आरा, 12 मई। MLC चुनाव में इस बार बड़े नाम और परिवारवाद के राजनीति के बीच सबसे ज्याद चर्चित हैं MLC उपचुनाव के प्रत्याशी मनोज उपाध्याय। पहली बार ऐसा हुआ है कि जिस चुनाव को सिर्फ पैसे के बदौलत जीत मानी जाती थी मनोज उपाध्याय के मैदान में आते ही MLC चुनाव के लिए खड़े सभी प्रत्याशियों को जैसे सांप सूंघ गया है। निर्दलीय मैदान में रहने के बावजूद सबसे ज्यादा लोगों का समर्थन उन्हें प्राप्त है ऐसा सिर्फ मनोज उपाध्याय का दावा ही नहीं सूत्र भी बताते हैं। पार्टी से निष्कासित होने के बाद वे और भी मजबूत प्रत्याशी के रूप उभरे हैं और चुनावी मैदान में खड़े सभी उन्हीं से भयभीत भी हैं। तो क्या सही में जनबल इस बार लोकतंत्र की आवाज बनेगा? चुनाव आज है और यह तय भी जल्द हो जाएगा पर मनोज उपाध्याय की साख की मजबूती ने जमीनी जुड़ाव को निःसंदेह साबित किया है।

जदयू से निष्कासित किए जाने के बाद भी भोजपुर-बक्सर MLC उपचुनाव के निर्दलीय उम्मीदवार मनोज उपाध्याय ने पार्टी और नेतृत्व के प्रति सम्मान जताते हुए खुद को “जनता और जनप्रतिनिधियों का उम्मीदवार” बताया है। उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी, बल्कि पार्टी ने उन्हें छोड़ा है।
मनोज उपाध्याय ने कहा कि“पार्टी आज भी मेरे लिए मंदिर है। मैंने संगठन नहीं छोड़ा है, लेकिन जनता और जनप्रतिनिधियों के विश्वास को भी मैं अनदेखा नहीं कर सकता। लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है, यह मैं नहीं बल्कि संविधान कहता है, और मैं उसी का पालन कर रहा हूं।”
उन्होंने दावा किया कि जिस तरह का समर्थन उन्हें स्थानीय जनप्रतिनिधियों और जनता से मिल रहा है, वह इस चुनाव को ऐतिहासिक बना सकता है। यह चुनाव बताएगा कि हर जीत धनबल से तय नहीं होती। लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जनबल होता है। उपाध्याय ने खुद को जाति और परिवारवाद की राजनीति से अलग बताते हुए कहा कि वे हमेशा भरोसे और सेवा की राजनीति में विश्वास करते हैं।
उन्होंने कहा कि“ना मैं भाई-भतीजावाद की राजनीति करता हूं और ना ही उसके सहारे खड़ा हूं। अगर यह जीत होती है तो यह सिर्फ मनोज उपाध्याय की जीत नहीं होगी, बल्कि भोजपुर-बक्सर की भरोसेमंद जनता और लोकतंत्र की जीत होगी।”
यही नहीं उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि यह चुनाव सिर्फ एक सीट की लड़ाई नहीं, बल्कि उस सोच की परीक्षा है जिसमें यह तय होगा कि राजनीति का भविष्य धनबल और पुराने समीकरण तय करेंगे या फिर जनता का भरोसा।
अब राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जनप्रतिनिधियों के दावों और सियासी समीकरणों के बीच आखिर वोट किस ओर करवट लेता है। क्या यह चुनाव सचमुच लोकतंत्र की नई इबारत लिखेगा, या फिर राजनीति के पुराने ढांचे ही एक बार फिर भारी पड़ेंगे इसका फैसला आज का वोट आने वाले दिनों में चुनाव का परिणाम तय कर देगा ।
