पटना में क्यों दिखा दी गई बच्चों को A ग्रेड फिल्म

कई बच्चों की मानसिक स्थिति पर पड़ा है बुरा असर 

अभिभावक भी नाराज, क्यों हुई ऐसी गलती ?




बिहार स्टेट फिल्म डेवलपमेंट एंड फाइनेंस कारपोरेशन लिमिटेड जो  कला संस्कृति विभाग के अधीन कार्य कर रहा है .जब ये  कारपोरेशन बना तो आनन फानन में तीन दिवसीय बिहार इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया गया.जिसके लिए पास जारी किया गया .कई स्कूलों के बच्चों को विदेशी फिल्म देखने के लिए आमंत्रित किया गया ,स्कूल से बच्चों ने अपने टीचर के साथ शिरकत की .बच्चे फिल्म देख रहे थे. फिल्म थी फ्रेंच की ए टाऊट डी सुइट.फिल्म में अचानक आये सेक्सी दृश्यों ने सब को शर्मसार कर दिया. दृश्य अगर छोटा होता तो उसका उतना बड़ा असर नहीं पड़ता .अब एक लड़की के साथ हो रहे सेक्स के लम्बे दृश्य को बच्चे कितनी देर देखते .लिहाजा बच्चे फिल्म छोड़ कर बाहर आ गये.बच्चे अपने टीचर के साथअपने सहपाठियों के साथ  इस  फिल्म के दृश्यों को नहीं देख सकते थे.उन्होंने विरोध करना शुरू कर दिया.download

आयोजक भी सकते में आ गये.जिस फिल्म को बच्चों से दूर रखा जाना चाहिए था अब तो उसे दिखा दिया गया था.अब आयोजक ने सफाई देनी शुरू कर दी कि फिल्म हम नहीं मंगाते हैं दूतावास भेजता है .स्क्रीनिंग नहीं हुई जल्दीबाजी में फ़िल्में आई .हमने कार्ड के जरिए बता दिया था वगैरह -वगैरह . खैर सवाल ये है कि कैसी संस्कृति दिखा रहे है आप .फ्रेंच की संस्कृति अभी बिहार के बच्चे देख कर क्या सीखेंगे ? चुकी ये एक सरकारी कार्यक्रम था तो आयोजकों ने मामले को रफा दफा कर दिया. मीडिया भी अपने हिसाब से बच्चों के विरोध के स्वर को देख नहीं पाया और अपनी कर्तव्यों की इतिश्री एक छोटी जगह देकर कर  ली. लेकिन जब उन बच्चों और रंगकर्मियों ने इस अश्लील फिल्म दिखाने पर सोशल मीडिया में जम कर अपना विरोध दर्ज कराया. कुछ रंगकर्मी कहते है कि ऐसे आयोजन के पहले फिल्म और स्क्रीनिंग तब आमंत्रण देना चाहिए था .आयोजकों को जब फिल्म के बारे कुछ पता ही नहीं था तो क्यों दिखाई गई फिल्म जहां बड़ों के साथ स्कूल और कॉलेज के बच्चे हो .ऐसे आयोजन सरकार करे लेकिन सावधानी से .जरा गौर से पढ़िए इस खबर को आप समझ जाएंगे कि ए लापरवाही किसकी है और किसे दंड मिलना चाहिए. सरकार अश्लील फ़िल्में जाने अनजाने बच्चों को तो नहीं दिखा सकती है .अगर हॉल में बच्चे बैठे है आप A कैटगरी की फिल्म दिखा रहे है तो उन्हें बाहर क्यों नहीं  निकाला गया. ऐसे सवाल है जिसे कला संस्कृति विभाग और युवा विभाग इस पर एक जांच कमिटी बिठाए और और दोषियों को दंडित करे.  ये मांग उन बच्चों की है  जिन्होंने फ़िल्में देखी. हमने इस मुद्दे पर जब बच्चों और रंगकर्मियों से बात की तो कमोबेश सबका जवाब एक ही था अगर ये गलती हुई तो दोषी कौन ?

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fb_img_1474002615245 पटना रंगमंच पर 20 वर्षों से सक्रिय रंगकर्मी प्रवीण सप्पू  बिहार अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव -2016 पर अपनी राय कुछ ऐसे रखते हैं. मुझे इस मामले में ये कहना है की आने वाले समय में इस तरह की गलतियां ना हो और बिहार के फ़िल्म निर्माण से जुड़े लोगों को ही आयोजन समिति या फ़िल्म सेलेक्शन कमिटी में रखा जाय और दर्शकों की स्क्रूटनी कर के बुलाया जाय. बच्चों को ऐसी फ़िल्म दिखा कर कोई भी बिहार का भला नहीं कर सकता चाहे विश्व पटल पर वो कितना भी क्लासिक सिनेमा क्यूँ ना हो.जो दिखाया गया वो सरासर गलत है भविष्य में ऐसी गलती नहीं दुहरानी जानी चाहिए.दर्शक दीर्घा में बहुत सारे बच्चे 18 साल से कम के भी थे. जब हमने इस बारे में आयोजकों से जानने की कोशिश की तो उन्होंने सीधे शब्दों में कह दिया की ये देखना आयोजक का काम नहीं है और आयोजन समिति के पास कोई उम्र बताने वाली मशीन  नहीं है. आयोजकों ने तो यहां तक कह दिया की ये सारी जिम्मेदारी फ़िल्म दिखाने लाने वाले अभिभावकों का है.

