जसम की श्रद्धांजलि सभा में याद किये गए राहत इंदौरी

हमें चराग समझ कर बुझा न पाओगे/ हम अपने घर में कई आफ्ताब रखते हैं


आरा, आज फेसबुक रूम के जरिए जन संस्कृति मंच ने सुप्रसिद्ध शायर राहत इंदौरी की याद में एक कार्यक्रम किया, जिसमें दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। उनकी गजलों और शेरों को पढ़ा गया और उनके साहित्यिक महत्व पर बातचीत की गई। अध्यक्षता जलेस, बिहार के राज्य अध्यक्ष कथाकार नीरज सिंह ने की और संचालन जसम भोजपुर के सचिव कवि-कहानीकार सुमन कुमार सिंह ने किया।





इस अवसर पर नीरज सिंह ने कहा कि राहत साहब की आज के समय में बहुत जरूरत थी। उनकी पैदाइश 1950 में आजाद हिंदुस्तान में हुई थी, वे नये सपनों के हिंदुस्तान की संस्कृति, उसके रग-रग तथा उसकी हर चिंता और गम से वाकिफ थे। वे अपने देश से टूटकर प्यार करने वाले प्रतिनिधि शायर थे। प्रगतिशील-जनवादी लोगों ने उन्हें बेहद पसंद किया। उन्होंने मंचीय कविता के बिगड़े स्वरूप के खिलाफ जीवन की शायरी को वहां प्रतिष्ठित किया। इस देश की बहुसंख्य जनता उनकी चिंताओं में अपनी चिंताओं को शामिल करे और उनके सपनों को अमली जामा पहनाने की कोशिश करे, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
‘हमारी कब्र से निकलेगी शायरी अब भी/ हमें मरा हुआ समझोगे तो मर जाओगे’ राहत साहब की शेर का हवाला देते हुए शायर इम्तयाज अहमद दानिश ने कहा कि उनकी शायरी जनवाद और ललकार की शायरी है। शायरी को मंचीय और अदबी शायरी में बांटा जाता है, लेकिन उन्हांेने मंच पर अच्छी अदबी शायरी पढ़ी। उनकी शायरी का अंदाज कुछ हद तक 1930 के शायर इकबाल साजिद की शायरी से मिलता है, पर कई मायने में वे उनसे अलग भी हैं। पिछले कुछ सालों से मुल्क के भीतर जो हालात रहे हैं, उसमें वे आम अवाम के भीतर जोश भरने का काम कर रहे थे और जुल्म की ताकतों के खिलाफ सामने से वार कर रहे थे, जैसा करने से अधिकतर शायर बचते रहे। कहीं-कहीं उनकी शायरी में सपाटबयानी है, पर अधिकतर उसमें सोच की गहराई है। उनका जाना मंच को सूना कर गया। उनकी कमी लंबे अरसे तक महसूस की जाएगी। उन्होंने अपने एक शेर में कहा था- मौत लम्हे की सदा, जिंदगी उम्रों की पुकार/ मैं यही सोच के जिंदा हूं कि मर जाना है।’
जसम के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने उनकी कुछ गजलों और शेरों को सुनाते हुए कहा कि उनकी शायरी उन सियासी जमातों के खिलाफ है, जो इस देश के जनतंत्र और मिली-जुली तहजीब को खत्म कर रही हैं। उनकी मौत के बाद भी सोशल मीडिया पर उनके घृणित हमले जारी हैं, पर यही तो राहत साहब की शायरी की ताकत है। उनका एक शेर ‘सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में/ किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है’ उनकी पुरानी गजल का शेर है, पर हाल के वर्षों में अपने संवैधानिक-लोकतांत्रिक हक के लिए लड़ने वाले तमाम नागरिकों की जुबान बन गया है। हुकूमत की तानाशाह रवैये के खिलाफ उनका साहसी और विरोधी तेवर हमें प्रेरणा देता है। उनका जिस्म भले ही हमारे बीच नहीं है, पर उनका प्रतिरोधी मिजाज और उनके ख्याल हमारे लिए रोशनी का काम करता रहेगा। उन्होंने बड़े यकीन से कहा था- हमें चराग समझ कर बुझा न पाओगे/ हम अपने घर में कई आफ्ताब रखते हैं।

चित्रकार राकेश दिवाकर ने कहा कि इंदौर ने कला-साहित्य की दुनिया को दो बड़ी शख्सियतें दीं- एक एम.एफ. हुसैन और दूसरे राहत इंदौरी। दोनों ने अपनी-अपनी कला को लोकप्रिय बनाया, जब साहित्य और कविता आम अवाम से कटती जा रही है, तब राहत साहब ने उसे लोकप्रिय ही नहीं, बल्कि तीखे सियासी प्रतिरोध का हथियार बना दिया। वे अपनी शर्तों पर लोकप्रिय कला या साहित्य की दुनिया में गए थे। उनका जाना अपूरणीय क्षति है।
कवि विजयानंद सिंह ने उनके कई शेर सुनाए और कहा कि गजल पढ़ते हुए उनके हाव-भाव और उनकी प्रस्तुति का प्रभाव ऐसा होता था कि शेर लोगों की जुबान पर चढ़ जाते थे। उनके शेर हिम्मत से भरते हैं, जैसे- ‘तूफानों से आंख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो/ मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैरकर दरिया पार करो।’
संचालक सुमन कुमार सिंह ने कहा कि राहत साहब मुल्क और समाज को तोड़ने वालों के खिलाफ थे, उनकी शायरी जनतंत्रविरोधी शक्तियों को शूल की तरह चुभती थी। वह आवाज हुक्मरानों को चेतावनी देती है। उनकी आवाज दबने वाली नहीं है, वह बुलंद आवाज थी। वह आवाज न्याय और बराबरी के लिए, गंगा-जमुनी तहजीब को बचाने के लिए संघर्ष की ताकत प्रदान करती है। उन्होंने अपनी शायरी में जोड़ने की बात की, लोकतंत्र और मुहब्बत की बात की। सुमन कुमार सिंह ने इस मौके पर जसम के बयान को भी पढ़ा और कहा कि उनकी तरह के शायर जुल्म की किसी हुकूमत से या मौत से नहीं डरते। उन्होंने ही कहा था- ‘‘ये हादसा तो किसी दिन गुजरने वाला था/ मैं बच भी जाता तो एक रोज मरने वाला था।
कार्यक्रम में आशुतोष कुमार पांडेय, रविशंकर सिंह और रामकुमार नीरज भी शामिल थे।

आरा से रवि प्रकाश सूरज की रिपोर्ट