडीएम) रणजीत सिन्हा और नाबार्ड के अधिकारियों के सहयोग को याद करते हुए कहा कि उनके प्रयासों के बिना यह मुकाम हासिल करना आसान नहीं था।

पूर्व डीडीएम रणजीत सिन्हा ने कहा कि जीआई टैग किसी कला को केवल नई पहचान ही नहीं देता, बल्कि उसे कानूनी सुरक्षा और आर्थिक मजबूती भी प्रदान करता है। उन्होंने कलाकारों से संगठित होकर कार्य करने और सर्जना न्यास के माध्यम से इस विरासत को आगे बढ़ाने का आह्वान किया, ताकि जीआई टैग का वास्तविक लाभ कलाकारों तक पहुंच सके।

शाम को फोकार्टोपीडिया फाउंडेशन की ओर से आयोजित परिचर्चा में “टिकुली और भोजपुरी पेंटिंग की चुनौतियां” विषय पर विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। बैठक में इस बात पर चिंता जताई गई कि समृद्ध परंपरा होने के बावजूद इन लोककलाओं के संरक्षण, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ने की दिशा में अभी भी काफी काम किया जाना बाकी है।
पद्मश्री अशोक कुमार विश्वास ने कहा कि टिकुली पेंटिंग को लेकर प्रचार तो हुआ है, लेकिन गांवों में कलाकारों को प्रशिक्षण देने के लिए पर्याप्त सरकारी सहायता नहीं मिल रही है। इसका असर नई पीढ़ी के कलाकारों और रोजगार के अवसरों पर पड़ रहा है।
वहीं संजीव सिन्हा ने कहा कि भोजपुरी चित्रकला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिए गहन शोध, दस्तावेजीकरण और नए विषयों पर रचनात्मक प्रयोग की आवश्यकता है। साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आधुनिकता के साथ चलते हुए इस कला की मौलिक पहचान और लोक-संवेदना को हर हाल में सुरक्षित रखा जाना चाहिए। कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध कला लेखक एवं रंगकर्मी अनीश अंकुर ने किया।

बताते चलें कि भोजपुरी चित्रकला को जीआई (Geographical Indication) टैग मिलने के बाद इस लोककला को लेकर कलाकारों और सांस्कृतिक संस्थाओं की सक्रियता लगातार बढ़ रही है। इसी क्रम में 7 जुलाई को बिहार संग्रहालय में “भोजपुरी चित्रकला और भविष्य की चुनौतियां” विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई, जिसमें विशेषज्ञों ने इस कला के संरक्षण, शोध, प्रशिक्षण और वैश्विक पहचान पर विस्तार से चर्चा की।


कार्यक्रम में अपर निदेशक अशोक कुमार सिन्हा, रंगकर्मी अनीश अंकुर, पूर्व प्राचार्य अजय कुमार पांडे, प्रो. पृथ्वीराज सिंह सहित कई कलाकारों और कला विशेषज्ञों ने भाग लिया। सभी वक्ताओं ने माना कि जीआई टैग मिलने के बाद भोजपुरी चित्रकला के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए यह अनुकूल समय है।

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