राष्ट्रीय स्तर की फोटो प्रतियोगिता में अंकित, किसलय और मनोज जौहरी ने मारी बाजी

बेहतरीन फोटोग्राफी का हुआ दीदार यूथ होस्टल्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया,बिहार स्टेट ब्रांच की ओर से पटना में राष्ट्रीय स्तरीय ऑन लाइन फोटो प्रतियोगिता ’ 2020 का आयोजन, यूथ होस्टल्स एसोसिएशन के सदस्यों के बीच किया गया. इस में अलग-अलग राज्यों के 307 प्रतियोगी शामिल हुए, जिस में दिल्ली के अंकित, निफ्ट शिलॉन कैम्प ( मेघालय ) में, फैशन डिजाइन के छात्र किसलय एवं यूथ होस्टल्स एशोसिएशन के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष मनोज जोहरी (मध्य-प्रदेश ) क्रमशः प्रथम, दूसरे एवं तीसरे स्थान पर रहे. इस के अलावा प्रीति भारती,अलोक कुमार, अनुपमा,संजीव कुमार जवाहर, सागरिका रॉय,राकेश भारती, मुकेश कुमार, नीलकमल, रतन कुमार मिश्र,शशि रंजन,रामनरेश ठाकुर,ताराशंकर चटर्जी ,अंचित संभव,अनूप पाण्डेय ,सुप्रिया,अमित कुमार मिश्र,रिम्पा गुप्ता,चटर्जी,रीना रॉय, प्रिशा कुमारी,राजकुमार, अंकित कुमार,तान्या ,शिव कुमार कामती,प्रेरणा प्रियदर्शी,शुभंकर बनर्जी,अनिल कुमार,कौशल किशोर सिंह,नील रॉय,रवि कुमार सिंह, ,अंकित मिश्र को सांत्वना पुरस्कार दिया गया.इस प्रतियोगिता के जज थे पटना बिहार के जाने-माने राष्ट्रस्तर के फोटोग्राफर शैलेन्द्र कुमार. बिहार स्टेट ब्रांच के प्रदेश अध्यक्ष मोहन कुमार,के.एन. भारत, ए.के. बोस , प्रमोद दत्त, डॉ. ध्रुव कुमार, मुकेश महान ,सुधीर मधुकर ने संयुक्त रूप से बताया कि कोरोना काल में अपनी गतिविधियों को ऑनलाइन के माध्यम से बनाये रखने के लिए,फोटोग्राफी के साथ-साथ अन्य तरह की प्रतियोगिताएं सभी राज्यों में कराई जा रही हैं ताकि कोरोना जैसी महामारी में प्रतियोगी मानसिक परेशानियों से दूर होकर अपनी अन्दर छिपी हुई प्रतिभा का प्रदर्शन राष्ट्रस्तर पर कर सकें. राष्ट्रीय अध्यक्ष मो.शफी पंडित, एस. चेयरमैन वेंकट नारायणन,कोषाध्यक्ष मनोज जोहरी,मुख्य प्रशासनिक अधिकारी रुपेश कुमार पाण्डेय ने इस में शामिल होने वाले सभी प्रतिभागियों को शुभकामनायें देते हुए कहा है

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क्या आप जानते हैं भोजपुर के इस संगीत शिरोमणि को ?

