नालंदा की विरासत के संग सजा ‘लिट भी और लिट्टी भी’, राजगीर में शुरू हुआ इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल
देशभर के साहित्यकारों ने जलाया ज्ञान का दीप, 12 से 15 मार्च तक इतिहास, साहित्य और संस्कृति पर होंगे सत्र
राजगीर, 12 मार्च। नालंदा की ऐतिहासिक धरती पर आयोजित नालंदा इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल 2026 का उद्घाटन राजगीर स्थित कन्वेंशन सेंटर के ओपन मंच पर भव्य तरीके से किया गया। 12-15 मार्च तक चलने वाले इस लिटरेचर कार्यक्रम का शुभारंभ देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों और विद्वानों ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया।


इस अवसर पर अजय सिंह(राष्ट्रपति के पूर्व प्रेस सलाहकार), ओम थानवी(जनसत्ता के पूर्व एडिटर), अजय ब्रह्मात्मज(सिनेमा साहित्य के दिग्गज लेखक ), डॉ. कविता शर्मा (पूर्व प्राचार्य, हिंदू कॉलेज), आकाश पसरीचा, डॉ. आनंद सिंह (सीनियर प्रोफेसर), संजीव मुकेश, पंकज कुमार, गगन, निर्मल वैद्य, वैशाली सत्ता, अदिति नंदन और शैलेश कुमार समेत कई साहित्यिक हस्तियां मौजूद रहीं। कार्यक्रम में ज्ञान निकेतन की छात्राओं ने स्वागत नृत्य प्रस्तुत कर अतिथियों का अभिनंदन किया।

कार्यक्रम में यह भी उल्लेख किया गया कि डॉ. कविता शर्मा, आकाश पसरीचा और डॉ. आनंद सिंह जैसी प्रतिष्ठित हस्तियों ने नालंदा पर महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखकर इस ऐतिहासिक धरोहर को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने का कार्य किया है। वहीं नालंदा कॉलेज के प्राचार्य सत्र के पहले पैनल में पैनलिस्ट के रूप में शामिल हुए।

मंच संचालन बिहार के चर्चित उद्घोषक शैलेश कुमार ने किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा,“इस बिहार की पावन धरती, इस नालंदा की धरा पर आप सभी का हार्दिक स्वागत है। मुझे मंच संचालन की जिम्मेदारी मिली है, लेकिन मेरे सामने बैठे लोग मुझसे कहीं अधिक विद्वान और अपने आप में प्रकाश स्तंभ हैं। नालंदा इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल 2026, जिसे अमात्य फाउंडेशन ने आपके बीच समर्पित किया है, हमें धीरे-धीरे उस काल की ओर ले जाने का प्रयास कर रहा है, जब पाँचवीं शताब्दी में नालंदा में जमीन पर इसी तरह बैठकर ज्ञान की चर्चा और अध्ययन हुआ करता था। आज हम उसी परंपरा को फिर से जीवंत करने का प्रयास कर रहे हैं।”


उन्होंने अमात्य फाउंडेशन की टीम की सराहना करते हुए कहा कि जिस तरह किसी उजड़े हुए गांव को कुछ उत्साही लोग फिर से संवारने का प्रयास करते हैं, उसी तरह वैशाली सत्ता, अदिति नंदन और दिव्या भारद्वाज की टीम ने इस फेस्टिवल की परिकल्पना को साकार किया है।

कार्यक्रम के दौरान बिहार की साहित्यिक परंपरा का भी उल्लेख हुआ। उन्होंने पुराने दिनों की बात को याद करते हुए कहा कि एक बार नेहरू जी जब सीढी चढ़ते हुए लड़खड़ाए तो राष्ट्रकवि दिनकर ने उन्हें संभालते हुए कहा कि जब राजनीति लड़खड़ाती है तो साहित्य समाज को संभालने का काम करता है।


इसी धरती ने वीर कुंवर सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानी और देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे महान व्यक्तित्व दिए हैं। फेस्टिवल का टैगलाइन “Lit भी और Litti भी” खास आकर्षण का केंद्र रहा, जो बिहार की साहित्यिक समृद्धि के साथ-साथ यहां के प्रसिद्ध व्यंजन लिट्टी-चोखा की पहचान को भी दर्शाता है। इस फेस्टिवल में आने वाले सारे अतिथियों को बिहार की खास व्यंजनों को खास बिहारी शेफ़ो द्वारा परोसा भी जाएगा।

इस मौके पर लेखिका वैशाली सेता ने अपने नाम से जुड़ा एक दिलचस्प अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि मुंबई में जन्मी और गुजरात से जुड़ी होने के कारण बचपन में उन्हें अपने नाम “वैशाली” से चिढ़ होती थी, क्योंकि महाराष्ट्र में कई कैफे का नाम भी वैशाली होता है। लेकिन 2007 में अदिति नंदन के संपर्क में आने और बिहार आने के बाद उन्हें पता चला कि विश्व के पहले गणराज्य का नाम वैशाली था। ये जानने के बाद उन्हें अपने नाम प्यार हो गया और इसके बाद इस गौरवशाली गणराज्य के पन्नो को उन्होंने बिहार के कोने कोने से खोजना शुरू किया। उनके दोस्त अदिति नंदन और कई लोगों ने मिलकर काम करना शुरू किया ताकि बिहार के उस गौरव को फिर से दुनिया में फैले सारे बिहार एक मंच पर आकर सार्थक के सकें। तब से लगातार वे बिहार में हीं हैं।

उन्होंने कहा कि आज जिस परिसर में यह लिटरेचर फेस्टिवल हो रहा है, वहां कार्यक्रम होते देखना उनके लिए भावुक क्षण है। उन्होंने बताया कि बिहार ज्ञान और इतिहास की धरती है, जहां करीब 400 स्थानों पर आदि मानवों द्वारा बनाए गए शैलचित्र मौजूद हैं, जिन्हें उन्होंने बिहार सरकार को सौंपकर धरोहर के रूप में संरक्षित करने की पहल की है। फेस्टिवल के पहले दिन साहित्य, इतिहास और संस्कृति से जुड़े कई सत्रों में देशभर से आए विद्वानों ने अपने विचार साझा किए।
