कहेगा फूल हर कली से बार- बार, जीना इसी का नाम है

By pnc Dec 14, 2016

गीतकार और जन कवि शैलेन्द्र की पुण्यतिथि पर नमन 

वो जो यूँ ही बैठे-बैठे शब्द बुन लेते थे 




आज गीतकार और जन कवि शैलेन्द्र की पुण्यतिथि है. उनके लिखे गीत आज भी उनते ही प्रासंगिक है जितने वे पहले थे .उनके गीतों में प्रकृति चित्रण ,मनोवेदना और देश भक्ति के जो भाव दिखे और जिस प्रकार लोग उनसे जुड़ते चले गए. सरल और सटीक शब्दों में भावनाओं और संवेदनाओं को अभिव्यक्त कर देना शैलेन्द्र जी की महान विशेषता थी. ‘किसी के आँसुओं में मुस्कुराने’ जैसा विचार केवल शैलेन्द्र जैसे गीतकार के संवेदनशील हृदय में आ सकता है। उनकी संवेदना उनकी गीतों में झलकती है  पटना नाउ की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि महान गीतकार को

shailendra

“कल तेरे सपने पराये भी होंगे, लेकिन झलक मेरी आँखों में होगी

फूलों की डोली में होगी तू रुख़सत, लेकिन महक मेरी साँसों में होगी…..”

फ़िल्मों में गीत लिखने के पहले देश के आजादी की लड़ाई में योगदान देने का उनका एक अलग ही तरीका रहा है. वे उस समय देशभक्ति से सराबोर वीररस की कविताएँ लिखा करते थे और उन्हें जोशोखरोश के साथ सुनाकर सुनने वालों को देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत कर दिया करते थे, परिणामस्वरूप देश के आजादी के वीरों का बहुत अधिक उत्साहवर्धन होता था. उनकी रचना ‘जलता है पंजाब……’ ने उन दिनों बहुत प्रसिद्धि पाई. फ़िल्मों में आने के बाद भी उनका ये जज़्बा बना ही रहा इसीलिये वे ग़रीब भारतीय की अभिव्यक्ति इन शब्दों में करते हैं –

“मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी

सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी…..”

गीतकार शैलेन्द्र की रचना प्रक्रिया इतनी अच्छी थी की लोग उनसे जुड़ते चले गए ,शोमैन राज कपूर तो उन्हें अपना बड़ा भाई मानते थे. स्मृतियों के आकाश में विचरता वो जन साधारण के मन की बात कहने वाला कवि शरीर रूपी पिंजरा छोड़ हमेशा के लिए कहीं विलुप्त हो गया पर दे गया कुछ ऐसे गीत जो सदियों-सदियों गुनगुनाये जायेंगें, कुछ ऐसे नग्में जो हर आमो-ख़ास के दिल के जज़्बात को जुबाँ देते रहेंगे बरसों बरस. वो जिसने लिखा “दुनिया न भाये मुझे अब तो बुला ले” (बसंत बहार), उसी ने लिखा “पहले मुर्गी हुई कि अंडा” (करोड़पति), वो जिसने लिखा “डस गया पापी बिछुआ” उसी ने लिखा “क्या से क्या हो गया बेवफा तेरे प्यार में“. वो जो यूँ ही बैठे-बैठे शब्द बुन लेता था और सिगरेट के डिब्बों पर लिख डालता था. उन्हीं शब्दों को तब पूरा देश गुनगुनाता था. वो जो सरल शब्दों में कहीं गहरे उतर जाता था. ऐसे थे हिन्दी फ़िल्म जगत कामियाब और संवेदनशील गीतकारों में से एक शंकरदास केसरीलाल शैलेन्द्र जिन्हें दुनिया शैलेन्द्र के नाम से जानती है. मशहूर संगीत समीक्षक एम॰ देसाई साहब जो शैलेन्द्र से एक बार मिले थे मरहूम संगीतकार रोशन के घर पर, उन्होंने एक जगह लिखा हैं – “शैलेन्द्र चाहते थे कि उनके गीत सबकी समझ में आए और उन्हें एक अनपढ़ कुली भी उसी मस्ती में गुनगुना सके जिस अंदाज़ में कोई पढ़ा लिखा शहरी. वो चाहते थे कि उनके गीतों को हर उम्र के लोग पसंद करें. अक्सर उनके गीत उनके ख़ुद अपने जीवन से प्रेरित होते थे. रिंकी भट्टाचार्य (स्वर्गीय विमल राय की सुपुत्री और स्वर्गीय बासु भट्टाचार्य की पत्नी) ने भी उनके बारे में कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त किया- “वो बहुत भावुक इंसान थे जो अपने आस-पास घटने वाली घटनाओं से इस कदर प्रभावित रहते थे कि उनके रोमांटिक गीतों में भी अगर आप देखें तो आपको दार्शनिकता नज़र आएगी. पर वो गरीबी का महिमा मंडन नही करते थे, न ही दर्द को सहनभूति पाने के लिए बढ़ा-चढ़ा कर जताते थे. उनके गीतों में घोर निराशा भरे अन्धकार में भी जीने की ललक दिखती थी जैसे उनका गीत “तू जिन्दा है तो जिंदगी की जीत पे यकीन कर”.यह गीत आज भी जनकवियों के आयोजनों में उतनी ही प्रमुखता से गाया जाता है .

