शब्दों की सरगम में डूबा नालंदा, कवियों की आवाज़ में झलकी मिट्टी की महक
कविता, विरासत और भावनाओं का संगम: नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल में सजी काव्य संध्या
नालंदा,16 मार्च(ओ पी पाण्डेय)। इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल के अंतिम दिन एम्फीथियेटर में सजी काव्य संध्या ने साहित्य और संवेदना का ऐसा वातावरण रचा कि देर शाम तक श्रोता शब्दों की उस मधुर धारा में डूबे रहे। देश के प्रतिष्ठित युवा कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से नालंदा की विरासत, मिट्टी और मानवीय भावनाओं को स्वर दिया।

साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित और डार्क हॉर्स, औघड़ तथा विश्वगुरु जैसी चर्चित पुस्तकों के लेखक कवि नीलोत्पल मृणाल ने अपनी संवेदनशील कविता से श्रोताओं को गहराई से छू लिया। उनकी पंक्तियाँ –
“थोड़ा सा नदी का पानी,
मुट्ठी भर रेत रख लो,
धान-गेहूं-सरसों वाले
पीले-हरे खेत रख लो…
आने वाली पीढ़ियों को
चल कर दिखाएंगे-
दुनिया ऐसी हुआ करती थी।”
-ने बदलते समय के बीच स्मृतियों और प्रकृति को बचाए रखने का भाव जगाया।

नई दिल्ली में रहकर भी अपनी मिट्टी से जुड़े रहने वाले नालंदा के कवि संजीव कुमार मुकेश ने अपनी कविताओं में राजगीर, मगध और बिहार की गौरवशाली पहचान को स्वर दिया। उनकी पंक्तियाँ-
“मगध का, राष्ट्र का, जन-जन का है अभिमान नालंदा,
विरासत, संस्कृति, जन-मन का गौरव गान नालंदा…
पुनः फैला रहा है विश्व भर में ‘ज्ञान’ नालंदा।”
– सुनते ही सभागार तालियों से गूंज उठा।

उन्होंने राजगीर की आध्यात्मिकता को भी शब्द दिए-
“जब मोह मनुज के ज्ञान को रुद्ध कर देता है,
तब मगध का रज गौतम को बुद्ध कर देता है।”
कवि सम्मेलन का संचालन मेरठ के चर्चित हास्य कवि डॉ. प्रतीक गुप्ता ने अपने चुटीले अंदाज में किया। उन्होंने श्रोताओं से संवाद करते हुए कहा-
“साहित्यिक उत्सव मनाकर खुश हो ना,
ऊँची हस्तियाँ यहाँ बुलाकर खुश हो ना,
पूछ रहा हूँ राजगीर में मैं-
नालंदा की माटी को माथे से लगाकर खुश हो ना।”

दरभंगा से आईं चर्चित कवयित्री डॉ. तिष्या श्री ने अपनी सुरीली आवाज़ और भावपूर्ण प्रस्तुति से काव्य संध्या को और भी मधुर बना दिया। उनकी पंक्तियाँ-
“बड़े आसान लफ़्ज़ों में उसे सरेआम लिखती हूँ,
सुनो तो गीत लगता है मगर पैग़ाम लिखती हूँ…
मुहब्बत जब कहे कोई, उसी का नाम लिखती हूँ।”
– ने श्रोताओं के दिलों को छू लिया।
कवियों की रचनाओं, शब्दों की लय और भावनाओं की गर्माहट ने ऐसा समां बाँधा कि देर शाम तक लोग काव्य-रस में डूबे रहे।
कार्यक्रम के अंत में सभी कवियों को अंगवस्त्र, पुष्पगुच्छ और प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के भग्नावशेष का प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया गया। यह सम्मान आयोजक वैशाली सेता और अदिति नंदन द्वारा प्रदान किया गया।
कुल मिलाकर, यह काव्य संध्या केवल कविताओं का पाठ नहीं थी, बल्कि नालंदा की मिट्टी, उसकी स्मृति और उसके ज्ञान की उस परंपरा का उत्सव थी, जो आज भी शब्दों के माध्यम से दुनिया भर में फैल रही है।