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संत जेवियर के फजल करीम उस घटना को याद कर कहते है कि आयोजक सिर्फ ए बात दे कि क्या वे अपने बच्चों माँ पिता के साथ इस फिल्म को देख सकते हैं  शायद नहीं तो हमें जानते हुए वो फिल्म क्यों दिखाई गई ,हाल में बैठी कम उम्र के बच्चों के ऊपर क्या प्रभाव पड़ा कभी सोंचा है उन्होंने शायद नहीं .हमारी मांग है कि इस आयोजन में जिनकी भी गलती हो उन्हें सजा मिले.
dscn0874पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्र नितिन आर्य भी कुछ ऐसी ही बात करते है वे कहते है कि आज भी हमारे मनमस्तिष्क में वे दृश्य घुमने लगते है .नहीं दिखाना चाहिए था हमे वो फिल्म .कितने बच्चे थे हम तो थोड़े बड़े है लेकिन जिन बच्चों ने फिल्म देखी उन पर क्या बीत रही होगी.

प्रियंका यदुवंशी मेल लिख कर कहती है सच में वो दिन बड़ा दुर्भाग्य वाला दिन था जब हमने इतनी वल्गर फिल्म देखी.हम तो भौंचक थे कि हमने क्या देखा इस बिहार इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में. आयोजकों ने हमें बुलाया और दिखाया .सजा के हकदार तो वे भी है ,हम फिल्म देखकर सजा काट रहे है और वे अपना मनोरंजन कर रहे हैं.

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खुशबु कहती है कि हमें तो ये कह कर बुलाया गया था कि आपको मोटिवेशनल फिल्म दिखाई जायेगी जो फिल्म दिखाई गई क्या वो मोटिवेशनल फिल्म थी ? आयोजक इसे मोटिवेशनल मानते है तो बिहार की लड़कियां अभी इतनी बड़ी नहीं हुई है कि वे अभिभावकों के साथ इस तरह की सेक्स  मोटिवेशनल फिल्म देखें .हमारे साथ जो हुआ अगर आयोजक अधिकारियों और फिल्म विशेषज्ञ के बाल -बच्चों के साथ होता तो आज हाय तौबा मच गया होता .इस बात को हम दबने नहीं देंगे.

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निशांत कहते हैं कि 20 अगस्त का दिन था, हमलोग (पूरी कक्षा) अपनी पहली आउटिंग  के लिए जा रहे थे इसीलिए हम काफी उत्साहित थे और हमारे शिक्षक भी यही सोच कर ले जा रहे थे की बच्चों को कुछ नया सिखने को मिलेगा.
हम सभी वहां ( अधिवेशन भवन ) पहुँचे और मौका था पहला अन्तर्राष्ट्रीय बिहार फ़िल्म फेस्टिवल का. कार्यक्रम को शुरुआत अच्छी दी गयी और कहा गया की हमें ये फ़िल्म काफी पसंद आएगी . फ़िल्म शुरू होती उससे पहले एक व्यक्ति एक छोटी बच्ची को लेकर आया था (जो की शायद उनकी बेटी थी) कार्यक्रम में शामिल होने के लिए. फ़िल्म शुरू हुई और जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ रही थी फ़िल्म में अश्लीलता भी वैसे-वैसे ही बढ़ रही थी. वहां इस बात का कोई ख्याल नहीं रखा गया की एक महिला शिक्षक अपने बच्चों के साथ आई हुई है. जिन्हें लगभग हर दिन अपने उन विद्यार्थियो से मिलना पड़ता है,वो कैसे उस विद्यार्थियो से आँख मिलाएगी. वो क्या कहेंगी की बच्चों तुमलोग क्या देखे और क्या सीखा? वहाँ इस बात की भी ख्याल नहीं की गयी की एक कक्षा के ही लड़के और लड़कियां  बैठे है,जो सहपाठी होने के साथ-साथ एक-दूसरे के मित्र भी है. वहां इस बात का भी ख्याल नहीं किया गया की कोई व्यक्ति एक बहुत छोटी लड़की के साथ भी आया हुआ था.एक बार भी ये सोचा नहीं गया की हमलोग जब ये फ़िल्म देखकर घर जाएंगे और उस फ़िल्म के विषय में पूछा जाएगा तो हम क्या जवाब देंगे? पर सरकार को जबाव देना होगा .

 

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