अनुदानों को समर्पित रहा पटना रंगमंच- विनोद अनुपम

वर्ष 2016 में कई महत्वपूर्ण नाटक हुए पटना में                                                                       

नटमेठिया,गुंडे,गगन दमामा बाज्यो,पटकथा,मैं नास्तिक क्यों हूं




परवेज अख्तर को   भी संगीत नाटक अकादमी अवार्ड के लिए याद किया जाएगा

 पटना में 50 से अधिक रंगसंस्थाएं  सक्रिय

बिज्येन्द्र टांक.पुंज प्रकाश स्वरम उपाध्याय,उदय कुमार,सनत कुमार,मृत्युंजय शर्मा,अजीत कुमार,हरिशंकर रवि,राजेश राजा,जहांगीर खान,शिल्पा भारती,वसुधा,रुबी खातुन,विशाल तिवारी,मनीष महिवाल,सुभाष झा,अदिती सिंह पटना रंगमंच के चेहरे बने

भारतीय रंगमंच में बिहार की बढ़ती  दखल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा आयोजित भारत के सबसे प्रतिष्ठित नाट्योत्सव भारंगम(भारतीय रंग महोत्सव) में भाग लेने के लिए इस बार पांच ऐसे नाट्यदलों का चयन हुआ है,जिनका बिहार के रंगमंच से सरोकार रहा है,पटना इप्टा(गबरघिचोर),रागा(आउटकॉस्ट-अक्करमासी),प्रवीण सांस्कृतिक मंच(गुंडे),मेलोरंग का नाटक और संजय उपाध्याय का ‘आनंद रघुनंदन’ शामिल हैं.यह चयन इस बात का भी प्रतीक है कि बिहार का रंगमंच अपनी परंपरागत विशेषताओं के साथ आधुनिक रंग व्याकरण के लिए भी तैयार हो चुका है,जिसकी झलक पूरे साल नटमेठिया,गुंडे,गगन दमामा बाज्यो,पटकथा,मैं नास्तिक क्यों हूं जैसे नाटकों में मिलती रही.

सरकारी सेवा से अवकाश प्राप्ति के बाद परवेज अख्तर की सक्रियता के लिए भी यह वर्ष याद किया जाएगा.इस वर्ष रंगमंच में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी अवार्ड से भी उन्हें सम्मानित किया गया.अक्षरा आर्ट्स की प्रस्तुति उदय प्रकाश की कहानी पर आधारित अजीत कुमार के नाटक ‘और अंत में प्रार्थना’ में अभिनेता के रुप में उनके अवतरण ने कई दर्शकों को विस्मित किया.बिहार कला पुरस्कार अपने शुरुआती दिनों से ही विवाद में रहा है.यह संयोग ही माना जा सकता है कि इस वर्ष विभिन्न विधाओं में योगदान के लिए पटना रंगमंच पर निरंतर सक्रिय सोमा चक्रवर्ती,बिज्येन्द्र टांक,हसन इमाम और मृत्युंजय शर्मा को एकसाथ सम्मानित होने का अवसर मिला, और पूरे कलाजगत ने इस निर्णय का उत्साह से स्वागत किया. यदि 2016 की रंगयात्रा पर नजर डालें तो हर वर्ष की तरह नाट्य महोत्सवों की श्रंखला जारी ही नहीं रही,बल्कि इसमें इजाफा भी हुआ. प्रांगण के नाट्य महोत्सव का अंतरराष्ट्रीय स्वरुप इस भी बांगला देश की टीम की भागीदारी से कायम रहा.उल्लेखनीय है कि प्रांगण के इस पाटलिपुत्र नाट्य महोत्सव के 30 वर्ष से अधिक हो चुके हैं.प्रांगण ने इस वर्ष के शुरुआत और अंत में नौटंकी शैली में ‘फुल नौटंकी विलास’ की प्रस्तुति से अपने दर्शकों को एक नए आस्वाद से भी परिचित कराया. इन महोत्सवों की श्रंखला में संजय उपाध्याय के निर्माण कला मंच के आयोजन शांति रंग महोत्सव का उल्लेख आवश्यक है,जिसमें रघुवीर यादव के नाटक ‘प्यानो’ के साथ मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के छात्रों ने हिन्दी के पहले नाटक ‘आनंद रघुनंदन’ की प्रस्तुति की थी. वर्ष यह देख खुश होने का अवसर अवश्य देता रहा कि पटना में नाट्य प्रदर्शनों में लगातार इजाफा हो रहा है.

