रिमझिम फुहारों में थिरक उठी भोजपुरी कलाकृतियाँ

12वें दिन आन्दोलन में शामिल हुए कई दिग्गज और सामाजिक चेहरे आगत अतिथियों ने कहा सरकार तक पहुँचेगी यह आवाज आरा,12 जून(ओ पी पांडेय). जून का दूसरा सप्ताह खत्म होने वाला है और बिहार ने मानसून की दस्तक भी दे दी है. पहले दिन की ही फुहार से मौसम सुकून भरा हो गया है. इस बीच पिछले 12 दिनों से आंदोलनरत भोजपुर के चित्रकारों ने छाते को भोजपुरी पेंटिंग से सजाना शुरू कर दिया है. शुक्रवार से ही छातों के ऊपर विंभिन्न कलाकृतियों को कलाकारों ने बनाने का सिलसिला चालू किया है. प्लेन छातों के ऊपर कलाकृतियों के बनने के बाद तो छाते ऐसे दिखने लगे जैसे उनमें जान आ गये हों. उनमें बनी आकृतियों को देखने के बाद ऐसा लगता था जैसे वे कह रही हों कि ऐ मेघ जल्दी बरस क्योंकि इस बार तो पूरे मॉनसून हम छातों पर चहकेंगे और अपनी खुशी मनाएंगे. वर्षो बाद इन कलाकारों के मेहनत ने मेरे सम्मान के लिए ये लड़ाई शुरू की है. मैं खुश हूँ कि पूरा माहौल अपने विरासत को बचाने में लगा है. छाते पर बनने वाली पेंटिंग कोहबर और पीड़िया शैली की है जो भोजपुर की अपनी थाती है. इनका सम्बंध मानव सभ्यता के विकास काल से ही रहा है. सभ्यता के विकास के साथ इसमें कुछ बदलाव जरूर आये लेकिन नही बदलीं तो वे इन चित्रों की रेखाएं और उनमें निहित कुछ खास चीजों का अंकन जो जीवन के मानवीय पहलुओं में नित विराजमान है. रंगों का संयोजन और उनका आपसी रिफ्लेक्शन उनके रूप में और

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जाग उठे हैं भोजपुर के कलाप्रेमी, शुरू किया हस्ताक्षर अभियान

आरा,3 जून. भोजपुर के कलाकारों ने भोजपुरी कला संरक्षण मोर्चा द्वारा गुरुवार को आरा रेलवे स्टेशन परिसर में भोजपुरी चित्रकला को सम्मान और स्थान दिलाने के लिए दो दिवसीय हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत की गई. ज्ञातव्य है कि पूर्व मध्य रेलवे द्वारा भोजपुरी भाषी क्षेत्र आरा के रेलवे स्टेशन परिसर में चारों तरफ़ मधुबनी चित्रकला का अंकन किया जा रहा है. स्थानीय संस्थाओं,कलाकारों एवं बुद्धिजीवियों द्वारा इसका जबरदस्त विरोध किया जा रहा है. भोजपुरी भाषी क्षेत्र में स्थानीय संस्कृति की उपेक्षा कर दूसरी संस्कृति को महत्व देना,स्थानीय संस्कृति का अपमान है. मोर्चा से जुड़े सभी सदस्यों का कहना है कि हमारा विरोध मधुबनी चित्रकला से नहीं,अपितु भोजपुरी भाषी रेलवे स्टेशनों पर भोजपुरी चित्रकला को स्थान और अवसर नहीं मिलने से है. अगर दो दिवसीय हस्ताक्षर अभियान के बाद भी रेलवे प्रशासन द्वारा भोजपुरी चित्रकला को अवसर नहीं दिया जायेगा तो उसके बाद से ही चरणबद्ध आंदोलन चला कर आरा रेलवे स्टेशन पर मधुबनी चित्रकला का अंकन रोक स्थानीय लोग विरोध पर उतरेंगे. स्थानीय महिलाओं ने भी कलाकारों, संस्थाओं के प्रतिनिधियों एवं बुद्धिजीवियों के संघर्ष में कंधा से कंधा मिलाकर साथ देने की बात कही. स्थानीय रेलयात्रियों एवं युवाओं में तो जबरदस्त आक्रोश दिख रहा था. साथ ही स्थानीय जन प्रतिनिधियों के द्वारा भी इस मुद्दे पर सहयोग नहीं मिलने से भी लोगों में गुस्सा दिख रहा है. उन्होंने कहा कि मोर्चा द्वारा जब भी कहा जायेगा हम उग्र आंदोलन के लिए भी तैयार हैं. स्टेशन परिसर में इस हस्ताक्षर अभियान को देखने के बाद भोजपुर के ग्रामीण क्षेत्रों से आये

