ज्ञान की धरती नालंदा में समाज के हाशिये से सिनेमा तक की चर्चा

राजगीर, 14 मार्च। नालंदा की ऐतिहासिक धरती पर आयोजित नालंदा इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल में ज्ञान, साहित्य, समाज और सिनेमा से जुड़े विविध विषयों पर गंभीर विमर्श हुआ। पूरे दिन चले विभिन्न सत्रों में प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा, साहित्य में संवेदनाओं की अभिव्यक्ति, बिहार की ब्रांडिंग में मीडिया की भूमिका, फिल्म और समाज के संबंध तथा ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। इनमें ट्रांसजेंडर समुदाय की सामाजिक स्थिति और अधिकारों पर हुआ विमर्श कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण रहा।


प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा पर हुआ विचार-मंथन
फेस्टिवल के प्रथम सत्र में “प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा” विषय पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, पूर्व राष्ट्रपति के प्रेस सचिव एवं वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह, चिंतक मनुदास तथा विदुषी डॉ. कविता शर्मा ने अपने विचार रखे।



डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा शास्त्रार्थ, तर्क और संवाद की समृद्ध परंपरा से विकसित हुई है। उन्होंने बताया कि हजारों वर्षों तक यह ज्ञान मौखिक परंपरा के माध्यम से संरक्षित रहा और गुरु-शिष्य परंपरा ने इसे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया।

अजय सिंह ने कहा कि भारत की पहचान एक संवाद प्रधान समाज के रूप में रही है। उन्होंने कहा कि केवल अतीत के गौरव में जीना पर्याप्त नहीं है, बल्कि नालंदा की मूल ज्ञान-परंपरा और संवाद की भावना को वर्तमान समय में पुनर्जीवित करना जरूरी है।

वहीं डॉ. कविता शर्मा ने महाभारत के प्रसंगों के माध्यम से जीवन की नैतिक शिक्षाओं को रेखांकित करते हुए कहा कि यह महाकाव्य मानव स्वभाव और कर्तव्य के गहरे प्रश्नों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।
कला के माध्यम से नालंदा की विरासत को उकेरा
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में लाइव पेंटिंग का आयोजन किया गया। इसका उद्घाटन किन्नर समुदाय का प्रतिनिधित्व कर रहीं डॉ. भारती और सलमा चौधरी ने किया।


इस सत्र में कलाकारों ने अपनी चित्रकला के माध्यम से आर्यभट्ट और आचार्य चाणक्य जैसे महान व्यक्तित्वों को कैनवास पर उकेरा। पटना कॉलेज ऑफ आर्ट्स के छात्र अमन अयाज, प्रियांशु कुमार, सुमित कुमार, ज्योति चौरसिया और टीना यादव ने इसमें भाग लिया। कार्यक्रम की प्रस्तुति परिधि आर्ट ग्रुप द्वारा की गई।
शोक से सृजन तक की यात्रा पर चर्चा
तीसरे सत्र “पेनिंग ग्रीफ: अनुभव से अभिव्यक्ति तक” में चर्चित कवयित्री डॉ. नीना वर्मा और प्रख्यात लेखिका गगन गिल ने साहित्य में संवेदना और शोक की भूमिका पर चर्चा की।

डॉ. नीना वर्मा ने कहा कि शोक केवल पीड़ा नहीं, बल्कि आत्मिक समझ और संवेदनशीलता की यात्रा भी है। वहीं गगन गिल ने कहा कि जीवन में बिछड़ने की पीड़ा कई बार रचनात्मक अभिव्यक्ति का आधार बन जाती है।
बिहार की ब्रांडिंग में मीडिया की भूमिका
चौथे सत्र में “ब्रांडिंग ऑफ रीजन, स्पेशली बिहार में मीडिया की भूमिका” विषय पर ओम थानवी और टीवी9 भारतवर्ष के डिजिटल एग्जीक्यूटिव एडिटर पंकज कुमार ने चर्चा की।


इस दौरान कहा गया कि मीडिया में अक्सर बिहार को नकारात्मक संदर्भों से जोड़ा जाता है, जबकि राज्य की बौद्धिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों को पर्याप्त स्थान नहीं मिलता। वक्ताओं ने कहा कि बिहार की प्रतिभाओं और उपलब्धियों को सकारात्मक रूप में सामने लाने की आवश्यकता है।
सिनेमा और समाज पर भी हुई चर्चा
फेस्टिवल के एक सत्र में सिनेमा और उसकी आलोचना पर भी विचार-विमर्श हुआ, जिसमें प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक भावना सोमाया और अजय ब्रह्मात्मज शामिल हुए। दोनों अतिथि फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड के सदस्य हैं, जिसके लगभ 56 देशों में सदस्य हैं और वे लंबे समय तक पत्रिका स्क्रीन की संपादक भी रह चुकी हैं।


इस अवसर पर अजय जय ब्रह्मात्मज ने बिहार की ओर से उनका स्वागत किया। भावना सोमाया ने कहा कि बिहार आने का यह उनका पहला अवसर है और पटना से इतनी दूर आना उनके लिए नया अनुभव रहा। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि यहाँ उन्हें “लिट्टी-चोखा और लिटरेचर” दोनों का स्वाद मिला।
उन्होंने कहा कि फिल्म उद्योग में अक्सर दो फिल्में फ्लॉप होते ही किसी कलाकार को असफल मान लिया जाता है, लेकिन कई कलाकार फिर मजबूत वापसी करते हैं। उन्होंने रणवीर सिंह और अक्षय कुमार का उदाहरण देते हुए कहा कि एक अच्छी फिल्म कलाकार के करियर को फिर से नई दिशा दे सकती है।

