पैसा ही पैसा….भौतिक सुख और संस्कारों के बीच के कशमकश की कहानी

पटना (ब्यूरो रिपोर्ट) | पैसा ही पैसा….जैसा कि इस उपन्यास के नाम से ही पता चलता है कि इसकी कहानी पैसे की अहमियत पर आधारित होगी. भौतिक सुख सुविधाओं को पाने के लिए किस तरह इंसान अपनी परंपराओं और संस्कारों के बीच की कशमकश में फंसा रहता है, उसका हासिल क्या होता है…इसी धरातल पर आधारित है माधुरी सिन्हा का ये उपन्यास – “पैसा ही पैसा”.
इस उपन्यास का मुख्य पात्र एक ऐसा लड़का है जिसने आर्थिक तंगी देखी है और परेशानियों-मुसीबतों को झेला है, लेकिन पैसा आ जाने पर वह अपनी परंपराओं, अपने संस्कारों को भूल जाता है. उसे लगता है कि पैसे से वह सबकुछ खरीद सकता है. वह भौतिक सुख सुविधाओं की चकाचौंध में खुद को भूल जाता है और उसका अहंकार इस कदर उसपर हावी हो जाता है कि वह भगवान को भी कुछ नहीं समझता, उन्हें भी ललकारता है, नीचा दिखाने की कोशिश करता है.
बालमन और परिवार में मिले सुसंकारों की पृष्ठभूमि पर लिखे गए इस उपन्यास में जहां एक ओर बच्चों की सही परवरिश, उनसे भावनात्मक लगाव की शिक्षा दी गई है तो वहीं दूसरी ओर वही बच्चा जो संस्कारों में पला-बढ़ा है, वह उससे ही ढेर सारा धन पा जाता है. लेकिन अचानक से मिले ढेर सारे पैसे से कैसे उसकी मनोदशा बदल जाती है, वह कैसे अपने संस्कारों को ताक पर रखकर अहंकार से किस तरह से भर जाता है, इसका माधुरी सिन्हा ने इस उपन्यास में बखूबी चित्रण किया है.

आज अपनों से, समाज से हम कितने दूर होते जा रहे हैं कि हमें ये तक पता नहीं है कि हम क्या कर रहे हैं? हम पैसे या रूपये को खा नहीं सकते, पैसे से रोटी नहीं, चैन की नींद नहीं खरीद सकते। पैसे हमें भौतिक सुख दे सकते हैं, लेकिन रिश्ते-नाते नहीं दे सकते। पैसा जरुरी है लेकिन एक हद तक ही.
पारिवारिक मूल्यों और बालमन पर लिखी नॉवेल्टी एंड कंपनी से प्रकाशित यह पुस्तक अत्यंत सराहनीय है और साथ ही अत्यंत रोचक और पठनीय है. माधुरी सिन्हा ने कई कहानियां और उपन्यास लिखा है, जिनमें से प्रमुख हैंः थाम ली बांहें, पायल -ये दोनों उनके चर्चित उपन्यास हैं, जो महिला सशक्तिकरण को केंद्र मे रखकर लिखी गई हैं.