संस्कृत और संस्कृति पर संकट

By pnc Sep 18, 2016

पटना नाउ Exclusive


बिहार में देवभाषा के साथ अपमान क्यों ?




संस्कृत और संस्कृति पर गहरा रहा है संकट

29 सालों में एक भी अध्यक्ष अकादमी को नहीं मिला 

संस्कृत न केवल भारत बल्कि दुनिया की सबसे पुरानी उल्लिखित भाषाओं में से एक है.आधुनिक भारतीय भाषाएँ हिन्दी, मराठी, सिन्धी, पंजाबी, बंगला, उड़िया, नेपाली, कश्मीरी, उर्दू आदि सभी भाषाएं इसी से उत्पन्न हैं। इन सभी भाषाओं में यूरोपीय बंजारों की रोमानी भाषा भी शामिल है।संस्कृत का अर्थ है, संस्कार की हुई भाषा। इसकी गणना संसार की प्राचीनतम ज्ञात भाषाओं में होती है। संस्कृत को देववाणी भी कहते हैं।हिन्दू, बौद्ध, जैन आदि धर्मों के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में ही हैं. हिन्दुओं के सभी पूजा-पाठ और धार्मिक संस्कार की भाषा संस्कृत ही है.हिन्दुओं, बौद्धों और जैनों के नाम भी संस्कृत भाषा पर आधारित होते हैं. कहा जाय तो संस्कृत, भारत को एकता के सूत्र में बाँधती है.संस्कृत का प्राचीन साहित्य अत्यधिक प्राचीन, विशाल और विविधता से पूर्ण है. इसमें अध्यात्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, और साहित्य की भरपूर सामग्री है. इसका प्रभाव सम्पूर्ण विश्व के चिंतन पर पड़ा है और संस्कृत भारत की संस्कृति का यह एकमात्र सुदृढ़ आधार है. भारत की लगभग सभी भाषाएं अपने शब्द-भंडार के लिए आज भी संस्कृत पर आश्रित हैं. संस्कृत साहित्य इतना विशाल और विविधतापूर्ण है कि ‘संस्कृत में क्या-क्या है?’ – यह पूछने के बजाय प्रायः पूछा जाता है कि ‘संस्कृते किं नास्ति?’ (संस्कृत में क्या नहीं है?)। अनुमान है कि संस्कृत की पाण्डुलिपियों की कुल संख्या 1 करोड़ से भी अधिक होगी. यह इतनी अधिक है कि बहुत सी पाण्डुलिपियाँ अभी तक सूचीबद्ध नहीं की सकी है, उन्हे पढ़ना और उनका अनुवाद आदि करना बहुत दूर की बात है.af8e2318-7c7e-4b37-8090-35822175bea1

बिहार के संदर्भ में अगर संस्कृत की बात की जाय तो आज से लगभग ढाई हजार साल पहले प्राचीन विश्व के विख्यात शिक्षा  केंद्रों में अन्यतम स्थान रखनेवाले और नालंदा और विश्वविद्यालय में संस्कृत के माध्यम से ही देश-विदेश के विद्यार्थी विद्या ग्रहण करते थे. इसके अलावा मंडन मिश्र का इतिहास किससे छुपा है.किवंदती है कि आदि शंकराचार्य जब शास्त्रार्थ के लिए मंडन मिश्र के गांव पहुंचे और कुएं पर पानी भर रही स्त्रियों से उनके घर का पता पूछा तो स्त्रियों ने कहा कि जिस दरवाजे पर तोते आपस में संस्कृत में शास्त्रार्थ कर रहे होंगे, वही उनका घर है और आज उस बिहार में संस्कृत की स्थिति ये है कि राज्य संस्कृत अकादमी बदहाली का दंश झेल रहा है. हालत ये है कि 1987 में स्थापित इस अकादमी को 29 सालों में एक भी अध्यक्ष अभी तक मयस्सर नहीं हो पाया है और विभागीय उपनिदेशक, निदेशक प्रशासन, निदेशक उच्च शिक्षा, संयुक्त सचिव आदि के प्रभार में ही ये अकादमी कैद रही है. कुल मिलाकर 10 सालों तक योजनामद में अकादमी को 2-2 लाख रुपये मिले, लेकिन इस अवधि में गैर योजना मद का अनुदान शून्य रहने के कारण विकास की परिकल्पना अधूरी रही क्योंकि योजना मद में मिली राशि से कर्मचारियों को वेतन दिए गए.वहीं 10 सालों तक गैर योजनामद में 2 से 5 लाख तक की राशि मिली तो योजनामद में विकास के लिए राशि नहीं मिली. अब तो स्थिति ये है कि अकादमी में जो भी कर्मचारी काम रहे हैं..उन्हें वेतन मिले भी 8 महीने हो गए हैं.ऐसे में अकादमी अपने उद्देश्यों को पूरा कर पाने में किस हद तक सफल रही होगी इसे आसानी से समझा जा सकता है. सच्चाई तो ये है कि अकादमी की स्थापना के समय शिक्षा विभाग ने जो सपने बुने थे वो पूरी तरह छलावा बन कर रह गए  हैं.

