बाल मन पर सिनेमा का पड़ता है गहरा प्रभाव

By pnc Sep 8, 2016

‘पप्पू की पगडंडी-11.30 बजे  शुक्रवार 

क्रिस, ट्रिस एंड बाॅल्टी ब्वाॅय-2.00 बजे शुक्रवार 




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विश्व संवाद केंद्र एवं चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी, इंडिया द्वारा आयोजित बाल फिल्मोत्सव ‘फिल्म बोनांजा’ के दूसरे दिन दो फिल्मों का प्रदर्शन किया गया. पहले राजन खोसा निर्देशित ‘गट्टू’ दिखाई गई. फिल्मोत्सव के दौरान उपस्थित स्कूली बच्चों ने ‘गट्टू’ नामक बच्चे की चतुराई भरे कारनामों को देखकर खूब आनंदित हुए. बच्चों के साथ आए शिक्षकों ने भी फिल्म को सराहा. दूसरे शो में बातुल मुख्तियार निर्देशित ‘कफल’ का प्रदर्शन किया गया. कफल दो शरारती बच्चों की कहानी है जो अपने सख्त पिता से छुटकारा पाना चाहते हैं. फिल्म में पगली दादी के किरदार को बाल दर्शकों ने खूब सराहा. पूरे फिल्म के दौरान बच्चे आनंदित नजर आए.

फिल्म शुरू होने के पहले बच्चों के साथ परस्पर संवाद कार्यक्रम हुआ जिसमें सिने सोसायटी आंदोलन के महत्व के बारे में फिल्म शोधार्थी राहुल कुमार ने बच्चों को बताया. सिनेमा किसी बात को संप्रेषित करने में कितना प्रभावी हो सकता है, यह बात बच्चों को सवाल-जवाब सत्र के माध्यम से बताई गई. फिल्म प्रदर्शन के बाद फिल्म से जुड़े वाकयों को बच्चों के साथ साझा किया गया. बच्चों की टीम के साथ आए लोहिया नगर माउंट कार्मेल के शिक्षक मनोज शर्मा ने कहा कि बाल फिल्म महोत्सव के माध्यम से कई चीजें बच्चों को आसानी से बताई जा सकती है. फिल्म जैसे माध्यम का सर्वोच्च दोहन अब तक नहीं हो पाया है.फिल्म प्रदर्शन के बाद उस पर परिचर्चा करने से उसका अधिकतम लाभ बाल दर्शकों को मिलता है. ऐसी सुविधा बाल फिल्मोत्सवों में सहज उपलब्ध होती हैं. इसलिए ऐसे आयोजन समय-समय पर होते रहना चाहिए ताकि बच्चों के सर्वांगीण विकास में सिनेमा का भी सार्थक उपयोग हो पाए.

आयोजन समिति की ओर से फिल्म प्रदर्शन के बाद विश्व संवाद केंद्र सभागार में ‘बाल मन एवं सिनेमा’ विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा में फिल्मकार आर.बी. सिंह और आनंद कुमार उपस्थित थे. परिचर्चा का आरंभ करते हुए फिल्मकार आर. बी. सिंह कि बाल मन बड़ा कोमल होता है. इनकी ग्रहणशीलता अधिक होती है. इन दो गुणों के कारण बाल मन पर सिनेमा का व्यापक प्रभाव पड़ता है. अगर सकारात्मक फिल्मों से बच्चे लगातार रूबरू होते रहें तो यह उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके रचनात्मक व्यक्तित्व को संवारने में सिनेमा सहायक होगा. बच्चों की रचनात्मकता को एक नया आयाम सिनेमा देखने से मिल सकता है. फिल्मकार आनंद कुमार ने कहा कि फिल्मकारों का यह दायित्व है कि ऐसी फिल्में बनाईं जाएं जो बच्चों को नकारात्मकता की ओर न ले जाकर उनकी जीवन शैली में सकारात्मक परिवर्तन लाने में सहायक हो. उन्होंने कहा कि आजकल की फिल्मों में हिंसा का अतिरेक होने से बाल मन पर चोट होता है जो उनके व्यक्तिव के विकास में बाधक बनता है। हमें ऐसी फिल्मों को देखने-दिखाने से बचना चाहिए. स्वस्थ फिल्म देखने की परंपरा विकसित हो इसके लिए समय-समय पर फिल्म परिचर्चा, फिल्म महोत्सव, फिल्म कार्यशाला आदि का आयोजन होते रहना चाहि.। इस दिशा में पाटलिपुत्र सिने सोसायटी की पहल सराहनीय है.

परिचर्चा में भाग ले रहे अविभावक, विद्यार्थी, शिक्षक तथा फिल्म प्रेमियों ने इस विषय को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि इस परिचर्चा के कारण कई बातें पहली बार सुनने को मिली हैं. धन्यवाद ज्ञापन विश्व संवाद केंद्र के संपादक संजीव कुमार ने किया. पाटलिपुत्र सिने सोसायटी के संयोजक प्रशांत रंजन ने बताया कि फिल्मोत्सव के अंतिम दिन 9 सितंबर (शुक्रवार) को दो फिल्में दिखायी जायेंगी. पहली फिल्म सीमा देसाई निर्देशित ‘पप्पू की पगडंडी’ का प्रदर्शन 11.30 बजे से किया जायेगा. यह फिल्म पप्पू शर्मा नामक छात्र के बारे में है जो अलग-अलग समस्याओं से घिरा रहता है. फिर एक दिन एक जादुई शक्ति उसके सारे समस्याओं का समाधान करती है. दूसरी एवं अंतिम फिल्म मुंजल श्राफ व तिलक राज शेट्टी निर्देशित क्रिस, ट्रिस एंड बाॅल्टी ब्वाॅय का 2.00 बजे से किया जायेगा. 1 घंटे की इस फिल्म में निर्देशक द्वय ने ‘क्रिस, ट्रिस तथा बाॅल्टी ब्वाॅय’ नाम के तीन किरदारों के माध्यम से कहानी कही है. फिल्म में भारत के विभिन्न हिस्सों जैसे- राजस्थान, केरल, पंजाब के लोक कथाओं को समेकित रूप में कहने का प्रयास किया गया है. कल के पहले शो में मुख्य रूप में रेनबो होम्स के बच्चे फिल्म का आनंद लेंगे. तीन दिवसीय बाल फिल्म महोत्सव के समापन समारोह का आयोजन शुक्रवार को शाम 4 बजे से भारतीय नृत्य कला मंदिर परिसर में किया जायेगा. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी के सीईओ डाॅ. श्रवण कुमार रहेंगे.

 

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