शख्सियत (आरा)संगीत शिरोमणि, संगीत प्रवीण स्व० अखौरी नागेंद्र नारायण सिन्हा उर्फ नंदन जी आरा की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि – आरा की पावन भूमि पर साहित्य – संगीत की निर्मल धारा हमेशा प्रवाहित होती रही है और यहां की मिट्टी पर बड़े-बड़े कला के साधकों ने अपनी साधना से यहां की मिट्टी को काफ़ी ही समृद्ध किया। इनकी साधना की आभा अभी तक जीवित है साथ ही साथ गुरु शिष्य की परम्परा भी यहां अभी तक देखी जा सकती है। इतना ही नहीं इस मिट्टी से निकले सभी साधकों की लोकप्रियता राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय तक फैली है। शास्त्रीय संगीत और नृत्य में आरा को छोटकी बनारस कहे जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इतना ही नहीं वर्तमान समय में आरा के कथक गुरु बक्शी विकास ने आरा की सांस्कृतिक सुगंध को कई देशों में जाकर बिखेरने का कार्य किया है, साथ ही साथ अपने शिष्यों को भी ऐसी तालीम दी है जिससे सभी आरा की सुगंध को बिखेरने में अग्रणी हैं। कंठ संगीत के सुकोमल शिल्पकार कलाकार स्व० अखौरी नागेन्द्र नारायण सिन्हा कला एवं संगीत जगत में एक विख्यात नाम स्व० अखौरी नागेन्द्र नारायण सिन्हा भी है। इनका जन्म 21 मार्च 1934 ई0 को आरा में में स्व० अखौरी हरेंद्र नारायण सिन्हा के घर में हुआ जो जाने माने वकील थे। इनका पैतृक घर भोजपुर के धमार गावं में हैं । इनके पिता कभी नहीं चाहते थे की नंदन जी संगीत के क्षेत्र में कैरियर बनाये, किन्तु संगीत उस नदी के समान है जिसके बहाव को कोई रोक नहीं सकता और इस

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राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी से दूर होगी परीक्षा आयोजन की समस्याएं :कुलपति

आरा, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के रीजनल आउटरीच ब्यूरो, पटना द्वारा आज “एक देश-एक भर्ती परीक्षा: राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी” विषय पर वेब गोष्ठी का आयोजन किया गया।  मुख्य अतिथि वक्ता के रूप में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के कुलपति डॉक्टर देवी प्रसाद तिवारी ने कहा कि भिन्न-भिन्न परीक्षाओं के आयोजन में होने वाली परेशानियों को कम करने के लिए ही राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी की व्यवस्था की गई है। इस नई व्यवस्था से जहां एक ओर गरीब उम्मीदवारों को भरपूर लाभ मिलेगा वहीं दूसरी ओर लड़कियों को बहुत दूर जाकर परीक्षा देने के तनाव से मुक्ति मिलेगी। उन्होंने कहा कि परीक्षा की नई व्यवस्था से देश में नई संकल्पना, नई चेतना एवं नई ऊर्जा का संचार होगा और देश आगे बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि यह एजेंसी वर्ष 2021 से काम करना शुरू करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि मध्य प्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य है, जिसने अपने राज्य में एनआरए को लागू करने का फैसला लिया है। अतिथि वक्ता के तौर पर शामिल जाने-माने गणितज्ञ एवं सुपर-30 के संस्थापक आनंद कुमार ने कहा कि एक देश-एक भर्ती परीक्षा भिन्न-भिन्न परीक्षाओं में शामिल होने वाले लाखों विद्यार्थियों की समस्याओं, अलग-अलग परीक्षाओं के लिए बहुत सारी किताबों को पढ़ने की परेशानियों, तरह तरह के कोचिंग संस्थानों की झंझटों से मुक्ति का साधन बनेगा। यह नई व्यवस्था गांव व गरीब वर्ग के छात्रों को राहत देगा। अब देश के दूरदराज गांवों के गरीब के बच्चे अपनी मातृभाषा में और अपने जिले में परीक्षा दे सकेंगे। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय भर्ती

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संगीत छात्रों की प्रायोगिक परीक्षाएं सम्पन्न

