नही रही भोजपुरी की इनसाइक्लोपीडिया रेखा तिवारी !

एक हफ्ते से थी सांस में तकलीफ, बुधवार को लिया अंतिम साँस

पटना,21 अप्रैल(ओ पी पांडेय). भोजपुरी की इनसाइक्लोपीडिया के नाम से विख्यात 48 वर्षीय लोक गायिका रेखा तिवारी ने आज बोकारो में अंतिम सांस लिया. वे पिछले 14 अप्रैल से अस्पताल में इलाजरत थीं. कोरोना की वजह से साँस लेने में तकलीफ के कारण वे अस्पताल में ऑक्सीजन पर थीं. उनका स्वास्थ्य सुधर भी रहा था लेकिन मंगलवार से उनका बीपी लो होने लगा और लगातार ऑक्सीजन लेवल भी कम होने के कारण बुधवार की अहले सुबह लभगग 5.30 बजे उनका देहावसान हो गया.




लोकसंगीत की बात हो और रेखा तिवारी का नाम न आये ये संभव नही है. शायद ही कोई भोजपुरी का लोकोत्सव हो या लोकपर्व जो उनसे अछूता रह गया हो. हमेशा चेहरे पर मुस्कान और आवाज में भोजपुरी की सोंधी खुश्बू के साथ जब उनकी टांस सुनने को जिसे मिकता वो उनका मुरीद हो जाता था. उनकी आवाज का जादू सबके सिर चढ़कर बोलता था. किसी बात की जब चर्चा होती उनके पास उसके लिए गीत मौजूद होता था. ऐसी त्वरित डिमांड पेश करने वाली बहुचर्चित लोकगायिका रेखा तिवारी का निधन बुधवार को कोरोना की वजह से हो गया. उनकी तबियत पिछले एक हफ्ते से खराब चल रही थी. उन्हें साँस लेने में तकलीफ थी. यह सांस की तकलीफ भोजपुरी के सुरों की सांस छीन लेगा ये कोई नही जानता था.

रेखा तिवारी सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव थीं. उन्होंने अभी हाल के चैत नवरात्रि का पूजन भी लोगों से शेयर किया था इसके पहले मार्च में वे गुप्ताधाम की यात्रा पर गयीं थीं जहां से लाइव वीडियो भी शेयर किया था. लेकिन 14 अप्रैल से तबियत बिगड़ने के बाद वे अस्पताल में भर्ती थी. लेकिन उन्होंने घरवालों से कह दिया कि नवरात्रि का पाठ जारी रखना. उनके पति तब से पाठ पर थे.

रेखा तिवारी का जन्म भोजपुर के तरारी प्रखण्ड के बड़का गाँव में 20 जून 1972 को हुआ था. बचपन्न से उन्हें गायक बनने का शौक था लेकिन लड़की होने के कारण उन्हें कभी बाहर निकलने का मौका नही मिलता. लेकिन जब जुनून सर में सवार हो तो उसे पूरा व्यक्ति कर ही डालता है. रेखा तिवारी ने घर मे ही लोकधुनों को गाना शुरू किया. असर यह हुआ कि उनकी सुरीली आवाज ही उनकी पहचान बन गयी और आसपास मुहल्लों में खास मौकों पर महिलाओं के बीच खोजी जाने लगीं. लगभग 13 वर्ष ही शादी भी गयी जिससे सपने अधूरे रह गए. शादी झारखंड के बोकारो निवासी ललन तिवारी से हुई. एक बार तो ऐसा लगा जैसे सुरों से उनका नाता टूट ही जायेगा. लेकिन उन्होंने भले बाहर नही गाया लेकिन गानों का गुनगुनाना नही. शादी के बाद जब चन्दन तिवारी उनके जीवन मे बेटी की रूप में आयी तो उन्होंने अपने सपने को चन्दन में उतार उसे अपने जैसा गढ़ दिया. बड़ी होते ही जब चन्दन की आवाज भोजपुरिया क्षेत्र में सुनाई दिया तो लोगों को विश्वास नही हुआ कि भोजपुरी में अच्छे लोकगीतों को गाने वाला भी कोई है. जब चन्दन से उसके गुरु के बारे में लोगों ने पूछा और पता चला कि उनकी माँ रेखा तिवारी ही उनकी गुरु है तब लोगों को आश्चर्य का ठिकाना न रहा. फिर क्या माँ और बेटी की जोड़ी ने भोजपुरिया क्षेत्र में डंका बजा दिया. लोकधुनों को सहेजने के लिए लोकधुन न्यास की स्थापना की और निरन्तर उसको सहेजते रहीं. लेकिन 21 अप्रैल की सुबह वह मनहूस घड़ी आयी जब उन्होंने सबको अलविदा कह दिया. वे अपने पीछे दो बेटों (शंकर तिवारी और शम्भू तिवारी) और दो बेटियों(चन्दन तिवारी व पुर्णिमा तिवारी) के साथ अपने पति ललन तिवारी को भी छोड़ गई हैं. चन्दन अपने भाई बहनों में सबसे बड़ी है.

उनकी मौत की खबर के बाद पूरा भोजपुरिया समाज सदमे में है. सोशल मीडिया पर हाहाकार मचा हुआ है, जो यह सिद्ध करता है कि वे किसी परिचय का मोहताज नही थीं. उन्होंने जो ठाना उसे अपनी अगली पीढ़ी को समर्पित कर आपके संकल्प को पूरा किया जो शायद किसी के बूते की बात नहीं. लेकिन, उसे संजो कर तो रखा ही जा सकता है. आपने इस धरा को बहुत कुछ दिया है. रेखा तिवारी ने भूमिपुत्री की भूमिका का आपने बखूबी निर्वहन किया. वे सदियों तक याद रखी जायेगी.