समायोजन और तबादला सरकार के लिए बना चुनौती
पटना।। बिहार में शिक्षकों के तबादले की खबर चारों ओर है. शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने कहा है कि तबादले से पहले शिक्षकों का समायोजन होगा और समायोजन का आधार होगा ई शिक्षाकोष पर उपलब्ध बच्चों के एडमिशन का आंकड़ा. सरकार ने छात्र- शिक्षक अनुपात तय किया है और उस हिसाब से शिक्षकों का समायोजन होगा और उसके बाद जिन शिक्षकों को तबादले की जरूरत है उनसे आवेदन लेकर उनका तबादला किया जाएगा.

इस बारे में चाहे सोशल मीडिया हो, शिक्षक संघ हो या अन्य लोग, सभी तरह-तरह की बातें कर रहे हैं. दरअसल बिहार के लगभग 11 लाख सरकारी कर्मियों में बड़ा तबका बिहार के शिक्षकों का है और यही वजह है कि लगभग 5.50 लाख शिक्षकों से जुड़ी हर बात बड़ी खबर बन जाती है. इसकी एक वजह यह भी है कि शिक्षा विभाग शुरू से ही विवादित और अपने ही पुराने आदेश को भूलकर नए आदेश जारी करने के लिए चर्चित रहा है. बिहार के शिक्षा विभाग की यह परंपरा सालों से चली आ रही है और अब तो हर साल न जाने कितने पत्र निकलते हैं, कितने आदेश निकलते हैं. आदेश इतने होते हैं कि खुद शिक्षा विभाग को पता नहीं होता कि उसने कितने आदेश जारी किए हैं और क्या आदेश जारी किए.

शिक्षक संघ से जुड़े शिक्षक कहते हैं कि हर ओर कन्फ्यूजन की स्थिति है और इस कंफ्यूजन को दूर करने में शिक्षा विभाग की कोई रुचि नहीं है. बस कन्फ्यूजन बना रहे, शिक्षक परेशान रहें, सरकार का काम निकलता रहे. यही होता रहा है.
अब छात्र-शिक्षक अनुपात और ई शिक्षाकोष पर उपलब्ध आंकड़ों की बात करें तो दो महत्वपूर्ण बिंदु सामने आते हैं. वर्ष 2024 में सक्षमता परीक्षा वन के आयोजन के बाद जब तबादले की बात शुरू हुई तो कई बार ट्रांसफर का आधार ही बदल दिया गया. ट्रांसफर का आवेदन लेने के बाद जब हंगामा शुरू हुआ तो तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नवंबर 2024 में यह घोषणा कर दी कि जो शिक्षक अपने ही विद्यालय में रहना चाहते हैं कि वहां बने रह सकते हैं. यहीं से शुरू हुई तमाम परेशानियां=
तबादले के इंतजार में बरसों से इंतजार कर रहे शिक्षक कहते हैं कि पटना और अन्य शहरों में जो शिक्षक वर्षों से जमे हुए हैं जब तक उनका तबादला नहीं होता, तब तक दूर-दराज के स्कूलों में पोस्टेड शिक्षक अपनी मनचाही जगह पर नहीं आ सकते. लेकिन सरकार ने आनन-फानन में न जाने क्यों पुराने शिक्षकों को अपने ही विद्यालय में रहने की इजाजत दे दी. ऐसे में दूर दराज वाले शिक्षकों के लिए, जो वर्षों से ट्रांसफर का इंतजार कर रहे थे, उनके लिए मनपसंद प्रखंड या मनपसंद शहर में ट्रांसफर पाना एक सपना बनकर रह गया और जिन शिक्षकों का तबादला हुआ भी वह ऐसी जगह पर पहुंच गए, जहां पहले से या तो पर्याप्त शिक्षक थे या जहां बच्चे कम थे. क्योंकि सरकार ने तबादले के दौरान यह तो देखा ही नहीं की कहां कितनी जरूरत है और किस विद्यालय में छात्र शिक्षक अनुपात के हिसाब से तबादला हो रहा है.

अब जब तबादला हो चुका है और कुछ हजार शिक्षक बाकी रह गए हैं तो यह कवायद सरकार ने शुरू की है कि पहले समायोजन करेंगे और अब ई शिक्षाकोष के आधार पर छात्र शिक्षक अनुपात तय करने की बात कही जा रही है तो दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु आता है ई-शिक्षाकोष का.
अब यह समझना जरूरी है कि इस ई-शिक्षाकोष पर आंकड़ों का आधार क्या है. ई शिक्षाकोष पर उन्हीं बच्चों का आंकड़ा प्रदर्शित होता है जिनके आधार और बैंक अकाउंट रिकॉर्ड अपडेट होता है= यानी अगर स्कूल में 300 बच्चे नामांकित हैं, लेकिन उनमें से 50 बच्चों का आधार या बैंक अकाउंट नहीं है तो ऐसे बच्चों का नामांकन ई शिक्षाकोष पर प्रदर्शित नहीं होता है. हालांकि विभाग ने सभी स्कूलों से अपडेट डाटा भी तलब किया है जिससे वास्तविक आंकड़े सामने आएंगे.

एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिस हिसाब से तबादले की बात कही जा रही है अगर छात्र शिक्षक अनुपात के हिसाब से तबादले हुए तो स्कूल में छुट्टी पर रहने वाले दिन शिक्षकों की संख्या कम रहेगी. यानी अगर दो शिक्षक आकस्मिक अवकाश या विशेष अवकाश या किसी अन्य अवकाश पर हैं तो उन कक्षाओं की पढ़ाई बाधित होगी. जाहिर तौर पर अवकाश के लिए किसी शिक्षक को रोक नहीं जा सकता तो इस तथ्य को भी समझना जरूरी है कि अगर कुछ ज्यादा शिक्षक भी स्कूल में हों तो बेहतर तरीके से पठन-पाठन की व्यवस्था हो सकेगी.

इस बारे में कई शिक्षक संघ और शिक्षक नेता भी मानते हैं कि तकनीकी समस्याओं को देखते हुए सरकार को सोच समझकर फैसला करना चाहिए. जिन शिक्षकों को तबादला चाहिए सिर्फ उनका ही तबादले का आवेदन लेकर यथासंभव नजदीकी स्कूल में तबादला करना चाहिए और छात्र शिक्षक अनुपात तय करने के लिए सभी विद्यालयों के वास्तविक आंकड़े जुटाए जाने चाहिए.
इन चुनौतियों से कैसे निपटेगा शिक्षा विभाग
पहला यह कि क्लास 1-5 में शिक्षक लगभग 20 साल से काम कर रहे हैं. लेकिन उन्हें आज तक स्नातक ग्रेड में प्रमोट नहीं किया गया जबकि बहाली 1-5 में सबसे ज्यादा होती रही है. हाल ही में विधानपार्षद वंशीधर ब्रजवासी ने शिक्षा मंत्री को पत्र लिखकर इसपर एतराज जताया है. जाहिर तौर पर प्राथमिक विद्यालय यानी क्लास वन से 5 तक के विद्यालयों में शिक्षकों की संख्या ज्यादा नजर आ रही है और मध्य विद्यालयों में शिक्षकों की संख्या अपेक्षाकृत कम है क्योंकि सरकार ने प्रमोशन ही नहीं दिया.

दूसरा पहलू यह है कि अगर किसी विद्यालय में क्लास एक से पांच तक की कक्षा में हर कक्षा में 10-10 बच्चे हैं और सरकार नंबर के हिसाब से सिर्फ दो शिक्षकों को ऐसे स्कूलों में रखती है तो यह सोचना पड़ेगा कि 5 कक्षाओं वाले विद्यालय में क्या सिर्फ दो शिक्षक पांच कक्षाओं का एक साथ संचालन कर पाएंगे और अगर नहीं तो फिर बच्चों का सिलेबस कैसे पूरा होगा. और अगर इनमें से कोई शिक्षक छुट्टी पर होता है तो फिर पढ़ाई कैसे पूरी होगी.
तीसरा महत्वपूर्ण तथ्य है कि नियोजित शिक्षकों की संख्या भी 70000 के करीब है और वह लंबे समय से एक ही विद्यालय में जमे हुए हैं. उन्हें अपनी पंचायत या प्रखंड के बीच ही तबादला किया जा सकता है. सरकार ने अब तक उनके नियोजन की सेवा शर्तों में बदलाव नहीं किया है तो फिर ऐसे शिक्षकों का समायोजन नहीं होने पर क्या समायोजन सही तरीके से हो पाएगा.
चौथा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जिन शिक्षकों का तबादला पिछले 1 साल या डेढ़ साल के दौरान हुआ है क्या उन्हें फिर से दूसरी जगह भेजा जाएगा. क्या यह उचित रहेगा कि आपने जिन शिक्षकों का अपने ही मानक यानी पति-पत्नी या गंभीर बीमारी या अन्य किसी वजह से तबादला किया है, उन्हें फिर से दूसरी जगह भेजा जाए.

ऐसे में शिक्षा विभाग के लिए एक साथ समायोजन और ट्रांसफर का ये टास्क बेहद चुनौतीपूर्ण नजर आ रहा है. बिना किसी विवाद या कोर्ट केस के अगर सरकार शिक्षकों को इधर से उधर कर सकी तो ये सरकार की बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी.
pncb