आरा. Covid-19 वायरस के संक्रमण के कारण लॉक डाउन में ऑन लाइन परीक्षाएं हो रही हैं. कई परीक्षाएं इस बीच स्थगित कर दी गयी हैं तो कई के तिथियों में फेरबदल किया गया है. लेकिन इन सब के बीच सुखद खबर यह है कि संगीत से जुड़े विद्यार्थियों की वार्षिक परीक्षा सोमवार को भोजपुर जिले में सम्पन्न हुई जहाँ प्रत्यक्ष उपस्थित होकर अपनी कला के प्रदर्शन से कला विधाओं के छात्र-छात्राओं ने वार्षिक परीक्षा दी. शत्रुंजय संगीत विद्यालय,बिरजू महाराज कला आश्रम आरा, और भारतीय संगीत महाविद्यालय, उदवंतनगर में वार्षिक प्रायोगिक परीक्षा सम्पन्न हुई. संगीत के विद्यार्थियों ने अपने-अपने महाविद्यालय के प्रांगण में उपस्थित हो संगीत की परीक्षा दी. जिले के लगभग 700 संगीत विद्यार्थियों ने संगीत की विभिन्न विधाओं में सोमवार को परीक्षा में सम्मिलित हो आपनी कला का प्रदर्शन किया. बताते चलें कि जिले में कई संगीत अध्ययन के केंद्र है जो प्रयाग संगीत विद्यालय से सम्बन्ध रखते हैं. भारतीय संगीत महाविद्यालय उदवंतनगर में विभिन्न विधाओं में 220 परीक्षार्थियों ने प्रायोगिक परीक्षा में हिस्सा लिया. गायन में 150, वादन में 50 और नृत्य में लगभग 20 परीक्षार्थी शामिल हुए. परीक्षार्थियों के वाह्य परीक्षक के रूप में औरंगाबाद से आये पंडित दिनेश पांडेय ने परीक्षार्थियों की परीक्षा ली. परीक्षा के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया गया. एक-एक परीक्षार्थियों को बारी-बारी से बुलाकर उनकी परीक्षाएं ली गईं. हालांकि संगीत की ली जाने वाले इसके पूर्व की गायन और वादन की परीक्षाएं भी एक-एक छात्रों की ही ली जाती थी. परीक्षा के दौरान परीक्षार्थी के अलावां एक अन्य व्यक्ति संगत के

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सात समंदर पार के गिरमिटिया के दर्द की आवाज़ है ‘बटोहिया’

भोजपुरी का राष्ट्रगीत आरा. प्रवासी गिरमिटियों का दर्द पुराना है। इस दर्द को दहियावां, सारण के बाबु रघुबीर नारायण ने 1911 में शब्द दिया था। डॉं. राजेन्द्र प्रसाद जी के आग्रह उन्होंने एक गीत रचा ‘सुन्दर सुभूमि भैया भारत के देसवा’। इस गीत ने भोजपुरिया मानस को इस कदर छुआ कि आज इसे भोजपुरी ही नहीं पूरे पूर्वी भारत का राष्ट्र गान तक कहा जाता है। और इस गीत को महात्मा गाँधी ने इतना पसंद किया कि उन्होंने इस गीत को ‘वंदे मातरम’ की श्रेणी में रखा था, और उनके हर कार्यक्रम में इस गीत को बजाया जाता था। इस गीत से प्रेरणा पाकर कई युवक आज़ादी की लड़ाई में कूद गए थे। भोजपुरी पाठ्यक्रम में शामिल रहा है ‘बटोहिया’ आजादी के बाद इस गीत को स्कूलों में गाया जाता रहा तथा बिहार के स्कूल के सिलेबस में भी शामिल था। बाद में पटना विश्वविद्यालय के हिंदी सिलेबस में भी इस गीत को जगह दी गयी। लेकिन, बिहार के स्कूली पाठ्यक्रम के साथ साथ इसे पटना विश्विविद्यालय से भी हटा दिया गया। हालांकि, यह अब भी वीर कुँवर सिंह यूनिवर्सिटी में पढ़ाया जाता है। वैश्विक भोजपुरी समाज का प्रतिनिधि गीतभोजपुरिया समाज जिसका मूल भूगोल तो बिहार और उत्तर प्रदेश तक ही सीमित है लेकिन इसके समाज का विस्तार दुनिया के हर भूगोल को छूता है। इस वैश्विक समाज के केंद्र में भारत भूमि है। इसी भारत भूमि को केंद्र में रखकर आज इस समाज के लोककलाकारों की तीन पीढ़ियों ने साथ आकर काम करने की ठानी। आधार बना ‘सुन्दर सुभूमि

