युवा रचनाकार अनूप की कविता ‘पुरुष’




पुरुष

मैं पुरुष हूँ
और मैं भी प्रताड़ित होता हूँ
मैं भी घुटता हूँ पिसता हूँ
टूटता हूँ, बिखरता हूँ
भीतर ही भीतर
रो नहीं पाता, कह नहीं पाता
पत्थर हो चुका,
तरस जाता हूँ पिघलने को,
क्योंकि मैं पुरुष हूँ !

मैं भी सताया जाता हूँ
जला दिया जाता हूँ
उस “दहेज” की आग में
जो कभी मांगा ही नहीं था,
स्वाह कर दिया जाता है
मेरे उस मान सम्मान
को तिनका तिनका
कमाया था जिसे मैंने
मगर आह भी नहीं भर सकता
क्योंकि पुरुष हूँ !

मैं भी देता हूँ आहुति
“विवाह” की अग्नि में
अपने रिश्तों की
हमेशा धकेल दिया जाता हूँ
रिश्तों का वज़न बांध कर
ज़िम्मेदारियों के उस कुँए में
जिसे भरा नहीं जा सकता
मेरे अंत तक भी
कभी दर्द अपना बता नहीं सकता
किसी भी तरह जता नहीं सकता
बहुत मजबूत होने का
ठप्पा लगाए जीता हूँ
क्योंकि मैं पुरुष हूँ !

सुना है जब मन भरता है
तब वो आंखों से बहता है
“मर्द होकर रोता है”
“मर्द को दर्द कब होता है”
टूट जाता है मन से
आंखों का वो रिश्ता
सब कुछ देकर बन नहीं पाता फरिश्ता
क्योंकि मैं पुरुष हूँ !

अनूप नारायण सिंह

By pnc

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