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भोजपुरी पेंटिंग्स को जिला मुख्यालय में भी जगह नही मिलने से आक्रोश में कलाकार, चलाएंगे हस्ताक्षर अभियान

3-4 जून को चलेगा हस्ताक्षर अभियान आरा,2 जून. भोजपुरी पेंटिंग्स को जिला मुख्यालय में भी जगह नही मिलने से जिला के कलाकार आक्रोश में कलाकार हैं. रेलवे द्वारा रेलवे परिसर में भी भोजपुरी पेंटिंग का उपयोग नही करने को लेकर बेहद दुःखी हैं. इसके विरुद्ध कल से वे हस्ताक्षर अभियान रेलवे परिसर में ही चलाएंगे और उसके बाद रेलवे को इसे भेजा जाएगा. ऐसी खबर है कि आरा रेलवे परिसर का सौंदर्यीकरण हो रहा है जिसे मैथली पेंटिंग से सजाया जाएगा. इसके पूर्व भी रेलवे ने स्टेशन परिसर में स्थित टिकट घर मे मैथली पेंटिंग का ही उपयोग किया था जिसका यहाँ के कलाकारों ने विरोध किया था इस सम्बंध में ऊर्जा मंत्री को ज्ञापन भी सौंपा था और भोजपुरी पेंटिंग का भोजपुरिया क्षेत्र में उपयोग करने की रिक्वेस्ट किया था लेकिन उसपर ध्यान नही देने से इस बार कलाकारों में आक्रोश व्याप्त है. पूर्व मध्य रेलवे,दानापुर द्वारा आरा रेलवे प्लेटफॉर्म पर मधुबनी चित्रकला के अंकन कराये जाने एवं भोजपुरी चित्रकला को अवसर नहीं प्राप्त होने पर जयप्रकाश नारायण स्मारक के पास आयोजित बैठक में कही पिछले दिनों 31 मई को एक बैठक कर आगे की रणनीति भी बनाई थी. बैठक में उपस्थित वरिष्ठ रंगकर्मी और पत्रकार रवींद्र भारती ने कहा था कि भोजपुरी चित्रकला भोजपुरी भाषी क्षेत्र की संस्कृति एवं पहचान है. भोजपुरी भाषी क्षेत्र के रेलवे स्टेशनों एवं सार्वजनिक स्थानों पर भोजपुरी चित्रकला को अंकित होने का अवसर नहीं देना, इस क्षेत्र की जनता का अपमान है. बैठक में उपस्थित कलाकारों एवं सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने भोजपुरी भाषी क्षेत्रों

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क्या देखी आपने ये स्ट्रीट आर्ट पेंटिंग !

लुभाते स्लोगन और पेंटिंग का स्ट्रीट-जंग आरा,1 जून. क्या आपने कभी स्ट्रीट आर्ट पेंटिंग को देखा है? अगर नही तो अपने शहर में यह मौका आपको मिल सकता है. आमतौर पर सड़कों पर स्लोगन के साथ कुछ आकृतियों को लोग बना उसे स्ट्रीट पेंटिंग का नाम देते हैं. लेकिन जब इसमें कलात्मकता के साथ ये सन्देश जोड़े जाते हैं तो यह स्ट्रीट आर्ट पेंटिंग के नाम से जाना जाता है. कुछ इसी फॉमेट की पेंटिंग आरा की धरती से जुड़े कलाकारों ने जो फिलहाल दूसरे शहरों में अपनी जीविका चला रहे उन्होंने मंगलवार को बनाया. मनभावन स्लोगन जहाँ लोगों को पढ़ने को लालायित करते दिखे तो कलात्मक कलाकृतियां राहगीरों को अपनी ओर आकर्षित करती दिखीं. ऐसा लगा जैसे स्ट्रीट पर ही कलाकृतियों और लुभावने स्लोगनों के बीच जंग चल रहा हो. कोरोना वायरस से बचाव एवं जागरूकता के साथ फ्रंट लाइन वर्कर व कोरोना वारियर्स सम्मान में आरा समकालीन चित्रकारों ने शहर में विशाल कलरफुल स्ट्रीट आर्ट पेंटिंग (Street Art Painting) निर्माण किया. स्थानीय रमना मैदान एवं सांस्कृतिक भवन के समीप गोलंबर के पास सड़क पर इस रंगीन स्ट्रीट आर्ट पेंटिंग को चित्रकारों ने कुचियों से इसे कलात्मक आकार दिया. इस कार्यक्रम में सभी कलाकारों को संयोजित करने का काम किया कौशलेश कुमार ने. कौशलेश मुलतः आरा के रहने वाले हैं लेकिन वर्तमान में वाराणसी रहते हैं और केंद्रीय विद्यालय(BHU) में कला-शिक्षक हैं. उन्होंने इसके पूर्व वाराणसी में मास्क पर संदेशों के जरिये बच्चों के साथ पेंटिंग कार्यशाला का कार्यक्रम फरवरी महीने में किया था जिसकी काफी सराहना लोगों ने

