मकर संक्रांति की ये बातें जानना क्यों जरूरी हैं 

क्या होगा मकर संक्रांति पर इस वर्ष खास                                                                 

28 साल बाद बना है अद्भुत संयोग




क्या है लोककथा,क्यों करते है दान ,क्यों खाया जाता है खिचड़ी 

भीष्म पितामह ने क्यों किया इसी दिन शरीर का त्याग

भगवान् विष्णु ने असुरों के साथ ऐसा क्यों किया

शुद्ध घी एवं कम्बल का दान से मोक्ष की प्राप्ति

सूर्य की उत्तरायण की गति शुरू हो जाती हैं 

तमिलनाडु में पोंगल, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक व केरला में संक्रान्ति 

 

इस साल मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही मनाया जाएगा. कई वर्षों के बाद इस वर्ष  मकर संक्रांति के पर्व अवसर पर इस बार बेहद खास शुभ संयोग बन रहा है. 14 जनवरी को दोपहर 1.55 बजे सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे. करीब 28 साल के बाद मकर संक्रान्ति पर सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग के साथ चंद्रमा कर्क राशि में और अश्लेषा नक्षत्र व प्रीति तथा मानस योग रहेगा. मकर संक्रांति का पर्व अमृत सिद्धि के साथ ही अन्य महत्वपूर्ण योगों के साथ मनाया जाएगा.मकर संक्रांति ही भारत की संस्कृति एक मात्र ऐसा पर्व है जिसका निर्धारण सूर्य की गति के अनुसार होता है.पौष मास में जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस काल विशेष को ही संक्रांति कहते हैं. इस दिन से सूर्य की उत्तरायण की गति शुरू हो जाती है.जो कई मामलों में शुभ मन जाता है ,इस दिन के बाद से शुभ कार्य भी शुरू हो जाते हैं.

  

वैसे तो प्रति मास ही सूर्य बारह राशियों में एक से दूसरी में प्रवेश करता रहता है. पर वर्ष की बारह संक्रांतियों में यह सब से महत्वपूर्ण है  यह त्यौहार अधिकतर जनवरी माह की चौदह तारीख को मनाया जाता है. वैसे तो यह प्रतिवर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता लेकिन किसी-किसी वर्ष यह त्यौहार बारह, तेरह या पंद्रह को भी हो सकता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि सूर्य कब धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है.इस दिन से सूर्य की उत्तरायण गति आरंभ होती है और इसी कारण इसको उत्तरायणी भी कहते हैं.

मकर सक्रांति मनाए जाने का यह क्रम हर दो साल के अन्तराल में बदलता रहता है. लीप ईयर वर्ष आने के कारण मकर संक्रांति 2017 व 2018, 2021 में वापस 14 जनवरी को व साल 2019 व 2020 में 15 जनवरी को मनाई जाएगी. यह क्रम 2030 तक चलेगा. इसके बाद तीन साल 15 जनवरी को व एक साल 14 जनवरी को सक्रांति मनाई जाएगी.

ऐसा होने का कारण है, पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमते हुए प्रतिवर्ष 55 विकला या 72 से 90 सालों में एक अंश पीछे रह जाती है. इससे सूर्य मकर राशि में एक दिन देरी से प्रवेश करता हैं. करीब 1700 साल पहले 22 दिसम्बर को मकर संक्रांति मानी जाती थी. इसके बाद पृथ्वी के घूमने की गति के चलते यह धीरे-धीरे दिसम्बर के बजाय जनवरी में आ गयी है. मकर संक्रांति का समय हर 80 से 100 साल में एक आगे बढ़ जाता है. 19 वीं शताब्दी में कई बार मकर संक्रांति 13 और 14 जनवरी को मनाई जाती थी. पिछले तीन साल से लगातार संक्रांति का पुण्यकाल 15 जनवरी को मनाया जा रहा है. 2017 और 2018 में संक्रांति 14 जनवरी को शाम को होगी

 क्या है मकर संक्रांति का महत्व

शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है. इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है. ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है. इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है.

 

मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है. इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है. सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त फलदायक है. यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अन्तराल पर होती है. भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है. मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है. इसी कारण यहाँ पर रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है. किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है. अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है. दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अन्धकार कम होगा. अत: मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है. प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी.

मकर संक्रांति से जुड़ी लोक कहानियाँ

कहा जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाया करते हैं. शनिदेव चूंकि मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है. मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा उनसे मिली थीं. यह भी कहा जाता है कि गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था. उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी. इसलिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है. महाभारत काल के महान योद्धा भीष्म पितामह ने भी अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था.   इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी व सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था. इस प्रकार यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है. यशोदा जी ने जब कृष्ण जन्म के लिए व्रत किया था तब सूर्य देवता उत्तरायण काल में पदार्पण कर रहे थे और उस दिन मकर संक्रांति थी. कहा जाता है तभी से मकर संक्रांति व्रत का प्रचलन हुआ. इस त्यौहार को अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है. मकर संक्रांति को तमिलनाडु में पोंगल के रूप में तो आंध्रप्रदेश, कर्नाटक व केरला में यह पर्व केवल संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है.