कोरोना को हराकर घर पहुंचींं बिहार की ये विभूति

बिहार की जिस विभूति की चर्चा हम कर रहे हैं वे सचमुच सबसे खास हैं अगर उन्हें बिहार की आवाज कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. हम बात कर रहे हैं बिहार की मशहूर लोक गायिका पद्मश्री शारदा सिन्हा की. कोरोना संक्रमण के कारण शारदा सिन्हा पिछले कुछ दिनों से पटना के एक निजी अस्पताल में इलाज करा रही थी. इस दौरान उनके बारे में एक गलत खबर भी फैलाई गई थी जिसका खुद उन्होंने फेसबुक पर लाइव आकर खंडन किया था. आज आखिरकार कोरोना रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद पूरी तरह स्वस्थ होकर शारदा सिन्हा अस्पताल से डिस्चार्ज हो गई हैं. इस बात की जानकारी उन्होंने खुद फेसबुक पर लाइव आ कर दी है. उन्होंने अपने शुभचिंतकों और अस्पताल के डॉक्टर और सभी कर्मियों का शुक्रिया अदा किया है. पटना नाउ की टीम की तरफ से शारदा सिन्हा को शुभकामनाएं. pncb

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इन्डियन आइडल के तीन राउंड पार कर चौथे राउंड में पहुंचा आरा का लाल

भोजपुर(आरा) आरा की धरती ना तो पहले कभी सांस्कृतिक सुगंध से वंचित रही है और ना ही अभी है. आरा की मिट्टी की सुगंध राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक बिखरी है. इतना ही नहीं यहां की गुरु शिष्य परंपरा एवं यहां के गुरुओं से मिलने वाली तालीम हर एक संगीत सिखने वालों का मार्गदर्शन करती रही है. गुरु बक्शी विकास से तालीम लेकर निखिल रंजन ने फेमस रियलिटी शो इन्डियन आइडल के तीन राउंड पार कर चौथे राउंड में पर्सनल इंटरव्यू दे चुके हैं. निखिल रंजन हाथों में गिटार लेकर जब गुनगुनाते हैं तो सुनने वाले बस मंत्रमुग्ध हो जाते है. निखिल रंजन को संगीत विरासत में मिला है. निखिल के परिवार में संगीत तीन पीढ़ीयों से चली आ रही है. इनके नाना पंडित दुधेश्वर लाल बहुत बड़े शास्त्रीय गायक व संगीत के विद्वान रहे. बड़ी मौसी विदुषी कमला देवी और विदुषी बिमला देवी आकाशवाणी व दूरदर्शन मशहूर गायिका हैं. मामा शिवंदन प्रसाद श्रीवास्तव तबला के विद्वान हैं. तीसरी पीढ़ी में इनकी बहन अंजलि बाला व भाई मोहनवीणा एवं अंतर्राष्ट्रीय कथक नर्तक बक्शी विकास व पूजा कुमारी कथक तथा सुप्रिया कुमारी शास्त्रीय गायन के कुशल कलाकार हैं. इलाहाबाद एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय से इंजिनियरिंग कर चुके निखिल को साथ मिला अजीज दोस्त राहुल कुमार का. राहुल ने निखिल को गिटार बजाना सिखाया. पढ़ाई के बाद अक्सर निखिल और राहुल घन्टो गिटार बजाने लगे और धीरे धीरे यह शौक जुनून बन गय़ा. सन 2006 में उत्तर प्रदेश के बरेली में ऑल इन्डिया कलचरल एशोसिएशन द्वारा अखिल भारतीय नाट्य नृत्य महोत्सव में प्रथम पुरस्कार

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सात समंदर पार के गिरमिटिया के दर्द की आवाज़ है ‘बटोहिया’

