भोजपुरी भाषा को अब भी इंतजार, लेकिन भोजपुरी संस्कृति ने मारी बाजी: भोजपुर की पीड़िया पेंटिंग को मिला GI टैग
बिहार के तीन कलाओं को मिला GI टैग, भोजपुर की पीड़िया भी शामिल
आरा/पटना,15 जून(ओ पी पाण्डेय)। भोजपुरी भाषा को आज भी संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिलने का इंतजार है, लेकिन भोजपुरी संस्कृति ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। भोजपुर की पारंपरिक पीड़िया पेंटिंग को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिल गया है। यह केवल एक कला शैली को मिली मान्यता नहीं, बल्कि भोजपुरी अस्मिता, लोक परंपरा और उन कलाकारों के दशकों लंबे संघर्ष की जीत है, जिन्होंने इस विरासत को जीवित रखा।

नाबार्ड और बिहार सरकार के प्रयासों से बिहार के तीन पारंपरिक उत्पादों एवं कला शैलियों को GI टैग मिला है। इनमें भोजपुर की पीड़िया पेंटिंग के अलावा नालंदा की बावन बूटी और गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला भी शामिल हैं। हालांकि इन तीनों में सबसे खास चर्चा भोजपुरी अंचल की पीड़िया पेंटिंग को लेकर है, क्योंकि यह पहली बार है जब भोजपुरी सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी किसी चित्रकला शैली को इस तरह की राष्ट्रीय पहचान मिली है।

सर्जना न्यास की पहल बनी आधार

जानकारों के अनुसार पीड़िया पेंटिंग को GI टैग दिलाने की प्रक्रिया में आरा की सांस्कृतिक संस्था सर्जना न्यास की भूमिका महत्वपूर्ण रही। लगभग एक वर्ष पूर्व संस्था द्वारा पीड़िया शैली से जुड़े चित्र, दस्तावेज, ऐतिहासिक संदर्भ और आवश्यक जानकारियां उपलब्ध कराई गई थीं, जिसने GI पंजीकरण की प्रक्रिया को मजबूती प्रदान की। सर्जना न्यास विश्व रिकॉर्डधारी चित्रकार संजीव सिन्हा की संस्था है। संजीव सिन्हा पिछले लगभग 30 वर्षों से भोजपुरी पेंटिंग और उसकी विशिष्ट लोक शैलियों पर निरंतर कार्य कर रहे हैं। उन्होंने भोजपुरी समाज के लोकगीत, लोककथाओं, विवाह संस्कारों, पर्व-त्योहारों, कृषि संस्कृति और ग्रामीण जीवन को अपनी चित्रकला के माध्यम से देश और विदेश तक पहुंचाया है।
दीवारों से निकलकर दुनिया तक पहुंचेगी पीड़िया

भोजपुर क्षेत्र में पीड़िया पेंटिंग सदियों से महिलाओं द्वारा बनाई जाती रही है। यह पेंटिंग बहनों द्वारा भाई की लंबी आयु के लिए 15 दिनों तक दीवार पर बनाने का एक उत्सव है। यह केवल चित्र नहीं, बल्कि लोक स्मृति का दस्तावेज है। इसमें परिवार, रिश्ते, प्रकृति, कृषि, लोकदेवताओं और सामाजिक जीवन की झलक दिखाई देती है। गांवों की मिट्टी की दीवारों पर उकेरी जाने वाली यह कला अब वैश्विक बाजार और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचने की तैयारी में है।
अब सिर्फ मधुबनी नहीं, बिहार की और भी पहचानें
अब तक बिहार की कला का पर्याय लगभग मधुबनी पेंटिंग को ही माना जाता रहा है। GI टैग मिलने के बाद पीड़िया पेंटिंग और गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान बनाएंगी।
नालंदा की बावन बूटी हाथकरघे पर बुनी जाने वाली एक विशिष्ट वस्त्रकला है, जिसमें 52 प्रकार के बौद्ध एवं सांस्कृतिक प्रतीकों को बुना जाता है।

वहीं गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला अपनी बारीक नक्काशी और काले ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित मूर्तियों के लिए देशभर में प्रसिद्ध है।
रोजगार और पहचान दोनों बढ़ेंगे
विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने के बाद पीड़िया पेंटिंग से जुड़े कलाकारों, विशेषकर ग्रामीण महिलाओं और लोक चित्रकारों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। इससे न केवल कला का संरक्षण होगा, बल्कि कलाकारों की आय और बाजार तक पहुंच भी बढ़ेगी।
यह शुरुआत है, मंजिल नहीं : संजीव सिन्हा



चित्रकार संजीव सिन्हा का कहना है कि GI टैग मिलना एक बड़ी उपलब्धि जरूर है, लेकिन असली चुनौती अब शुरू होती है। जरूरत इस बात की है कि पीड़िया पेंटिंग को देश और दुनिया के बाजार तक पहुंचाया जाए, कलाकारों को प्रशिक्षित किया जाए और इस कला को नई पीढ़ी से जोड़ा जाए।
इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से नाबार्ड के मुख्य महाप्रबंधक गौतम कुमार सिंह, भोजपुर के पुर्व प्रबंधक रंजीत सिन्हा, और जीआई पंजीकरण की प्रक्रिया में ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन (HWA), वाराणसी के महासचिव, पद्मश्री डॉ. रजनीकांत जी जिन्होंने कानूनी प्रक्रिया और दस्तावेजी करण में सहायता की। इसके साथ ही सर्जना न्यास से जुड़े कलाकारों, सहयोगीयो, शुभचिंतकों की भूमिका अहम रही।
भोजपुरी भाषा को भले ही अब तक संवैधानिक मान्यता नहीं मिली हो, लेकिन पीड़िया पेंटिंग को मिला GI टैग यह साबित करता है कि भोजपुरी संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी, समृद्ध और वैश्विक महत्व की हैं। यह उपलब्धि केवल भोजपुर की नहीं, बल्कि पूरे भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक जीत है। इस खबर के बाद लगभग सभी कला के विधाओं के कलाकारों, साहित्यकारों और सांस्कृति कर्मियों के खुशी की लहर है वे सभी एक दूसरे को बधाई दे रहे हैं वही चित्रकार कमलेश कुंदन, सुरेश पाण्डेय,रौशन राय, मीरा, खुशबू,अमन सहित कई लोगों ने इसे कलाकारों के मेहनत की जीत बताया है और संजीव सिन्हा के इस प्रयास की प्रशंसा की है।
