अपनों के हाथों लुटता भोजपुरी गीत-संगीत

By pnc Sep 23, 2016
भोजपुरी भाषा नहीं,संस्कार हैbhojpuri

इ ह भोजपुरिया माटी

माई के लोरी, गांव के खोरी




सावन के कजरी, फागुन के होरी

पटनी प चटनी, चइत के कटनी

पकवा इनार प सांवर गोरी

अस्सी साल में लौटल जवानी

सोन आ गंगा के गमगमवा पानी

ना केहू ठटले बा ना केहू ठाटी

धनि-धनि-धनि इ ह भोजपुरिया माटी

bhojpuri

उपरोक्त पंक्तियां भोजपुरी और भोजपुरी भाषियों की अकूत क्षमता का एक नमूना भर हैं. लेकिन लोक विरासत की समृद्ध परंपरा से परिपूर्ण भोजपुरी गीत-संगीत आज अपने ही समाज के हाथों लुट-पिट रहा है. सभी बातों के अलावा हमारी भोजपुरी की खास पहचान उसकी अपनी गीत-संगीत परंपरा है. लेकिन अफसोस कि अपने पारंपरिक गीतों और धुनों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर भोजपुरी आज अश्लीलता का पर्याय बन गयी है.

व्यावसायिक लाभ के लिए तथाकथित भोजपुरी सम्राटों ने अश्लीलता का साम्राज्य फैला दिया है और उल-जुलूल गानों से भोजपुरी को बदनाम कर दिया है. बेहद कानफोड़ू धुन के साथ-साथ ऐसे शब्द जिन्हें सुनकर शर्म आती है. यही कारण है कि अपनी सुमधुर धुनों के लिए हर वर्ग में सुने जानेवाले भोजपुरी गाने आज ऑटो, ट्रक और ट्रैक्टर के ऑडियो सिस्टम की शोभा बनकर रह गए हैं. साल में सैकड़ों भोजपुरी फिल्में भी बन रही हैं, लेकिन छोटे शहरों की बात छोड़ दें तो बिहार की राजधानी पटना में एक सिनेमा हॉल इन फिल्मों के लिए फिक्स है.जाहिर है जिन फिल्मों में भोंडापन के अलावा कुछ रहेगा ही नहीं उन्हें देखने कौन जाएगा. भोजपुरी फिल्में बनाते कौन हैं- जिन्हें न भोजपुरी का भ भी नहीं आता, जिन्हें भोजपुरी सभ्यता और संस्कृति से कोई सरोकार नहीं है.bhojpurilanguage

कलाकारों की फेहरिस्त में देख ही लीजिए- मनोज तिवारी, पवन सिंह, खेसारी लाल यादव, निरहुआ और हिंदी की सी ग्रेड फिल्मों की हीरोइनें. सबने मिलकर विश्व की सबसे लोकप्रिय लोकभाषा की बुरी गत कर दी है. अपनी बोली और धुनों के दम पर सार्वदेशिक और सार्वकालिक हो चुकी भोजपुरी आज अपने खुद के समाज और देश में फूहड़पन का प्रतीक बनती जा रही है. एक समय था जब रघुवीर सहाय की रचना- सुंदर सुभूमि भैया..भारत के देशवा से मोरा प्रान बस हिम खोह रे बटोहिया…देश की आजादी की आवाज़ बना था. इस गीत के बोल और पारंपरिक धुन की मिठास का संगम हृदय के एक-एक कोने को झकझोर देता है.

डॉ. राजेंद्र प्रसाद की प्रेरणा से नाजिर हुसैन ने भोजपुरी फिल्म-निर्माण की कोशिश शुरू

भोजपुरी गीत-संगीत की लोकप्रियता को आधुनिक युग में खास पहचान तब मिली जब देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की प्रेरणा से भोजपुरी भाषी नाजिर हुसैन ने भोजपुरी फिल्म-निर्माण की कोशिश शुरू की. उनकी कोशिश रंग लाई और विश्वनाथ शाहाबादी के सहयोग से नाजिर हुसैन ने पहली भोजपुरी फिल्म ए गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो का निर्माण किया. फिल्म का निर्देशन कुंदन सिंह ने किया और विश्वास मानिए इस फिल्म के गीत-संगीत ने व्यावसायिक सफलता के नए आयाम स्थापित कर दिए. ए गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो, काहे बांसुरिया बजवले, सोनवा के पिंजरा में बंद भइल आदि गीत आम से लेकर खास की जुबान पर चढ़ गए. यहां तक कि  सोनवा के पिंजरा में बंद भइल- इस गाने से मोहम्मद रफी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी फीस लेने से भी इनकार कर दिया.

