नमक, नाता और नाराज़गी!
आरा-बक्सर MLC चुनाव में अपनों ने ही खोला मोर्चा
आरा, 12 मई। कल तक जो एक-दूसरे का हाथ थाम वोट मांगते थे, आज वही मंच से एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं। सवाल अब सिर्फ चुनाव का नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व और परिवारवाद बनाम जनाधार की लड़ाई का बन चुका है।
भोजपुर की राजनीति में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल गूंज रहा है कि“क्या बाप-बेटे की जोड़ी एक साथ विधान परिषद और विधानसभा पहुंचेगी?”

एक तरफ जदयू ने संदेश विधायक और पूर्व MLC राधाचरण साह उर्फ सेठ जी के बेटे कन्हैया कुमार पर दांव लगाया है, तो दूसरी तरफ राजद ने पूर्व MLC लालदास राय के बेटे और विजेंद्र यादव के दामाद सोनू राय को मैदान में उतार दिया है। यानी लड़ाई अब दलों से ज्यादा दो राजनीतिक घरानों की प्रतिष्ठा पर आकर टिक गई है।
लेकिन इस चुनाव का सबसे विस्फोटक पहलू बना है अपनों का विद्रोह!
जदयू के पुराने और जमीन से जुड़े नेता मनोज उपाध्याय टिकट कटने के बाद जब निर्दलीय अपने जनप्रतिनिधियों के भरोसे चुनावी मैदान में उतरे तो पार्टी ने उन्हें बागी घोषित कर 6 वर्षों के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। 35 वर्षों तक पार्टी का झंडा ढोने वाले मनोज ने खुलकर आरोप लगाया कि जदयू अब कार्यकर्ताओं की नहीं, “धनकुबेरों और भाई-भतीजावाद” की पार्टी बन गई है।
उधर राजद खेमे में भी हालात कम विस्फोटक नहीं हैं।
जो राधाचरण साह कभी अरुण यादव और विजेंद्र यादव के साथ एक परिवार की तरह राजनीति करते थे, वही आज उनके सबसे बड़े राजनीतिक दुश्मन बन चुके हैं। वजह भी साफ है ,संदेश विधानसभा में राधाचरण साह ने यादव परिवार के राजनीतिक किले को ध्वस्त कर दिया। पिता, मां और बेटे को विधायक बनाने का सपना अधूरा रह गया और तभी से रिश्तों में दरार की दीवार खड़ी हो गई।

अब उसी लड़ाई का बदला MLC चुनाव में लेने की तैयारी दिख रही है। विजेंद्र यादव ने तो हमला बोलते हुए राधाचरण साह पर भाई-भतीजावाद, कारोबार की राजनीति और यहां तक कि पुराने विवादों तक को उछाल दिया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोग सालभर बालू और होटल का धंधा करते हैं, चुनाव आते ही नेता बन जाते हैं।
हालांकि राधाचरण साह ने पलटवार में ज्यादा शब्द खर्च नहीं किए, लेकिन मुस्कुराते हुए ऐसा तीर छोड़ दिया जिसने सियासी तापमान और बढ़ा दिया। उन्होंने कहा कि“भोजपुर की जनता सब देख रही है कि कौन काम कर रहा है और कौन सिर्फ परिवारवाद की राजनीति।”
जब उनसे पूछा गया कि जो लोग कभी उनका नमक खाते थे, वही आज विरोध में क्यों खड़े हैं, क्या आपके अन्न में दोष है?
तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि “अब यही मान लीजिए… लेकिन मुझे किसी से गिला-शिकवा नहीं। वक्त और मिट्टी का हर कण सब जानता है।”

वहीं कन्हैया प्रसाद ने खुद को सोशल मीडिया की राजनीति से अलग बताते हुए कहा कि सेवा दिखाने के लिए नहीं की जाती। उन्होंने कहा कि बाढ़, आगलगी कोरोना और संकट के समय उन्होंने लोगों के बीच जाकर मदद की, लेकिन फोटो खिंचवाने में विश्वास नहीं रखा। उनका दावा है कि जनता और जनप्रतिनिधियों का आशीर्वाद इस चुनाव में उनके साथ है।
अब चुनावी शोर थम चुका है। प्रचार का अंतिम अध्याय खत्म हो गया है और अब फैसला उन जनप्रतिनिधियों के हाथ में है जिनकी एक-एक वोट आरा-बक्सर की सियासत का भविष्य तय करेगी। पंचायत से लेकर वार्ड तक, हर वोट अब किसी उम्मीदवार की किस्मत नहीं बल्कि दो राजनीतिक विचारधाराओं और दो परिवारों की प्रतिष्ठा का फैसला करेगा।
अब सवाल यही है कि क्या जन प्रतिनिधी“काम” पर वोट ददेंगे या “खानदान” पर?
क्या राधाचरण साह अपने बेटे को विधान परिषद पहुंचाकर आरा-बक्सर की राजनीति में नया इतिहास लिखेंगे?
या फिर राजद का दामाद फैक्टर इस बार सेठ परिवार की सियासी चाल को मात देगा?
फिलहाल आरा-बक्सर की राजनीति में जुबानी जंग एक चर्चा का विषय बना हुआ है और अब जनता नहीं, जनप्रतिनिधियों की खामोश वोट इतिहास लिखने वाली है।
