पांच दशक पहले बाढ़ ने उजाड़ दिया था सुरौंधा टापू, आज भी अपने ही घर की जमीन पर मालिक नहीं हैं 250 विस्थापित परिवार
तीन पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन नहीं मिला मालिकाना हक; सरकारी दफ्तरों से लेकर अदालत तक लगा चुके हैं गुहार
विशेष रिपोर्ट: ओ.पी. पांडेय | पटना नाउ |
कोईलवर (भोजपुर),12 जुलाई. “हमारे पास घर है, लेकिन वह आज भी कागज पर हमारा नहीं है…” यह दर्द है भोजपुर जिले के कोईलवर नगर पंचायत अंतर्गत स्थित सुरौंधा कॉलोनी के उन परिवारों का, जिन्हें वर्ष 1972 में सोन नदी की भीषण बाढ़ के बाद सुरौंधा टापू (सुरौंधा टोंक) से विस्थापित कर यहां बसाया गया था। पांच दशक बीत चुके हैं। सरकारें बदलीं, अधिकारी बदले, जनप्रतिनिधि बदले, लेकिन इन परिवारों को आज तक उस जमीन का मालिकाना हक नहीं मिल सका, जिस पर वे तीन पीढ़ियों से रह रहे हैं.

एक रात में उजड़ गया पूरा गांव
वर्ष 1972 में सोन नदी का जलस्तर इतना बढ़ा कि लगभग 1000 एकड़ में फैला सुरौंधा टापू बाढ़ की चपेट में आ गया. करीब 250 परिवारों को अपना घर, खेत, पशुधन और वर्षों की कमाई छोड़कर जान बचानी पड़ी.

प्रशासन ने राहत अभियान चलाकर लोगों को सुरक्षित निकाला और कोईलवर में पुनर्वास किया. यही पुनर्वास स्थल आज सुरौंधा कॉलोनी के नाम से जाना जाता है.
साझी संस्कृति की मिसाल है सुरौंधा कॉलोनी
सुरौंधा कॉलोनी केवल एक पुनर्वास बस्ती नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता की भी मिसाल है. यहां मलाह, बिंद, कोइरी, दुसाध, चमार और यादव समुदाय के परिवार बड़ी संख्या में रहते हैं. इसके अलावा यहां लगभग 60 मुस्लिम परिवार भी निवास करते हैं. वर्षों से सभी समुदाय एक साथ रहकर इस बस्ती की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखे हुए हैं.

पहले टापू इससे कहीं बड़ा था
विस्थापितों के अधिकार की लड़ाई लड़ रहे सुपारी लाल बताते हैं कि आज भी सुरौंधा टापू में लगभग 1000 एकड़ भूमि बची हुई है. पहले इसका क्षेत्रफल लगभग दोगुना था, लेकिन सोन नदी के लगातार कटाव ने इसका बड़ा हिस्सा अपने आगोश में ले लिया.

उनके अनुसार, सरकार ने जिन लोगों को बसाया, उन्हें बंजर और नीची जमीन दी गई. लोगों ने अपनी मेहनत से उसे रहने लायक बनाया, लेकिन आज तक उस जमीन का कानूनी स्वामित्व नहीं मिला.