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रेलवे द्वारा भोजपुरी कला की उपेक्षा पर जबरदस्त आक्रोश

आरा। भोजपुरी चित्रकला भोजपुरी भाषी क्षेत्र की संस्कृति एवं पहचान है। भोजपुरी भाषी क्षेत्र के रेलवे स्टेशनों एवं सार्वजनिक स्थानों पर भोजपुरी चित्रकला को अंकित होने का अवसर नहीं देना, इस क्षेत्र की जनता का अपमान है।उपरोक्त बातें वरिष्ठ रंगकर्मी और पत्रकार रविंद्र भारती ने  पूर्व मध्य रेलवे,दानापुर द्वारा आरा रेलवे प्लेटफॉर्म पर मधुबनी चित्रकला के अंकन कराये जाने एवं भोजपुरी चित्रकला को अवसर नहीं प्राप्त होने पर जयप्रकाश नारायण स्मारक के पास आयोजित बैठक में कही।बैठक में उपस्थित कलाकारों एवं सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में मधुबनी चित्रकला लगाये जाने को लेकर आक्रोश और भारी विरोध था।वरिष्ठ रंगकर्मी कृष्णेन्दु ने कहा कि हमारा विरोध मधुबनी चित्रकला से नहीं अपितु भोजपुरी भाषी जिला के मुख्यालय आरा के रेलवे स्टेशन पर भोजपुरी चित्रकला को जगह नहीं देने से है।हमलोग सफलता मिलने तक लगातार संघर्ष करते रहेंगे। भोजपुरी मैथिली अकादमी, नई दिल्ली के सदस्य श्री रवि प्रकाश सूरज ने कहा कि हम भोजपुरी भाषियों के लिए यह एक सुनहरा अवसर था, जिसके माध्यम से हम लोगों को भोजपुरी संस्कृति के इस महत्वपूर्ण पहलू से जनमानस को परिचित कराते।वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता और कलाकार विजय मेहता ने कहा कि हमें अब ठोस रणनीति बनाकर भोजपुरी चित्रकला को स्थापित करने के लिए कार्य करना होगा। वरिष्ठ चित्रकार कमलेश कुंदन ने कहा कि सामूहिकता से हर संबंधित स्थान पर दबाव बना कर हम भोजपुरी चित्रकला को सम्मान और उचित स्थान दिल सकते हैं। भोजपुरी संस्कृति के संरक्षण हेतु वर्षों से संघर्षरत सुनील कुमार पाण्डेय ने कहा कि हम भोजपुरी भाषियों को अपनी पहचान को बचाने के लिए एकजुट होकर निरन्तर कार्य करना होगा।युवा चित्रकार कौशलेश ने

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नही रही भोजपुरी की इनसाइक्लोपीडिया रेखा तिवारी !

