मेरा पासपोर्ट नीले से लाल हो गया है-तेजेंद्र शर्मा

By pnc Sep 14, 2016
तेजेंद्र शर्मा की कविताएं
फिल्म अभिनेता और साहित्यकार तेजेंद्र शर्मा को कई विधाओं में महारत हासिल है जब वे कविता या ग़ज़ल लिखते है तो उनमें मानवीय संवेदनाओं का बहुत बड़ा स्थान वे रखते है जिनमें व्यथा और ख़ुशी दोनों समावेशित रहती है.देश -विदेश में उनके अनेकों चाहने वाले हैं ,प्रस्तुत है उनकी कुछ रचनाएं –
smiling
 मेरे पासपोर्ट का रंग…

मेरा पासपोर्ट नीले से लाल हो गया है

मेरे व्यक्तित्व का एक हिस्सा




जैसे कहीं खो गया है।

मेरी चमड़ी का रंग आज भी वही है

मेरे सीने  में वही दिल धड़कता है

जन ग‌ण मन की आवाज़‚आज भी

कर देती है मुझे सावधान!

और मैं‚ आराम से, एक बार फिर

बैठ जाता हूं‚ सोचना जैसे टल जाता है

कि पासपोर्ट का रंग कैसे बदल जाता है।

भावनाओं का समुद्र उछाल भरता है

आइकैरेस सूरज के निकट हुआ जाता है

पंख गलने में कितना समय लगेगा

धड़ाम! धरती की खुरदरी सतह

लहु लुहान आकाश हो गया!

रंग आकाश का कैसे जल जाता है

पासपोर्ट का रंग कैसे बदल जाता है

मित्रों ने देशद्रोही कर दिया क़रार

लाख चिल्लाया‚ लाख की पुकार

उन्हें समझाया‚ अपना पहलू बताया

किन्तु उन्हें‚ न समझना था

न समझे‚ न ही किया प्रयास

मित्रों का व्यवहार कैसे  छल जाता है!

कि पासपोर्ट  का रंग कैसे बदल जाता है।

जगरांव से लुधियाना जाना‚

ग्रामद्रोह कहलाएगा

लुधियाने से मुंबई में बसना

नगरद्रोह बन जाएगा

मुंबई से  लंदन आने में

सब का ढंग बदल जाता है

पासपोर्ट  का रंग बदल जाता है।

 हम ऐसे क्यों हो जाते हैं? 
हम ऐसे क्यों हो जाते हैं? 
है दिल में बसाया जिसका दिल 
दिल क्यों उसका तड़पाते हैं? 
हम ऐसे क्यों हो जाते हैं? 
चाहें जिनको तन से मन से 
बस अहं से दुःख दे जाते हैं 
हम ऐसे क्यों हो जाते हैं? 
जिसकी ख़ातिर सबको छोड़ें 
उसके भी नहीं बन पाते हैं 
हम ऐसे क्यों हो जाते हैं? 
जिससे चाहें मिलना हर पल 
तक़लीफ़ उसे पहुंचाते हैं 
हम ऐसे क्यों हो जाते हैं? 
जिन आंखों में पाते जन्नत 
उनमें ही आंसू लाते हैं 
हम ऐसे क्यों हो जाते हैं? 
जब जानते हैं, वो ही सच है 
फिर उसको क्यों झुठलाते हैं 
हम ऐसे क्यों हो जाते हैं? 
 –तेजेन्द्र शर्मा 
अकेलापन….. 
नये बिम्ब नई अभिव्यक्ति 
देश बदला, मिट्टी बदली 
बदला कुल परिवेश 
लगे कहीं से जो भी अपना 
न चेहरा न वेश ! 
 
सुबह न कोई कोयल बोले 
न चिड़िया चहचहाए 
धुन्ध सुबह, धुन्धली हो शाम 
खो गया हर वो नाम 
जो कभी मिलने आता था 
टेलिफ़ोन पर बतियाता था 
कहीं भीतर तक दिल के 
तारों को छू जाता था। 
 
सुपर मार्किट की भीड़ में 
सुबह की लोकल की भीड़ में 
कार-बूट सेल की भीड़ में 
फ़ुटबॉल प्रेमियों की भीड़ में 
अपने आप को कहीं किसी 
अकेले कोने में,  
अकेला खड़ा पाता हूं। 
 
किसी गहरी सोच में 
डूब जाता हूं। 
अपने इस अकेलेपन की अभिव्यक्ति 
कहां कर पाता हूं शब्दों में ? 
खो जाता हूं, डूब जाता हूं 
शब्दों के मायाजाल में। 
 
किन्तु शब्द ! न मिलते हैं ! 
न मेरे करीब आते हैं। 
मुझे दौड़ाते हैं, थकाते हैं 
और अकेला छोड़ जाते हैं। 
 
रात को चांद
सितारों के हुजूम में चांद
अकेला चांद 
फ़ैक्टरियों और कारों के 
प्रदूषण से ग्रस्त चांद
पीला चान्द ! 
आंसुओं से गीला चांद ! 
एक पीली कमज़ोर मुस्कान ! 
 
से, उसके अकेलेपन पर 
करता हूं एक प्रश्न। 
पीड़ा की एक वक्र रेखा 
चीर कर निकल जाती है 
उसका चेहरा ज़र्द ! ! 
शब्द अस्फुट से सुनाई  
देते हैं फिर भी…. 
पहुंच जाते हैं मुझ तक। 
 
अकेलेपन के लिये 
नई शब्दावली ढूंढ रहे हो ? 
पगला गये हो। क्यों व्यर्थ में 
कुम्हला रहे हो ? 
 
सबसे पहले अकेला था आकाश 
फिर धरती अकेली थी 
फिर अकेला था आदम। 
उसके रहते, अकेली थी हव्वा 
 
अकेलापन जीवन का सत्य है 
शाश्वत है ! 
क्या उसके लिये नये बिम्ब चाहते हो ? 
चाहते हो नई शब्दावली। 
ढूंढो अपने ही युग में। 
करो तलाश अपने आसपास। 
 
विश्व युद्ध में पड़ा अकेला जर्मनी 
गहन अकेला नाम, जिसे कहते थे सद्दाम 
अकेला ही जला जो कभी था युगोस्लाविया 
अफ़गानिस्तान भी दुखी अकेला 
यही शब्द हैं, बिम्ब नये हैं 
पूरे विश्व में नाम अकेले। 
क्या ये बिम्ब अपनाओगे ? 
अकेलापन दिखलाओगे ? 
 
मैं एकाएक घबरा गया हूं 
नेत्र गीले, स्वर भर्रा गया है 
अकेला तो पहले भी था 
अन्धेरा और हुआ सघन। 
मुझसे छिन रहा है 
मेरा अपना गगन। 
 –तेजेन्द्र शर्मा ,यूनाइटेड किंग्डम.

 

By pnc

Related Post