“सरकार ने हमें बसाया जरूर, लेकिन मालिक नहीं बनाया. अब बस यही सपना है कि मरने से पहले अपने घर का कागज हाथ में देख लें” – सुपारी लाल
सीओ से मुख्यमंत्री तक लगाई गुहार
सुरौंधा कॉलोनी के लोगों की लड़ाई लड़ रहे सुपारी लाल बताते हैं कि उन्होंने सीओ कार्यालय, प्रखंड कार्यालय, डीएम, विधायक, सांसद, मंत्री और समाधान यात्रा के दौरान भोजपुर आए तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक अपनी बात पहुंचाई.
उन्होंने जिला लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी से लेकर प्रमंडलीय लोक शिकायत निवारण प्राधिकार तक शिकायत दर्ज कराई. 19 जून को भी मामले की सुनवाई हुई, लेकिन समाधान आज तक नहीं निकला.
उनका कहना है कि वर्षों से लोग एक ही मांग कर रहे हैं- जिस जमीन पर सरकार ने बसाया है, उसका वैध स्वामित्व दिया जाए. लेकिन पांच दशक बीत जाने के बाद भी यह मांग पूरी नहीं हो सकी.
करीब 60 वर्ष की उम्र पार कर चुके सुपारी लाल कहते हैं कि उनकी सबसे बड़ी इच्छा यही है कि सरकार उन्हें उस पांच डिसमिल जमीन का मालिकाना हक दे दे, ताकि अगली पीढ़ी यह कह सके कि यह घर वास्तव में उनका अपना है.
तीसरी पीढ़ी भी उसी इंतजार में
करीब 50 वर्षीय श्याम प्रकाश कहते हैं कि जब उनके माता-पिता यहां आए थे, तब वे बच्चे थे. आज उनके अपने बच्चे भी बड़े हो चुके हैं, लेकिन घर का मालिकाना हक अब भी अधूरा है.

उनका आरोप है कि एक ही कॉलोनी में कुछ लोगों की जमीन की रसीद काट दी गई, जबकि बड़ी संख्या में परिवार आज भी रसीद और पर्चे के इंतजार में हैं.
“अगर एक ही योजना के तहत बसाए गए लोगों में कुछ को अधिकार मिल सकता है, तो बाकी लोगों को क्यों नहीं?” – श्याम प्रकाश
घर मिला, लेकिन सुविधाएं नहीं
सुरौंधा कॉलोनी की जमीन आसपास के क्षेत्र से काफी नीची है. नतीजा यह है कि बारिश के मौसम में पूरी कॉलोनी जलमग्न हो जाती है. जलनिकासी की समुचित व्यवस्था आज तक नहीं हो सकी है.स्थानीय लोगों का कहना है कि चुनाव के समय नेता वादों के साथ आते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही यह कॉलोनी फिर अपने हाल पर छोड़ दी जाती है.

अपने हिस्से की जमीन से बनाया मंदिर और स्कूल
विस्थापितों ने केवल अपने घर ही नहीं बनाए, बल्कि अपनी जमीन से काली मंदिर, शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, गोरैया बाबा का स्थान और सामुदायिक परिसर के लिए भी जगह छोड़ी.


इसी तरह प्राथमिक विद्यालय के लिए भी भूमि दी गई. आज यहां पांच कमरों वाला विद्यालय संचालित है, जिसमें करीब 300 बच्चे पढ़ते हैं और 14 शिक्षक कार्यरत हैं. बढ़ती छात्र संख्या को देखते हुए ग्रामीण अतिरिक्त कमरों की मांग कर रहे हैं.
क्या कहता है प्रशासन?
इस संबंध में कोईलवर नगर पंचायत की कार्यपालक पदाधिकारी प्रियंका कुमारी ने बताया कि सहयोग शिविर में सुरौंधा कॉलोनी के लोगों का आवेदन प्राप्त हुआ है.
उन्होंने कहा कि भू-अर्जन कार्यालय से संबंधित अभिलेख मंगाए गए हैं. कागजात का मिलान करने के बाद विस्थापितों के हित में जो भी नियमानुसार कार्रवाई होगी, वह की जाएगी.
पांच दशक से एक ही सवाल…
बाढ़ का पानी बहुत पहले उतर चुका है, लेकिन सुरौंधा कॉलोनी के लोगों की आंखों में इंतजार आज भी ठहरा हुआ है. यह लड़ाई केवल पांच डिसमिल जमीन की नहीं, बल्कि सम्मान, पहचान और उस अधिकार की है, जिसे पाने के लिए एक नहीं, तीन पीढ़ियां सरकारी दफ्तरों की चौखट घिस चुकी हैं.
अब देखना यह होगा कि क्या पांच दशक से अधूरी यह पुनर्वास की कहानी कभी पूरी होगी, या सुरौंधा कॉलोनी के लोग आने वाली चौथी पीढ़ी को भी यही संघर्ष विरासत में सौंपेंगे.