एक हफ्ते से थी सांस में तकलीफ, बुधवार को लिया अंतिम साँस पटना,21 अप्रैल(ओ पी पांडेय). भोजपुरी की इनसाइक्लोपीडिया के नाम से विख्यात 48 वर्षीय लोक गायिका रेखा तिवारी ने आज बोकारो में अंतिम सांस लिया. वे पिछले 14 अप्रैल से अस्पताल में इलाजरत थीं. कोरोना की वजह से साँस लेने में तकलीफ के कारण वे अस्पताल में ऑक्सीजन पर थीं. उनका स्वास्थ्य सुधर भी रहा था लेकिन मंगलवार से उनका बीपी लो होने लगा और लगातार ऑक्सीजन लेवल भी कम होने के कारण बुधवार की अहले सुबह लभगग 5.30 बजे उनका देहावसान हो गया. लोकसंगीत की बात हो और रेखा तिवारी का नाम न आये ये संभव नही है. शायद ही कोई भोजपुरी का लोकोत्सव हो या लोकपर्व जो उनसे अछूता रह गया हो. हमेशा चेहरे पर मुस्कान और आवाज में भोजपुरी की सोंधी खुश्बू के साथ जब उनकी टांस सुनने को जिसे मिकता वो उनका मुरीद हो जाता था. उनकी आवाज का जादू सबके सिर चढ़कर बोलता था. किसी बात की जब चर्चा होती उनके पास उसके लिए गीत मौजूद होता था. ऐसी त्वरित डिमांड पेश करने वाली बहुचर्चित लोकगायिका रेखा तिवारी का निधन बुधवार को कोरोना की वजह से हो गया. उनकी तबियत पिछले एक हफ्ते से खराब चल रही थी. उन्हें साँस लेने में तकलीफ थी. यह सांस की तकलीफ भोजपुरी के सुरों की सांस छीन लेगा ये कोई नही जानता था. रेखा तिवारी सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव थीं. उन्होंने अभी हाल के चैत नवरात्रि का पूजन भी लोगों से शेयर किया था इसके पहले

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रंग छतिसा के संस्थापक का निधन

चला गया कलाकार छोड़ गया सवाल हमारे चेहरों पर : दीपक तिवारी स्मृति शेष वह विस्तर पर रोज मरता रहा और उसका परिवार भी रोज तिल-तिल मरता रहा, पटना. रंग छत्तीसा के संस्थापक व शानदार अभिनेता, गायक,और नर्तक दीपक तिवारी का शनिवार को निधन हो गया. उनसा रंगकर्मी सदियों में एक होता है. वे भारत लोक रंगकर्म के ईश्वरीय देन थे जिन्हें रंगधुनी हबीब तनवीर ने ढूँढा था. 19 अक्टूबर 1959 को जन्में दीपक ने सितारा बिलासपुर के मंगला गांव से अपनी रंग यात्रा की शुरुआत की और दुनिया में अपने रंग का चमक बिखेर राजनांदगांव से शनिवार को विदा हो गया. सबको अपने अभिनय से अविभूत करने वाले दीपक ने बेहद कष्ट, और अभाव में आखिरी साँसे ली. दीपक तिवारी को बेहद करीब से जानने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय में कार्यरत सहायक प्रोफेसर एम के पांडेय ने उनके निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया है. दीपक तिवारी को आइये जानते है उनकी जुबानी…. Patna now special उस रोज 2017 का संगीत नाटक अकादमी अवार्ड कलाकारों को हमेशा की तरह राष्ट्रपति भवन में मिलना था. मैं जैनेंद्र के साथ भिखारी ठाकुर के संगी कलाकार रामचंद्र मांझी के लिए गया हुआ था. पुरस्कारों के बाद भोजन के समय व्हील चेयर पर बैठे दीपक तिवारी पत्नी और नया थियेटर की कमाल कलाकार पूनम तिवारी (बाई) और उनकी बेटी से मुलाकात हुई. फिर थोड़ी बतकुच्चन हुई पर अफसोस हुआ कि दीपक न ठीक से बोल पा रहे थे, न ही अधिक हिलडुल रहे थे. पूनम उनको संभाल-संभाल कर सामने वाले की बात बता रहीं

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सेवानिवृत्त शिक्षक संघ ने दी श्रद्धांजलि

आरा,10 मार्च. वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय सेवानिवृत्त शिक्षक संघ द्वारा पूर्व हिंदी-भोजपुरी विभागाध्यक्ष डॉ गदाधर सिंह के निधन पर आज एक श्रद्धांजलि सभा स्नातकोत्तर भोजपुरी विभाग के सभागार में आयोजित की गई. संघ के सचिव वीरेंद्र प्रसाद सिंह ने गदाधर बाबू के अध्यापनकाल और उनके योगदान को रेखांकित किया. इसके बाद गदाधर बाबू की आत्मा की शांति के लिए 2 मिनट का मौन रखा गया. श्रद्धांजलि सभा में जेपीयू के पूर्व कुलपति दुर्गविजय सिंह, संतोष कुमार, कामेश्वर सिंह, परशुराम पांडेय, नन्दजी दूबे, अयोध्या प्रसाद उपध्य्याय, बलराम मिश्र, किरण कुमारी के अलावा विवि के कई सेवानिवृत्त शिक्षक उपस्थित थे. PNC

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गिर गइल भोजपुरिया बरगद के गाछ!