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जसम की श्रद्धांजलि सभा में याद किये गए राहत इंदौरी

हमें चराग समझ कर बुझा न पाओगे/ हम अपने घर में कई आफ्ताब रखते हैं आरा, आज फेसबुक रूम के जरिए जन संस्कृति मंच ने सुप्रसिद्ध शायर राहत इंदौरी की याद में एक कार्यक्रम किया, जिसमें दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। उनकी गजलों और शेरों को पढ़ा गया और उनके साहित्यिक महत्व पर बातचीत की गई। अध्यक्षता जलेस, बिहार के राज्य अध्यक्ष कथाकार नीरज सिंह ने की और संचालन जसम भोजपुर के सचिव कवि-कहानीकार सुमन कुमार सिंह ने किया। इस अवसर पर नीरज सिंह ने कहा कि राहत साहब की आज के समय में बहुत जरूरत थी। उनकी पैदाइश 1950 में आजाद हिंदुस्तान में हुई थी, वे नये सपनों के हिंदुस्तान की संस्कृति, उसके रग-रग तथा उसकी हर चिंता और गम से वाकिफ थे। वे अपने देश से टूटकर प्यार करने वाले प्रतिनिधि शायर थे। प्रगतिशील-जनवादी लोगों ने उन्हें बेहद पसंद किया। उन्होंने मंचीय कविता के बिगड़े स्वरूप के खिलाफ जीवन की शायरी को वहां प्रतिष्ठित किया। इस देश की बहुसंख्य जनता उनकी चिंताओं में अपनी चिंताओं को शामिल करे और उनके सपनों को अमली जामा पहनाने की कोशिश करे, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।‘हमारी कब्र से निकलेगी शायरी अब भी/ हमें मरा हुआ समझोगे तो मर जाओगे’ राहत साहब की शेर का हवाला देते हुए शायर इम्तयाज अहमद दानिश ने कहा कि उनकी शायरी जनवाद और ललकार की शायरी है। शायरी को मंचीय और अदबी शायरी में बांटा जाता है, लेकिन उन्हांेने मंच पर अच्छी अदबी शायरी पढ़ी। उनकी शायरी का अंदाज कुछ हद

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क्या आपको याद हैं आकाशवाणी के चर्चित लखन भाई!

आकाशवाणी पटना के चौपाल कार्यक्रम के भोजपुरी कंपीयर लखन भाई के रूप में विख्यात, भोजपुरी लोक गायक अनिल कुमार सिंह का बीते दिनों पटना स्थित उनके निवास पर उनका निधन हो गया. आकाशवाणी पटना के उच्च कोटि के गायक अनिल कुमार सिंह उर्फ लखन भाई ने आकाशवाणी – दूरदर्शन के साथ मारीशस में 1987 में बिहार से गये सांस्कृतिक दल में वहां सांस्कृतिक दल में भोजपुरी गायक और एक्टर के रूप में जीवनचक्र में सराहनीय भूमिका निभाई थी. लखन भाई के रूप में चौपाल से वे लगभग 33 वर्ष तक जुड़े रहे. आकाशवाणी पटना में लोकगीत कलाकार के रूप में वे 1980 के दशक में एप्रूव्ड हो चुके थे और भोजपुरी कंपीयर के रूप में वे 1986 ईस्वी में आकाशवाणी पटना से लखन भाई के रूप में जुड़े. इस क्रम में उन्होंने चौपाल के पहले मुखियाजी गौरीकांत चौधरीकांत, राम नरेश सिंह सहित बटुक भाई (छत्रानंद सिंह, गीता बहन, मौसी आदि के साथ काम किया. कई नाटकों सहित कुछ रेडियो धारावाहिकों में भी गीत गाये. लखन भाई के निधन पर इंडियन एसोसिएशन ऑफ लायर्स (बिहार चैप्टर) के महासचिव उदय प्रताप सिंह, पूर्व विधान पार्षद एवं हम सेकुलर के कार्यकारी अध्यक्ष उपेंद्रजी, चर्चित लोकगीत गायक और गीतकार ब्रजकिशोर दूबे सहित सहित आकाशवाणी पटना के कार्यक्रम प्रमुख उमाशंकर झा, कार्यक्रम अधिशासी रामबालक प्रसाद सहित नूतन मिश्रा , निभा श्रीवास्तव, प्रदीप भास्कर , संगीता सिन्हा , दिनेश झा, पवन मिश्रा , अनिता सिन्हा , दिव्या आदि ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए इसे अपूरणीय क्षति बतलाया है. PNCB