भावना सोमैया ने कहा कि हर फिल्म दर्शकों के बीच दो हिस्सों में बंट जाती है- कुछ लोगों को पसंद आती है और कुछ को नहीं। उनके अनुसार वे उसी फिल्म के बारे में सकारात्मक लिखती हैं जिसमें उन्हें सच्चा कंटेंट और संदेश दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि आजकल फिल्मों में साहित्य आधारित कहानियाँ बहुत कम बन रही हैं क्योंकि फिल्म उद्योग में अधिकांश लोग केवल मनी-मेकिंग पर ध्यान दे रहे हैं। उनके अनुसार सौ फिल्मों में मुश्किल से दो ही फिल्में साहित्य पर आधारित बनती हैं। अतिथियों ने दर्शकों के कई सवालों का बड़े ही सहजता से जवाब भी दिया।
“बिफोर एंड आफ्टर धुरंधर’ सत्र में सिनेमा के बदलते स्वरूप पर गंभीर चर्चा”
राजगीर में आयोजित साहित्यिक सत्र “बिफोर एंड आफ्टर धुरंधर” में वरिष्ठ फिल्म पत्रकार एवं आलोचक अजय ब्रह्मात्मज और प्रसिद्ध फिल्म पत्रकार-लेखिका पद्मश्री भावना सोमाया ने हिंदी सिनेमा की बदलती प्रवृत्तियों पर विस्तार से चर्चा की। सत्र के दौरान दोनों वक्ताओं ने फिल्मों की सामग्री, सामाजिक प्रभाव और बदलते फिल्मी परिदृश्य पर अपने विचार साझा किए।
फिल्म धुरंधर के संदर्भ में चर्चा करते हुए वक्ताओं ने कहा कि तकनीकी दृष्टि से फिल्म का ग्राफिक्स, संदेश और प्रस्तुति प्रभावशाली है, लेकिन आज के सिनेमा में बढ़ती हिंसा एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनती जा रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में फिल्म उद्योग में दक्षिण भारतीय फिल्मों की शैली से प्रेरित होकर अत्यधिक हिंसा को सामान्य बनाने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है, जिससे फिल्मों का मूल उद्देश्य कहीं न कहीं कमजोर पड़ता दिख रहा है।
उन्होंने ने यह भी कहा कि कभी भारतीय सिनेमा का उद्देश्य समाज को जोड़ना और सकारात्मक संदेश देना होता था, लेकिन आज कई फिल्मों में “डिवाइड एंड रूल” की मानसिकता झलकने लगी है। तथ्य और कल्पना के मिश्रण के कारण दर्शकों के सामने भ्रम की स्थिति भी उत्पन्न होती है।
चर्चा के दौरान सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों पर भी बात हुई। अजय जी ने कहा कि फिल्मों में कई बार कमजोर वर्गों को निशाना बनाया जाता है और जटिल अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को भी एकतरफा दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाता है। पहले की फिल्मों में विभिन्न समुदायों के बीच समरसता का संदेश प्रमुख होता था, जबकि आज कई फिल्मों में विभाजन की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है।
सत्र के दौरान भावना सोमाया ने साहित्य और लेखन की कठिन साधना पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि एक लेखक अपनी रचना के लिए दिन-रात परिश्रम करता है और अनेक व्यक्तिगत संघर्षों से गुजरता है। अपने पुस्तक कराची से भारत के संदर्भ में उन्होंने भारत-पाक विभाजन के समय अपने परिवार और लाखों लोगों के विस्थापन के अनुभवों को साझा किया। उन्होंने संयुक्त परिवार की परंपरा की सुंदरता का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे परिवारों में बच्चों को माता-पिता के अतिरिक्त कई और संरक्षक मिलते हैं।
गंभीर और विचारोत्तेजक चर्चा के साथ यह सत्र संपन्न हुआ, जिसमें सिनेमा, साहित्य और समाज के संबंधों पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए।
ट्रांसजेंडर समुदाय के मुद्दे बने चर्चा का केंद्र
फेस्टिवल के छठे सत्र “भाषा, क्षेत्र और ट्रांसजेंडर” में किन्नर समुदाय की सामाजिक स्थिति और उनके अधिकारों पर गंभीर विमर्श हुआ।


डॉ. भारती ने कहा कि समाज अक्सर किन्नर समुदाय को हाशिये पर धकेल देता है और फिर उनकी ओर मुड़कर देखने की भी जरूरत नहीं समझता। उन्होंने कहा कि सम्मान और अवसर की कमी के कारण कई बार उन्हें मजबूरी में भीख मांगने जैसे कार्य करने पड़ते हैं।


वहीं सलमा चौधरी ने बताया कि उनके प्रयासों से उत्तर प्रदेश में ऐसा शौचालय बनाया गया है जिसका उपयोग पुरुष, महिलाएँ और ट्रांसजेंडर तीनों कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि उनका अगला लक्ष्य ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए आश्रय स्थल स्थापित करना है।
उन्होंने सरकार से अपील की कि ट्रांसजेंडर समुदाय को शिक्षा, रोजगार और राजनीति में समान अवसर दिए जाएँ ताकि वे समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें।
समावेशी समाज का संदेश
वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब उसके सभी वर्गों को समान सम्मान और अवसर मिलें। नालंदा इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल के इन सत्रों ने ज्ञान, कला, सिनेमा और सामाजिक न्याय के विभिन्न पहलुओं पर विचार करते हुए एक समावेशी और संवेदनशील समाज के निर्माण का संदेश दिया।
नालंदा इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल से ओ पी पाण्डेय की रिपोर्ट
