मशहूर लोकगायिका देवी ने अश्लीलता, जातीय गीतों और भाषा के भविष्य पर खुलकर रखी राय

Patna Now Exclusive/O.P.Pandey

पटना, 25 जुलाई. विश्व IVF दिवस के अवसर पर राजधानी पटना में आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचीं मशहूर भोजपुरी लोकगायिका ने Patna Now से विशेष बातचीत में भोजपुरी संगीत, लोकसंस्कृति, सामाजिक सरोकारों और भोजपुरी भाषा के भविष्य पर बेबाकी से अपनी राय रखी. इस दौरान उनका 7 महीने का पुत्र जंगल भी उनके साथ देखने मिला.

“जंगल की आज सबसे ज्यादा जरूरत है, इसलिए बेटे का नाम रखा जंगल”
अपने बेटे के अनोखे नाम ‘जंगल’ के बारे में पूछे जाने पर देवी ने बताया कि यह नाम उनके नाना ने रखा था. उन्होंने कहा कि आज के दौर में सबसे ज्यादा जरूरत जंगलों की है, लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम प्राकृतिक जंगलों को खत्म कर कंक्रीट के जंगल खड़े कर रहे हैं. यह प्रकृति और मानव जीवन, दोनों के लिए खतरे का संकेत है.

“भोजपुरी का स्तर देखकर दुख होता है”
भोजपुरी संगीत की वर्तमान स्थिति पर चिंता जताते हुए देवी ने कहा कि आज जिस तरह के गीत बनाए जा रहे हैं और उनमें महिलाओं को जिस नजर से प्रस्तुत किया जाता है, उसे देखकर उन्हें बेहद दुख होता है.




उन्होंने कहा कि भोजपुरी की मूल संस्कृति प्रेम, अपनापन और लोगों को जोड़ने की रही है. लेकिन आज कई गीत जाति और धर्म के नाम पर समाज में विभाजन और नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं.

कलाकार की जिम्मेदारी समाज को जोड़ने की है
देवी ने कहा कि कलाकार सबसे संवेदनशील व्यक्ति होता है. ऐसे में किसी कलाकार को ऐसे गीत नहीं गाने चाहिए जो समाज में वैमनस्य और घृणा पैदा करें. उनका मानना है कि कला का उद्देश्य समाज को जोड़ना है, तोड़ना नहीं.

भिखारी ठाकुर हैं सबसे पसंदीदा कलाकार
अपनी प्रेरणा के बारे में बताते हुए देवी ने कहा कि उनके सबसे प्रिय कलाकार लोकनायक हैं. उन्होंने कहा कि भिखारी ठाकुर ने अपने लोकनाटकों और गीतों के माध्यम से समाज की कुरीतियों पर गहरी चोट की.

उन्होंने ‘बेटी बेचवा’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इस नाटक में कम उम्र की लड़की की शादी एक वृद्ध व्यक्ति से होने के बाद उसके जीवन की पीड़ा को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है. वहीं ‘विदेशिया’ के माध्यम से उन्होंने उन परिवारों की पीड़ा दिखाई, जिनके पुरुष रोजी-रोटी के लिए घर छोड़कर बाहर चले जाते हैं. ऐसे लोकनाटकों ने समाज में जागरूकता और बदलाव की शुरुआत की.

आठवीं अनुसूची पर भी रखी स्पष्ट राय
भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के सवाल पर देवी ने कहा कि केवल मांग करने से बात नहीं बनेगी. पहले भोजपुरी के स्तर को बेहतर बनाना होगा.

उन्होंने कहा कि यदि वर्तमान में बन रहे गीतों का स्तर देखा जाए तो गंभीर आत्ममंथन की जरूरत है. जब भोजपुरी अपनी गरिमा और गुणवत्ता के साथ मजबूत होगी, तभी उसे उचित सम्मान मिल सकेगा.

सिर्फ मुद्दे उठाने से नहीं, सोच बदलने से बदलाव आएगा
सामाजिक मुद्दों पर कलाकारों की भूमिका को लेकर देवी ने कहा कि कलाकारों को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए. उन्होंने कहा कि जब तक हमारी सोच नहीं बदलेगी, तब तक किसी भी सामाजिक समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है.

नए कलाकारों को दी यह सलाह
उभरते हुए भोजपुरी गायकों और कलाकारों को संदेश देते हुए देवी ने कहा कि उन्हें पुराने लोकगीतों और महान लोक कलाकारों को सुनना और सीखना चाहिए.

उन्होंने कहा कि भिखारी ठाकुर और महेन्द्र मिश्रा जैसे लोक कलाकारों की रचनाएं हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं. नई पीढ़ी यदि इन्हें गाएगी और आगे बढ़ाएगी, तो भोजपुरी की समृद्ध लोकसंस्कृति भी सुरक्षित रहेगी और आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रहेंगी.

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