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नहीं रही पहली भोजपुरी फ़िल्म की नायिका कुमकुम

बॉलीवुड की मशहूर एक्ट्रेस कुमकुम जिन्होंने अपनी नृत्य प्रतिभा और अभिनय के दम पर करोड़ों दर्शकों के दिलों पर राज किया, उन्होंने कल 86 वर्ष की उम्र में इस संसार से कल विदाई ली. बिहार से रहा गहरा नाता कुमकुम का वास्तविक नाम जैबुन्निसा था और इनका बिहार के शेखपुरा से गहरा नाता था. दरअसल वे हुसैनाबाद के नवाब मंजूर हसन खान की बेटी थी और इनका जन्म भी हुसैनाबाद में 22 अप्रैल, 1934 को हुआ था. हालांकि ये जन्म के कुछ सालों बाद ही मुंबई चली गई पर गाँव से नाता बना रहा और हवेली की मरम्मत तथा गाँव की मदद के लिए पैसे भी भेजती थी. आज भी हुसैनाबाद में इनके रिश्तेदार रहते हैं. पहली भोजपुरी फ़िल्म में किया था शानदार अभिनय इनके कैरियर की शुरुआत ‘शीशा’ फ़िल्म से 1952 में हुई लेकिन प्रसिद्धि इनको तब मिली ज गुरुदत्त ने ‘कभी आर कभी पार’ (1953) गाने को शूट करने के लिए इनको चुना. उसके बाद से इन्होंने अपने नृत्य और अभिनय के बल पर 115 फिल्मों जितने लंबे कैरियर में वर्षों तक दर्शकों की पसन्द बनी रही. 1963 में बनी पहली भोजपुरी फ़िल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ में इन्होंने जो शानदार अभिनय किया वह आज भी लोग भूल नहीं पाते. उनका अभिनय इतना सशक्त रहा कि इसी साल एक और भोजपुरी फ़िल्म ‘लागी नाहीं छूटे रामा’ भी इन्हीं के हिस्से में आई. नृत्य की शिक्षा इन्होंने पंडित शम्भू महाराज से ली थी. ‘मधुबन में राधिका’ (कोहिनूर), ‘मचलती हुई’ (गंगा की लहरें), ‘ऐ दिल है मुश्किल’ (सी आई

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ये हैं वो खास राखियाँ’ जो सिर्फ सरहद पर जाती हैं!

