बिहार की तीन लोककलाओं को GI सम्मान, भोजपुरी पीड़िया पेंटिंग को मिली नई पहचान
मौर्यलोक में सजी बिहार की लोककला और हस्तशिल्प की प्रदर्शनी

पटना, 8 अगस्त 2026। बिहार की समृद्ध लोककला और पारंपरिक शिल्प विरासत के लिए शुक्रवार का दिन गौरवपूर्ण रहा। नेशनल हैंडलूम डे 2026 के अवसर पर आयोजित राज्य स्तरीय समारोह में बिहार की हाल ही में GI टैग प्राप्त तीन पारंपरिक कलाओं के प्रमाणपत्र संबंधित संस्थाओं को प्रदान किए गए।

समारोह में भोजपुरी पीड़िया पेंटिंग, नालंदा की बावनबूटी और गया की पत्थरकट्टी पाषाण कला को GI प्रमाणपत्र मिला। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भोजपुरी पीड़िया पेंटिंग के लिए सर्जना न्यास, बावनबूटी के लिए बासवान बिगहा प्राइमरी वीवर्स कोऑपरेटिव सोसाइटी तथा पत्थरकट्टी पाषाण कला के लिए आशीर्वाद स्टोन हैंडीक्राफ्ट प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड को प्रमाणपत्र प्रदान किया।
भोजपुरी पीड़िया पेंटिंग बनी भोजपुर की सांस्कृतिक पहचान

भोजपुरी पीड़िया पेंटिंग भोजपुर क्षेत्र की पारंपरिक लोक चित्रकला है, जिसका संबंध भोजपुरी संस्कृति के पीड़िया पर्व से है। भाई-बहन के स्नेह, मंगलकामना और दीर्घायु की कामना से जुड़े इस लोकपर्व में कुंवारी कन्याएं दीपावली और गोवर्धन पूजा के बाद करीब सवा महीने तक घरों की दीवारों पर गोबर, धान, चावल और प्राकृतिक रंगों से पारंपरिक चित्रांकन करती हैं।
इसी लोक परंपरा से विकसित पीड़िया पेंटिंग अब भोजपुर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। GI टैग मिलने से इस कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलने की उम्मीद है।
52 बूटियों वाली बावनबूटी और 300 साल पुरानी पत्थरकट्टी कला

नालंदा की बावनबूटी बिहार की प्राचीन हथकरघा परंपरा का हिस्सा है। इसमें सूती और रेशमी वस्त्रों पर हाथ से 52 प्रकार की पारंपरिक बूटियों का कलात्मक संयोजन बुना जाता है।

वहीं, गया की पत्थरकट्टी पाषाण कला करीब 300 वर्ष पुरानी शिल्प परंपरा है। स्थानीय काले ग्रेनाइट पत्थरों पर उत्कृष्ट नक्काशी और मूर्तिकला के लिए यह कला देश-विदेश में अपनी पहचान रखती है।
मौर्यलोक में सजी बिहार की लोककला
नेशनल हैंडलूम डे के अवसर पर नाबार्ड की ओर से पटना के मौर्यलोक परिसर में तीन दिवसीय हैंडलूम एवं हस्तशिल्प प्रदर्शनी का भी शुभारंभ किया गया। नाबार्ड के अध्यक्ष डॉ. शाजी के. वी. ने फीता काटकर प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।

प्रदर्शनी में हाल ही में GI टैग प्राप्त तीनों संस्थाओं को विशेष रूप से आमंत्रित कर उनके उत्पादों के प्रदर्शन और विपणन के लिए स्टॉल उपलब्ध कराए गए हैं।

इसके अलावा TRIFED, रंग शिल्पी हैंडीक्राफ्ट (दरभंगा), जय माता दी जीविका स्वयं सहायता समूह (समस्तीपुर), KGN सिल्क (बांका), रेपो (भागलपुर), रंतो हैंडीक्राफ्ट प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (मधुबनी), मुन्ना टसर सिल्क (नवादा) और भोजपुरिया क्राफ्ट प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (भोजपुर) समेत कुल 11 संस्थाओं एवं शिल्पकारों के उत्पाद प्रदर्शित किए जा रहे हैं।

प्रदर्शनी में भोजपुरी पीड़िया पेंटिंग, बावनबूटी वस्त्र, पत्थर की कलात्मक मूर्तियां, मधुबनी पेंटिंग, हस्तनिर्मित खिलौने, साड़ियां, चादरें, दुपट्टे, बैग और अन्य हस्तशिल्प उत्पाद लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। बड़ी संख्या में लोग प्रदर्शनी में पहुंचकर स्थानीय कलाकारों के उत्पाद देख और खरीद रहे हैं।
GI टैग से कलाकारों और बुनकरों को नई उम्मीद
नेशनल हैंडलूम डे पर आयोजित यह आयोजन बिहार की पारंपरिक लोककलाओं, हथकरघा और हस्तशिल्प को नई पहचान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। GI टैग मिलने से इन कलाओं के संरक्षण के साथ-साथ कलाकारों और बुनकरों के लिए नए बाजार, रोजगार और आर्थिक अवसरों के रास्ते खुलने की उम्मीद है।