भोजपुरी का राष्ट्रगीत आरा. प्रवासी गिरमिटियों का दर्द पुराना है। इस दर्द को दहियावां, सारण के बाबु रघुबीर नारायण ने 1911 में शब्द दिया था। डॉं. राजेन्द्र प्रसाद जी के आग्रह उन्होंने एक गीत रचा ‘सुन्दर सुभूमि भैया भारत के देसवा’। इस गीत ने भोजपुरिया मानस को इस कदर छुआ कि आज इसे भोजपुरी ही नहीं पूरे पूर्वी भारत का राष्ट्र गान तक कहा जाता है। और इस गीत को महात्मा गाँधी ने इतना पसंद किया कि उन्होंने इस गीत को ‘वंदे मातरम’ की श्रेणी में रखा था, और उनके हर कार्यक्रम में इस गीत को बजाया जाता था। इस गीत से प्रेरणा पाकर कई युवक आज़ादी की लड़ाई में कूद गए थे। भोजपुरी पाठ्यक्रम में शामिल रहा है ‘बटोहिया’ आजादी के बाद इस गीत को स्कूलों में गाया जाता रहा तथा बिहार के स्कूल के सिलेबस में भी शामिल था। बाद में पटना विश्वविद्यालय के हिंदी सिलेबस में भी इस गीत को जगह दी गयी। लेकिन, बिहार के स्कूली पाठ्यक्रम के साथ साथ इसे पटना विश्विविद्यालय से भी हटा दिया गया। हालांकि, यह अब भी वीर कुँवर सिंह यूनिवर्सिटी में पढ़ाया जाता है। वैश्विक भोजपुरी समाज का प्रतिनिधि गीतभोजपुरिया समाज जिसका मूल भूगोल तो बिहार और उत्तर प्रदेश तक ही सीमित है लेकिन इसके समाज का विस्तार दुनिया के हर भूगोल को छूता है। इस वैश्विक समाज के केंद्र में भारत भूमि है। इसी भारत भूमि को केंद्र में रखकर आज इस समाज के लोककलाकारों की तीन पीढ़ियों ने साथ आकर काम करने की ठानी। आधार बना ‘सुन्दर सुभूमि

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नहीं रही पहली भोजपुरी फ़िल्म की नायिका कुमकुम

बॉलीवुड की मशहूर एक्ट्रेस कुमकुम जिन्होंने अपनी नृत्य प्रतिभा और अभिनय के दम पर करोड़ों दर्शकों के दिलों पर राज किया, उन्होंने कल 86 वर्ष की उम्र में इस संसार से कल विदाई ली. बिहार से रहा गहरा नाता कुमकुम का वास्तविक नाम जैबुन्निसा था और इनका बिहार के शेखपुरा से गहरा नाता था. दरअसल वे हुसैनाबाद के नवाब मंजूर हसन खान की बेटी थी और इनका जन्म भी हुसैनाबाद में 22 अप्रैल, 1934 को हुआ था. हालांकि ये जन्म के कुछ सालों बाद ही मुंबई चली गई पर गाँव से नाता बना रहा और हवेली की मरम्मत तथा गाँव की मदद के लिए पैसे भी भेजती थी. आज भी हुसैनाबाद में इनके रिश्तेदार रहते हैं. पहली भोजपुरी फ़िल्म में किया था शानदार अभिनय इनके कैरियर की शुरुआत ‘शीशा’ फ़िल्म से 1952 में हुई लेकिन प्रसिद्धि इनको तब मिली ज गुरुदत्त ने ‘कभी आर कभी पार’ (1953) गाने को शूट करने के लिए इनको चुना. उसके बाद से इन्होंने अपने नृत्य और अभिनय के बल पर 115 फिल्मों जितने लंबे कैरियर में वर्षों तक दर्शकों की पसन्द बनी रही. 1963 में बनी पहली भोजपुरी फ़िल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ में इन्होंने जो शानदार अभिनय किया वह आज भी लोग भूल नहीं पाते. उनका अभिनय इतना सशक्त रहा कि इसी साल एक और भोजपुरी फ़िल्म ‘लागी नाहीं छूटे रामा’ भी इन्हीं के हिस्से में आई. नृत्य की शिक्षा इन्होंने पंडित शम्भू महाराज से ली थी. ‘मधुबन में राधिका’ (कोहिनूर), ‘मचलती हुई’ (गंगा की लहरें), ‘ऐ दिल है मुश्किल’ (सी आई

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Big B को हुआ कोरोना

बॉलीवुड स्टार अमिताभ बच्चन भी कोरोनावायरस संक्रमित हो गए हैं. अमिताभ बच्चन ने खुद ट्वीट करके इस बात की जानकारी दी है. उन्होंने पिछले 10 दिनों में अपने संपर्क में आए सभी लोगों को टेस्ट कराने की सलाह दी है. अमिताभ बच्चन को नानावती अस्पताल में भर्ती कराया गया है. अमिताभ के पूरे परिवार के सदस्य और उनके साथ रहने वाले लोगों का सैंपल लिया गया है जिनकी रिपोर्ट अभी आनी बाकी है. अपडेट्स के मुताबिक, अभिषेक बच्चन भी संक्रमित हो चुके हैं। PNC