वो डफली बहुत बढ़िया बजाते थे एक ज़माने में वह शिव मन्दिर के समारोहों में वो ऐसा नियमित करते थे, राज साहब को भी डफली पकड़ना और बजाना उन्हीं ने सिखाया. शंकर-जयकिशन की जोड़ी में भी वो संगीतकार शंकर के अधिक करीब थे. बतौर कवि वो कबीर और टैगोर की दार्शनिकता से बहुत अधिक प्रभावित रहे, और उनके गीतों में उत्तर प्रदेश के लोक गीतों का प्रभाव भी साफ़ देखा जा सकता है.” फ़िल्म तीसरी कसम में उन्होंने “चलत मुसाफिर..” “लाली लाली…” जैसे मिटटी की खुशबू वाले गीत लिखे तो मशहूर “नाच” गीतों को भी उन्होंने बेहद सटीक अंदाज़ में “मारे गए गुलफाम..”, ‘हाय गजब…”, और “पान खाए सैया हमार ऽहो…” जैसे गीतों में पेश किया ये वही फ़िल्म है जिसमें उन्होंने “सजन रे झूठ मत बोलो…”, “दुनिया बनाने वाले…” और “आ आ भी जा…” जैसे गीत भी लिखे. ये कहना भी अन्याय होगा कि उनका बेहतरीन काम एस जे और राज साहब के साथ आया. एड सी और सलिल दा के साथ भी उन्होंने एक से बढ़कर एक गीत रचे. संगीतकार गुलाम मोहम्मद और रोशन उनके सबसे करीबी मित्रों में से थे. संगीतकार रवि और एस एन त्रिपाठी के आलावा उन्होंने चित्रगुप्त के साथ एक बेहद कामियाब भोजपुरी फ़िल्म के लिए भी काम किया. कल्यानजी आनंदजी (सट्टा बाज़ार) और आर डी बर्मन (छोटे नवाब) ने अपना संगीत सफर उन्हीं के साथ शुरू किया. एल पी के साथ उन्हें “धरती कहे पुकार के” करनी थी, पर फ़िल्म लॉन्च होने से पहले उनका जीवन काल समाप्त हो गया, और सुनने वाले बस यही सुनते रह गए –

“कि मर के भी किसी को याद आएंगें,

किसी की आंसुओं में मुस्कुरायेंगें,

कहेगा फूल हर कली से बार बार-

जीना इसी का नाम है…”

आइये उनके लिखे गीत सुनते है –

By pnc

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