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भोजपुरी गीत-संगीत की लोकप्रियता का इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बॉलीवुड के तमाम बड़े शीर्ष गायक-गायिकाओं- रफी साहब, मन्नाडे, किशोरदा, महेंद्र कपूर, तलत महमूद, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, उषा मंगेशकर आदि कलाकारों ने भोजपुरी फिल्मों में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा. यही नहीं कई हिंदी फिल्मों के कई लोकप्रिय गाने भोजपुरी लोक-संगीत से ही प्रेरित थे. तेरे सुर और मेरे गीत का टाइटल सॉंग हो या तीसरी कसम का चलत मुसाफिर मोह लिया..इन सबों की लोकप्रियता में भोजपुरी धुनों का ही कमाल था. भोजपुरी परिवेश पर बनी राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म नदिया के पार को कौन भूल सकता है ? इस फिल्म ने तो उस समय के सारे कीर्तिमान तोड़ डाले थे. कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया..सांची कहे तोहरे आवन से..जोगी जी धीरे-धीरे आदि गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं.

फिल्मों की बात छोड़ दें तो भी भोजपुरी की संगीत विरासत विविधताओं से भरी है. चैती, कजरी, फगुआ और बारहमासा की लोकप्रियता कौन नकार सकता है. सोहर, झूमर, खिलौना तो भोजपुरी न जाननेवालों को भी झूमने पर मजबूर कर देता है. शास्त्रीय गायन की परंपरा ठुमरी मूलतः भोजपुरी संगीत विरासत की ही एक विधा है और विश्वास मानिए कि ठुमरी सुनने के बाद तन-मन को अवर्णनीय आनंद की अनुभूति होती है. और आज स्थिति ये है कि भोजपुरी गानेवालों ने संहारकर्ता भगवान शिव को गणेशजी का पापा बना दिया है..हमसे भंगिया ना पिसाई ए गणेश के पापा..गानों का स्तर इस कदर गिर गया है कि लोगों के बीच की तो बात छोड़ दीजिए..आप अकेले में इन्हें सुनने और गाने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे..बीच में द्विअर्थी गीतों की बात होती थी लेकिन अब वो परदा भी पूरी तरह फट चुका है. यहां कुछ ऐसे ही अश्लील गानों का जिक्र करना चाहता था लेकिन…हिम्मत जवाब दे रही है. वास्तव में इन गानों को सुनकर भोजपुरी-प्रेमियों का हृदय रोने लगता है.

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कहां गई  भिखारी ठाकुर की वो नौटंकी परंपरा जिसमें समाज की कुरीतियों पर गीत-संगीत के माध्यम से करारा प्रहार और महेंद्र मिश्र की वो पूर्वी जिसमें विरह-वेदना अपने चरम पर है. सवाल ये कि आखिर ये समृद्ध परंपरा क्यों लुप्त होती जा रही है. ? पद्मश्री विंध्यवासिनी देवी, कुमुद अखौरी, शांति जैन, भरत सिंह भारती, संतराज सिंह रागेश आदि गायकों को क्यों नहीं सुना जा रहा है ? ये सवाल भोजपुरी भाषा और उसकी विरासत का हित चाहनेवाले सभी लोगों के लिए मौजूं है. इस स्थिति में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना ऐसे लोगों को बढ़ावा देना है जो स्वार्थ के लिए भोजपुरी भाषा की गलत परिभाषा लिख रहे हैं. अपने घर में अपने लोगों से लड़ाई मुश्किल है जरूर है लेकिन इतनी भी नहीं कि अनैतिकता और अश्लीलता का झंडा बुलंद करनेवालों का सिर नीचा न किया सके.

पंडित उमेश कुमार मिश्र

By pnc

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