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नहीं रहे सूरमा भोपाली

2020 में बॉलीवुड का बुरा दौर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा. बुधवार को हिंदी फिल्मी इंडस्ट्री के मशहूर अभिनेता जगदीप ने दुनिया को अलविदा कह दिया. वे 81 वर्ष के थे. जगदीप ने कई चर्चित फिल्मों में अपनी एक्टिंग का जादू बिखेरा. उन्होंने शोले फिल्म में सूरमा भोपाली के किरदार से काफी शोहरत मिली थी. उनका असली नाम सैयद इश्तियाक जाफरी था. फेमस बॉलीवुड एक्टर जावेद जाफरी जगदीप के बेटे है. जगदीप का जन्म ब्रिटिश इंडिया के दतिया सेंट्रल प्रोविंग में (अब मध्य प्रदेश) 29 मार्च 1939 को हुआ था. उन्होंने कई फिल्मों में काम किया, लेकिन साल 1994 में ‘अंदाज अपना अपना’, 1975 में ‘शोले’ और 1972 में ‘अपना देश’ में उनके अभिनय को काफी सराहा गया. पीएनसी

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पर्यावरण के लिए पेंटिंग के जरिये बच्चों ने दिखाई अपनी संवेदना,15 छात्रों की पेंटिंग चयनित

आरा. विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर मझौवा स्थित सम्भावना आवासीय उच्च विद्यालय में पर्यावरण संरक्षण पर ऑनलाइन चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन किया गया. चित्रों की इस ऑनलाइन प्रतियोगिता में सैकड़ो छात्र-छात्राओं ने भाग लिया. इस प्रतियोगिता में व्हाट्सएप के जरिये मिले सैकड़ो चित्रों में से 15 चित्रों को चयनित किया गया है. चुने हुए छात्रों को स्कूल खोलने के बाद पुरस्कृत किया जाएगा.वे छात्र जिनकी कलाकृतियां चयनित हुई:-1) आलोक अतुल्य -VII2) अस्मिता सिंह- VIII3) संजना कुमारी- VIII4) मानसी वर्मा -X5) श्रील – UKG6) धीरज कुमार – X7) माही सिंह -X8) शुभम कुमार -X9) अस्मिता आर्यन -III10) अर्णव अपूर्व – III11) प्रांजली प्रज्ञा – VIII12) अवनीश कश्यप- VII13) राजीव रंजन सिंह -VIII14) जया सिंह -IV इस प्रतियोगिता का आयोजन विद्यालय के कला शिक्षक संजीव सिंहा और विष्णु शंकर के दिशा निर्देश में किया गया था. विद्यालय की प्राचार्या डॉ अर्चना सिंह बच्चों के पर्यावरण के प्रति इस तरह की जागरूकता को देखकर सन्तोष व्यक्त किया और कहा कि पर्यावरण के लिए पेंटिंग के जरिये अपनी प्रतिभा को दिखाने वाले सभी छात्रों को लॉक डाउन के बाद पुरस्कृत किया जाएगा. साथ ही उन सबकी कलाकृतियों की एक प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी. सभी बता दें कि संभावना स्कूल हमेशा से पर्यावरण के लिए तत्पर रहा है. समय समय पर वृक्षारोपण से लेकर जागरूकता तक चलाई जाती है साथ ही क्रिएटिव तरीके से पर्यावरण के बचाव के लिए बच्चों का आइडिया शेयर भी किया जाता है. बच्चों से मिले अच्छे फीडबैक पर खुश हो विद्यालय के प्रबंध निदेशक कुमार द्विजेन्द्र ने कहा कि

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20 साल बाद मिले स्कूली दोस्त तो बनाई ये फ़िल्म

20 साल बाद स्कूल मित्रो के संग मिलकर बनाया वीडियो,कोरोना से बचने का दिखाया उपाय आरा,11 मई. जहाँ पूरा देश कोरोना जैसे महामारी से गुजर रहा वही दिल्ली में रह रहे पटना के बिहटा के अमहरा निवासी सोनू कुमार उर्फ कुणाल ने अपने स्कूल -कॉलेज के मित्रो के संग मिल कर कोरोना जैसे महामारी से बचाव का एक वीडियो बनाया हैं जिसमे दिखाया कि कैसे गरीबो को मदद किया जा सकता हैं. कैसे इस महामारी में बचाव किया जा सकता. सोनू कुमार उर्फ कुणाल से पूछने पर उन्होंने बताया कि हम सभी स्कूल के मित्र 20 साल बाद जो बिहार के अनेक जिलों के रहने वाले हैं. सभी ने मिल कर इस लॉकडाउन में सोचा की देश आज इस महामारी से गुजर रहा हैं इससे से बचने के लिए एक वीडियो बनाया जाए सबने हामी भरा तो हम सभी ने मिल कर एक वीडियो बना डाला जो आज के समय के लिए कारगर हैं. वीडियो के माध्यम से कुणाल ने सोचा कि क्यों न देशवासियों को एक सूचना दिया जाए कि कोरोना जैसे महामारी के कारण आज हमारे देश भारत की अर्थव्यवस्था में काफी गिरावट आई है. जिसका वजह हैं लॉकडाउन. आज के समय मे भी सरकार लगातार सभी देशवासियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी से घर के लक्ष्मण रेखा को नही पार करने को अपील की थी, लेकिन जनता को कुछ और ही मंजूर हैं. कुणाल यह भी बताते हैं कि समय रहते हुए सरकार ने सही कदम को चुना नही तो आज अमेरिका और

