भिखारी ठाकुर को सिर्फ जाति के चश्मे से देखना उनके साहित्य के साथ न्याय नहीं : डॉ. एम.के. पाण्डेय

आखर के सौजन्य से भोजपुरी विभाग में ‘महेंद्र मिश्र पुस्तकालय’ और डिजिटल लाइब्रेरी का शुभारंभ




आरा,26 अगस्त. वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर भोजपुरी विभाग में भोजपुरी साहित्य और संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हुई। आखर ट्रस्ट के सौजन्य से ‘महेंद्र मिश्र पुस्तकालय’ का उद्घाटन और डिजिटल लाइब्रेरी सेवा का लोकार्पण किया गया।

पुस्तकालय का उद्घाटन आखर संस्था के संजय सिंह, नवीन कुमार, मोहन श्रीवास्तव, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. एम.के. पाण्डेय तथा भोजपुरी विभागाध्यक्ष प्रो. दिवाकर पाण्डेय ने संयुक्त रूप से किया।

इस अवसर पर ‘भिखारी ठाकुर के रचनन प कुछ बिचार, कुछ विमर्श : जुग संदर्भ में’ विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित हुआ। मुख्य वक्ता सत्यवती महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी प्राध्यापक डॉ. मुन्ना कुमार पाण्डेय ने कहा कि भिखारी ठाकुर भोजपुरी साहित्य और संस्कृति के प्रस्थान बिंदु हैं।

उन्होंने कहा कि भिखारी ठाकुर की रचनाओं को किसी एक खांचे में डालकर या संकीर्ण जातीय दृष्टि से देखना उनके साहित्य का सही मूल्यांकन नहीं है। ‘बिदेसिया’ और ‘गबरघिचोर’ जैसी रचनाओं में आज के उत्तर आधुनिक विमर्श तक की झलक दिखाई देती है।

डॉ. पाण्डेय ने भिखारी ठाकुर के साहित्य में नारीवादी दृष्टिकोण की चर्चा करते हुए उन्हें युगधर्मी कलाकार बताया। उन्होंने कहा कि कलाकार जाति और धर्म के बंधनों से ऊपर होता है। ऐसे में भिखारी ठाकुर की रचनाओं पर नई दृष्टि और नए विमर्श के साथ शोध की आवश्यकता है।

भोजपुरी छात्रों के लिए नई पहल

कार्यक्रम में आखर ट्रस्ट के संजय सिंह, मोहन श्रीवास्तव और नवीन कुमार ने ‘आखर गद्य लेखन प्रतियोगिता’ शुरू करने तथा आखर के सहयोग से भोजपुरी विभाग की डिजिटल पत्रिका प्रारंभ करने की घोषणा की। छात्रों को भोजपुरी में मौलिक लेखन के लिए प्रोत्साहित किया गया।

विभाग में नवनिर्मित महेंद्र मिश्र पुस्तकालय में छात्रों के लिए कई उपयोगी सुविधाएं भी शुरू की गई हैं। डिजिटल लाइब्रेरी के माध्यम से भोजपुरी साहित्य के विद्यार्थियों और शोधार्थियों को अध्ययन एवं शोध के नए संसाधन उपलब्ध होंगे।

शोधार्थी रवि प्रकाश सूरज की पीएचडी मौखिकी

कार्यक्रम के बाद शोधार्थी रवि प्रकाश सूरज की पीएचडी मौखिकी भी सम्पन्न हुई। ‘भोजपुरी आ छत्तीसगढ़ी लोकगथन के सामाजिक आ सांस्कृतिक अध्ययन’ विषय पर आधारित शोधकार्य प्रो. दिवाकर पाण्डेय के निर्देशन में पूरा किया गया। बाह्य परीक्षक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. एम.के. पाण्डेय थे।

रवि प्रकाश सूरज ने कहा कि भोजपुरी लोकगाथा मौखिक परंपरा की तेजी से विलुप्त होती विधाओं में से एक है। उनका शोध लोकगाथाओं के महत्व को समझने के साथ-साथ इनके संरक्षण और संवर्धन की दिशा में उपयोगी साबित होगा।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी, साहित्यकार और पत्रकार बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। नीरज वर्मा, नवनीत राय, मुकेश कुमार, आनंद भूषण पांडेय, जितेंद्र कुमार, कृष्ण कुमार, नरेंद्र सिंह, दिनेश त्रिपाठी, डॉ. राजेश कुमार, डॉ. संजय कुमार, डॉ. यशवंत कुमार सिंह, सोहित सिन्हा, ढूनमुन सिंह समेत कई लोग मौजूद रहे।

भोजपुरी साहित्य के अध्ययन को पुस्तकालय, डिजिटल संसाधन और नए शोध-विमर्श से जोड़ने की यह पहल निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

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