कालिदास रंगालय की बुकिंग के लिए तो अब तीन तीन महीने प्रतीक्षा करनी पडती है.बावजूद इसके इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि न तो नए नाटक इस तरह से सामने आ रहे हैं और न ही नए कलाकार. वास्तव में यहां अधिकांश नाटकों के प्रदर्शन का श्रेय केन्द्र के सांस्कृति मंत्रालय के अनुदान को दिया जा सकता है. अनुदानों का यह कमाल रहा कि अधिकांश रंगकर्मी अभिनय छोड कर पहले निर्देशन के क्षेत्र में आए,और फिर अपनी एक नई संस्था के साथ सामने आ गए.आश्चर्य नहीं कि आज पटना में 50 से अधिक रंगसंस्थाएं एक साथ सक्रिय मानी जा सकती हैं. कभी समय था जब संस्थाओं का मतलब व्यक्तियों का समूह हुआ करता था,अब अधिकांश संस्थाए अमूमन व्यक्ति केंद्रित है. संस्थाओं से किसी कलाकार की अब पटना के मंच पर पहचान मुश्किल है. प्रस्तुति ‘रागा’ की हो या ‘प्रांगण’ की,या ‘प्रवीण सांस्कृतिक मंच’ की,कुछ चेहरे समान रहते हैं. जाहिर है अनुदानों की बाढ ने नाटकों की संख्या अवश्य बढायी,लेकिन कहीं न कहीं रंगकर्म के प्रति प्रतिबद्धता को भी प्रभावित करने में अहम भूमिका अदा की. यदि नए की बात करें तो पटना रंगमंच आउटकास्ट(अक्करमासी),धूमिल की कविता पटकथा, रेणु की कहानी ‘तीसरी कसम’ और हृषिकेश सुलभ की ‘पहवा घर’ से आगे गिनती नहीं बढ पाती. विचार और संवेदना के स्तर पर ये कितनी नई हो पायी,यह तो समय तय करेगा. इस वर्ष भी स्वरम उपाध्याय,उदय कुमार,सनत कुमार,मृत्युंजय शर्मा,अजीत कुमार,हरिशंकर रवि,राजेश राजा,जहांगीर खान,शिल्पा भारती,वसुधा,रुबी खातुन,विशाल तिवारी,मनीष महिवाल,सुभाष झा,अदिती सिंह पटना रंगमंच के चेहरे बने रहे. यहां बिज्येन्द्र टांक का उल्लेख आवश्यक है जिसने बाल अभिनेता के रुप में मंच पर कदम रखा और तमाम तकनीकी सिद्हस्तता के बाद अब निर्देशक के रुप में ‘गुंडे’ के साथ सामने आए तो हिन्दी मंच चकित रह गया.मंच को जरुरत ऐसे ही धैर्य और समर्पण की होती है.

पटना में पुंज प्रकाश की सक्रियता ने अभिनय की तकनीक के प्रति रंगकर्मियों में निरंतर अभ्यास की जरुरत का अहसास ही नहीं कराया,बल्कि अपनी विशिष्टता से उन्हें लाभान्वित भी करने की कोशिश की. सबसे दुखद स्थिति बिहार संगीत नाटक अकादमी की रही.अकादमी के नियंत्रणाधीन प्रेंमचंद रंगशाला जहां पूरे वर्ष अपनी बदहाली को रोता रहा,वहीं जन्मदिवस जैसे कुछेक रस्मी आयोजनों के अतिरिक्त अकादमी के स्तर से सन्नाटा कायम रहा. रंगयात्रा जैसे अति अल्प बजट के आयोजनों की भी नियमितता जारी नहीं रखी जा सकी.

पूरे वर्ष न तो कोई कार्यशाला आयोजित हुई,न ही कोई नाट्य समारोह.हां,कार्यशाला की बात करें तो पटना रंगमंच से गए फिल्म अभिनेता विनीत कुमार ने फिल्म विकास निगम में पटना के युवा रंगकर्मियों के बीच फिल्म की अभिनय भाषा पर छोटे छोटे कुछ कार्यशालाओं से सन्नाटे को तोडने की कोशिश अवश्य की. हालांकि पटना में इस वर्ष शत्रुघ्न सिन्हा भी मंच पर दिखे.2घंटे में 200 ठहाके के टैगलाइन के साथ प्रस्तुत ‘पति पत्नी और मैं’ में उनके साथ राकेश बेदी भी थे,बावजूद इसके पटना का रंगमंच शायद ही इस प्रस्तुति को याद रखना चाहे.