क्या आप कर सकते हैं बॉडी ऐक्ट !

नाट्य कार्यशाला : 4th Day यूज ऑफ प्रॉप्स के साथ किया बॉडी एक्ट आरा, 20 जुलाई. अभिनय एवं ऐक्ट द्वारा आयोजित 20 दिवसीय नाट्य कार्यशाला के चौथे दिन बच्चों ने वरिष्ठ रंगकर्मी व नाट्य गुरु चन्द्रभूषण पांडेय से तालीम लिया. रमना मैदान के दक्षिणी रोड में स्थित मंगलम दी वेन्यू में बच्चों को कार्यशाला में प्रशिक्षक चंद्रभूषण पांडेय ने बॉडी ऐक्ट की बारीकियों को बताया. उन्होंने बच्चों को बड़ी सहजता के साथ बतलाया कि वे भी उनसे सीखने आये हैं. ये सहजता बच्चों में आत्मबल को बढ़ाने और उनकी झिझकता को दूर करने के लिए उन्होंने अपनायी. उन्होंने बताया कि फेस एक्सप्रेशन से पहले बॉडी के एक्सप्रेशन की जरूरत होती है और इसके लिए पूरे बॉडी पर एक्टर का कमांड रहना बेहद जरूरी है. उन्होंने कई शारीरिक चाल को प्रैक्टिकल के रूप में कर के दिखाया और फिर यूज ऑफ प्रॉप्स के बारे में बताया. उन्होंने इसके साथ ही तुरन्त 8 तरह के प्रॉप्स का उपयोग करने को बच्चों को दे दिया. सभी ने प्रॉप्स का उपयोग तरह-तरह से अपनी कल्पना के चरित्रों के साथ उसे फिट कर दिखाया. चंद्रभूषण पांडेय: चंद्रभूषण पांडेय जिले के ऐसे चर्चित रंगकर्मी हैं जिन्होंने इस शहर को कई अच्छे अभिनेता और निर्देशक दिए हैं. स्कूल के जमाने मे वे राष्ट्रीय हॉकी प्लेयर भी रह चुके हैं. 4 दर्जन से उपर नाट्य कार्यशालाओं में जहाँ वे हजारों बच्चों को प्रशिक्षण दे चुके हैं वही रश्मि-रथी जैसे काव्य के नाट्य रूपांतरण के लिए भी देश मे प्रचलित हैं. वे बेहद सादे और सहज व्यक्तित्व के धनी

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हिन्दी रंगमंच में अभिनेता स्थायी नहीं -परवेज अख्तर

दुर्भाग्यवश हिन्दी रंगमंच में अभिनेता स्थायी नहीं है, जबकि यह उसी का माध्यम है चन्द रंगकर्मी ही औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर पाते हैं कितने प्रतिशत कलाकार संस्थानों से प्रशिक्षित होते हैं, 5% या उससे भी कम किसी व्यक्ति द्वारा कला-सृजन, उस व्यक्ति के रचनात्मक रुझान और उसकी नैसर्गिक* कला-प्रतिभा पर निर्भर करता है। कलात्मकता का प्रशिक्षण कदाचित सम्भव नहीं है। रंगमंच में प्रशिक्षण दरअसल शिल्प का ही होता है। फिर भी रंगमंच के क्षेत्र में सक्रिय कितने प्रतिशत कलाकार संस्थानों से प्रशिक्षित होते हैं, 5% या उससे भी कम। लेकिन प्रशिक्षण केन्द्र कुछ इस तरह का माहौल या हाइप बनाते हैं, गोया औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त नाट्यकर्मी ही रंगमंच के वास्तविक नायक हैं। जबकि वस्तुस्थिति यह है कि बहुत बड़ी संख्या में अप्रशिक्षित या अनौपचारिक रूप से प्रशिक्षित कलाकर्मी रचनात्मक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान करते और अति-महत्वपूर्ण रचते हुए दिखते हैं और कला-जगत उनका उच्च-मूल्यांकन भी करता है। हालाँकि सभी कलाओं में शिल्प-के-प्रशिक्षण का अत्यधिक महत्व है; इसका विकल्प नहीं है लेकिन कितने हैं, जिन्हें औपचारिक प्रशिक्षण का अवसर मिल पाता है ? वैसे देखें, तो आप पाएँगे कि अप्रशिक्षित कोई होता नहीं। चन्द रंगकर्मी ही औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर पाते हैं; जबकि अधिकांश हिन्दी-नाट्यकर्मी, नाट्य-दल में अपनी सक्रियता के क्रम में अनौपचारिक रूप से प्रशिक्षित होते रहते हैं।कला प्रशिक्षण केन्द्र, वास्तव में ‘शिल्प’ या ‘क्राफ़्ट’ तथा ‘तकनीक’ का प्रशिक्षण देते हैं, कला अथवा कलात्मकता का नहीं। रंगमंच कला में, अंतर्शिल्पीय दक्षता की आवश्यकता होती है। नाट्य-शिल्प के अन्तर्गत स्टेज-क्राफ़्ट, लाइटिंग, म्यूजिक, मेक-अप, कास्ट्यूम, सीनिक-डिजाईन आदि-इत्यादि रंगमंच-कला के मुख्य-सर्जक अभिनेता और

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