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दुखद: नहीं रहे पटना के अनिल अजिताभ

हिंदी और भोजपुरी फिल्म के सुप्रसिद्ध निर्देशक लेखक और अभिनेता अनिल अजिताभ का सोमवार को निधन हो गया. कैंसर से पीड़ित अनिल अजिताभ का निधन पटना के पोस्टल पार्क में हुआ. दामुल से लेकर अपहरण तक में प्रकाश झा के सबसे मजबूत बाजू थे…कुछ बढ़िया भोजपुरी फिल्मों का निर्माण भी इन्होंने किया था…महुआ पर भी इनके कई चर्चित कार्यक्रम चले थे. मुंबई के बारह वर्षों, ख़ासकर प्रकाश झा के साथ दामुल, मृत्युदंड, अपहरण और राजनीति जैसी कालजयी फ़िल्मों के लेखन और निर्देशन के स्तम्भ अनिल अजिताभ के निधन से फ़िल्म जगत में शोक की लहर है.पटना के रहने वाले अनिल अजिताभ के निधन पर फ़िल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने शोक प्रकट करते हुए कहा कि अनिल जी के प्रतिभा के सभी कायल थे. वरिष्ठ रंगकर्मी निर्देशक संजय उपाध्याय ने अनिल अजिताभ के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया हैउन्होंने लिखा है कि अनिल अजिताभ भाई, आपका हमसब से मिले वैगर चला जाना किसी को अच्छा नही लगा…अब तो स्मृतियां ही शेष है…आपके कला साहित्यम नाट्य संस्था से..फिंगर प्रिन्ट,राम.श्याम जदू, कथा एक कंस की, रसगंधर्व जैसे नाटको को निदेर्शित कर आप पटना रंगमंच के स्थापित रंग निदेर्शको मे आपका नाम स्थापित हो चुका था। “एक था गदहा” मे जुम्मन मिंया का करेक्टर मै कर रहा था। मलाल ही रह गया कि महिनो रिहर्सल करने के बाद भी वह नाटक नही हो सका…..रंगमंच को बाई-बाई कर आप फिल्म की ओर रूख किया,बम्बई(मुम्मई) प्रकाश झा के साथ जुड़ गये।”दामुल,हिप हिप हूर्र….मृत्युदंड तक आप उनके साथ बतोर एसोसीएट रहे… अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के

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अभिनय की मजदूरी: “सत्यकाम” बने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता

10वें दादा साहब फाल्के फ़िल्म फेस्टिवल में आरा के लाल को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार पटना, 2 मई. बॉलीवुड एक्टर सत्यकाम आनन्द को 10वें दादा साहब फाल्के फ़िल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के रूप में पुरस्कृत किया गया है. यह पुरस्कार उन्हें फ़िल्म ‘Command & I shall obey’ के लिए मिला है. 01 यानि मई यानि मजदूर दिवस के मौके पर मिला यह पुरस्कार सत्यकाम के लिए विशेष यादगार बनाने वाला बन गया है. बताते चलें कि इस फ़िल्म की शूटिंग के बाद पोस्ट-प्रोडक्शन के लिए डबिंग के दौरान ही उन्होंने लोगो से शेयर किया था कि अबतक का उनका सबसे दमदार अभिनय इसमें देखने को मिलेगा लेकिन किसी को यह नही पता था कि इसके लिए वे पुरस्कार के लिए भी चयनित किये जायेंगे. उन्होंने मजदूर दिवस पर मिले इस पुरस्कार के बाद सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए लिखा भी है कि मुझे मेरी मजदूरी मिल गयी. उनकी सहजता इसी से समझी जा सकती है कि ग्लैमर की इस दुनिया मे रहने के बाद भी वे अपने आपको एक वर्कर ही मानते है. बताते चलें कि सत्यकाम भोजपुर के मुख्यालय आरा के रहने वाले हैं. गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसे फ़िल्म में अभिनय के बाद वर्ल्ड में सुर्खियां बटोरने वाले सत्यकाम आरा में रंगमंच से अपनी शुरुआत की थी. थियेटर से फिल्मों तक पहुँचे सत्यकाम के पास अभी आधे दर्जन से ऊपर फ़िल्म हैं जो निर्माणाधीन है. इसमें एक महेश भट्ट की फ़िल्म मार्कशीट भी है. बिहार के लाल सत्यकाम के इस उपलब्धि पर जिलावासी ही नही बिहारवासी प्रफ्फुलित हैं.

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