संभावना स्कूल कर रहा है पिछले 5 सालों से यह पहल आरा. भाई-बहन के अनूठे प्यार को कलाईयों में बंधने वाली रेशम की डोरियाँ एक अनोखी चमक दे जाती हैं. जी हां हम बात कर रहे हैं रेशमी डोरी से कई रंगों में छँटा बिखेरनी वाली राखी की. रक्षाबंधन का त्योहार भाईयो के खास होता है क्योंकि उन्हें इंतजार रहता है बहनों के इस रक्षासूत्र का सालों से जो न सिर्फ उनकी रक्षा करता है बल्कि उनके रिश्ते की मजबूती को भी दर्शाता है. बाजार में उपलब्ध ये राखियां खास तब हो जाती हैं जब इसे बहने अपने हाथों से इसे भाईयों के लिए बनाती हैं. राखियों को हम अपने हरम तो जरूर बांध लेते हैं लेकिन वे भाई बहन के इस प्यार से मरहूम रह जाते हैं जो सरहदों पर हमारी हिफाजत के लिए खड़े रहते हैं. सीमा पर तैनात ऐसे ही वीर जवानों को उनके कलाईयों के लिए भेजती हैं राखियाँ,भोजपुर जिले की बहने,जिसमें उनके असीम प्रेम के साथ हुनर और कल्पनाशीलता का मिश्रण रहता है पिछले 4-5 सालों से लगातार भारत चीन सीमा पर राखियाँ भेजने वाली ये बहनें कोई और नही बल्कि संभावना आवासीय स्कूल की छात्रायें, शिक्षिकाएं और विद्यालय की कर्मचारी हैं. शहर के शुभ नारायण नगर मझौंवा स्थित संभावना आवासीय उच्च विद्यालय आरा के छात्राओं, शिक्षिकाओं एवं महिला कर्मचारियों द्वारा हस्त निर्मित राखियों को देश की सीमा पर तैनात सैनिक भाइयों तथा कोरोना वारियर्स के लिए इस बार भी भेजा गया. बताते चलें कि हर वर्ष रक्षाबंधन के अवसर पर विद्यालय में “राखी मेकिंग

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बिहार समेत 25 राज्यों के कलाकारों ने किया 4 घण्टे का सांकेतिक उपवास

आरा. गुरुवार को बिहार समेत 25 राज्यों के कलाकारों ने ऑल इंडिया थियेटर काउंसिल(AITC) के बैनर तले 4 घण्टे का उपवास कर सरकार का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया. कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के बाद कलाकारों की सरकार द्वारा उपेक्षा को लेकर जिला मुख्यालय आरा में भी यह सांकेतिक उपवास किया गया. लॉक डाउन में जिस तरह मजदूरों से लेकर आम नागरिक तक की घरेलू स्थिति बद से बदतर हो गयी उससे भी बुरी स्थिति कलाकारों की हो गयी. सरकारी योजनाओं से लेकर स्वास्थ्य,चिकित्सा और भयावह परिस्थितियों में जो जनता से लेकर सरकारी बाबुओ की बातों को प्रचारित और प्रसारित करने का काम करते थे, आज वे तमाम कलाकार हाशिये पर हैं. ऑल इंडिया थियेटर काउंसिल के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक मानव ने कहा कि सरकार ने भले ही 20 लाख करोड़ का पैकेज घोषित कर दिया है लेकिन कलाकारों का उसमे कोई जिक्र नही है. यही नही जिन कलाकारों ने कोरोना महमारी के पहले जिन सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार का काम किया था उनका पारिश्रमिक भी अबतक कलाकारों को विभागों की ओर से नही दिया गया. जिसको लेकर काउंसिल ने आपत्ति जताया. काउंसिल ने कलाकारों के लिए कई मांगो को सरकार के सामने रखा. बताते चलें कि जिला मुख्यालय में चले इस मुहिम में देश के लगभग 25 राज्यों के कलाकारों ने सुबह 7 बजे से 11 बजे तक “मेरी भी सुध लो सरकार” कार्यक्रम के माध्यम से सांकेतिक उपवास रख अपनी पीड़ा का इजहार किया.माँगें-१) जिलावार कलाकारों की रोस्टर सूची बनाई जाय2) डिग्री प्राप्त व प्रशिक्षित कलाकारों को सरकारी

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