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                                   क्या हुआ तेरा वादा ?

नीतीश कुमार ने सत्ता में आने के बाद सांस्कृतिक पुनर्जागरण की परिकल्पना का जो दंभ भरा था उसके टूटने का सबसे सटीक उदाहरण है बिहार राज्य संस्कृत शिक्षा अकादमी. सांस्कृतिक पुनर्जागरण की बात तो दूर राज्य शिक्षा विभाग के गैरजिम्मेदाराना प्रवृति के कारण ये अकादमी मूल्यहीन और अप्रांसगिक होती जा रही है. जिस परिसर को संस्कार, संस्कृति और शास्त्रीय शिक्षा शोध का गौरवशाली केंद्र होना चाहिए था आज वो दो कमरों में सिमटा अंतिम सांसें गिन रहा है.अकादमी के पुस्तकालय-सह-वाचनालय में स्नातक, स्नातकोत्तर और संस्कृत के शोध विद्यार्थियों के लिए पाठ्य विषयों और ग्रंथों का भंडार विकसित होना था वहां गिनती की पुस्तकें दीमकों का भोजन बन रही हैं. अप्रैल 2011 में तत्कालीन राज्य सरकार ने हर भाषाई अकादमी को हर साल डेढ़ करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी, जिसमें ये प्रावधान किया गया था कि 50 प्रतिशत राशि स्थापना मद में व्यय होगी जबकि शेष 50 प्रतिशत राशि अन्य विकास कार्यों पर. तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा अनुमोदित प्रस्तावों में- भाषाई अकादमीकर्मियों के लिए सेवाजनक शर्तों के अलावा हर अकादमी को पर्याप्त जगह उपलब्ध कराना, पूर्णकालिक निदेशक देना सहित कई बड़ी-बड़ी बातें थीं. लेकिन संस्कृत अकादमी को न पूर्णकालिक निदेशक मिला और न ही डेढ़ करोड़ का अनुदान. इसके विपरीत शिक्षा विभाग ने बिहार प्रशासनिक सेवा के विभागीय पदाधिकारियों को निदेशक और अध्यक्ष –सह-निदेशक का प्रभार दे दिया जिनके पास अकादमी के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं है. हालत ये है कि अध्यक्ष का चेंबर खाली पड़ा धूल फांक रहा है.

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देवभाषा की ऐसी उपेक्षा क्यों ?

अकादमी के विधिवत संचालन नहीं होने से केंद्रीय संस्थानों से संबंध कायम करने की पहल पर भी ग्रहण लगा हुआ है. यह जानते हुए भी राज्य में भाषाई अकादमी के सुचारू रूप से  संचालन नहीं होने के कारण राज्य को हर साल करोड़ों के संस्कृत अनुदान से वंचित होना पड़ रहा है, पदाधिकारी कानों में तेल डालकर सोये हुए हैं. शिक्षा विभाग के इस लापरवाही भरे रवैये से रवैया अकादमी का अस्तित्व ध्वस्त होने की कगार पर है. अकादमी के कर्मचारी इतने पस्त हो चुके हैं कि विभागीय पदाधिकारियों के सामने उनकी बोलने की हिम्मत नहीं रह गयी है. अकादमी में कार्यरत हृदयनारायण झा ने बताया कि वे लोग भूखे पेट रहकर भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की जी-जान कोशिश कर रहे हैं लेकिन सरकार का यही रवैया रहा तो संस्कृत अकादमी को बचाना मुश्किल होगा. विद्वानों और संस्कृत विद्यार्थियों की मानें तो राज्य में संस्कृत के विकास को लेकर सरकार इस कदर लापरवाह है कि राज्य संस्कृत अकादमी बिना पूर्णकालिक निदेशक के चल रहा है, संस्कृत शिक्षा बोर्ड भी निदेशक विहीन है और संस्कृत विश्वविद्यालय भी प्रभारी कुलपति के सहारे चल रहा है. देवभाषा और मातृभाषा के अनादर, अपमान और उपेक्षा का कोई इससे बड़ा उदाहरण अतीत और वर्तमान में भूमंडल के किसी राज्य में नहीं है. सवाल ये है कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण की बात करनेवाले नीतीश कुमार के सुशासन में देवभाषा और मातृभाषा की उपेक्षा आखिर क्यों हो रही है.

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रिपोर्ट- पटना से यू के मिश्रा

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