‘माया महाठगिनी’ के रचयिता छोड़ चले माया नगरी आरा. मूर्धन्य भोजपुरी साहित्यकार और स्नातकोत्तर भोजपुरी-हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ गदाधर सिंह ने मंगलवार सुबह 4 बजे अपने निवास कतिरा में आखरी सांस ली. डॉ गदाधर सिंह का जन्म 24 नवम्बर, 1930 को चकवथ, बिहिया में हुआ था. देश के एकमात्र भोजपुरी विभाग की स्थापना और अध्यापन तथा विवि में भोजपुरी भवन के निर्माण में उनका अविस्मरणीय योगदान था. वे देश ही नही विश्व के पहले भोजपुरी विभागध्यक्ष थे. उनका यह गौरव न सिर्फ भोजपुर का बल्कि भोजपुरी को अंनत तक शान महसूस करता रहेगा. व्यक्ति दो तरह के होते हैं एक जो कुछ लोगों या समाज के लिए जाने जाते हैं और एक वे जो धूमकेतु के प्रकाश की तरह अनंत काल तक अपने प्रकाश से सबको आलोकित किया करते हैं. डॉ गदाधर वैसे ही अनंत काल तक भोजपुरी क्षेत्र और उनके लोगों को प्रकाशवान करने वालों में शीर्ष पर है. सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे आजीवन साहित्य सेवा में लगे रहे और दर्जनों किताब लिखे. भोजपुरी के चर्चित ललित निबंध संग्रह माया महाठगिनी और मोहि ब्रज बिसरत नाहीं की रचना उन्होंने की थी. इसके अलावा भोजपुरी भाषा की विकास यात्रा, भोजपुरी साहित्य का इतिहास और भोजपुरी काव्यधारा उनकी उल्लेखनीय कृतियाँ हैं. भोजपुरी के अलावा हिंदी में कई पुस्तकें उन्होंने लिखी जिनमें हिंदी भाषा के विकास में जैन साहित्य का योगदान और कुँवर सिंह पर एक पुस्तक अहम है. डॉ गदाधर सिंह ने देश के अलग-अलग संस्थानों में भोजपुरी का अध्ययन-अध्यापन कार्य शुरू करवाने में योगदान दिया. भोजपुरी

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‘काव्य-संध्या’ में बही साहित्य की गंगा

आरा, आरोह थियेटर और आरा बुक क्लब के बैनर तले आज आरा के जयप्रकाश स्मृति स्थल, रमना मैदान में कविता की साझी विरासत से जुड़ी काव्य-संध्या (शाम-ए-सुख़न) आयोजित हुई। इसमें आरा और आसपास के क्षेत्र के कवि, रंगकर्मी, चित्रकार और विभिन्न संस्कृतिकर्मी उपस्थित रहे। कवियों और शायरों ने अपने समाज की नब्ज़ को परखने वाली कविताएँ, ग़ज़लें और गीत प्रस्तुत किये। रविशंकर ने ‘हत्यारे की सुबह’ कविता के पाठ से कार्यक्रम का आगाज़ किया। चित्रकार और कवि राकेश दिवाकर ने ‘वे किसान हैं’ और ‘सवाल बवाल है’ कविताएँ प्रस्तुत कीं। सुमन कुमार सिंह ने किसानों की मौजूदा हालत से जुड़ी कविता ‘हल चलाना देश चलाना नहीं होता’ पढ़ी एवं भोजपुरी व्यंग्य गीत ‘डगरिया समेटs जन रजवा’ गाकर सुनाया। मक़बूल शायर इम्तियाज़ अहमद ‘दानिश’ जी ने अपनी दो ग़ज़लें तरन्नुम में सुनाईं। ‘वो हौसला ही कहाँ बाज़ुओं में जान कहाँ’ में मौजूदा राजनीतिक हालात की समीक्षा भी है। छपरा से आये अहमद अली जी ने ‘ राख के ढेर में हीरे को छुपाने वाले’ ग़ज़ल गाकर सुनाई। वरिष्ठ कवि जनार्दन मिश्र ने भी भोजपुरी गीत ‘गंगा मैया’ गाकर सुनाया। प्रख्यात कवि एवं संपादक संतोष श्रेयांश ने ‘काली छतरी’ और ‘बोनसाई’ कविताओं के ज़रिए मध्यवर्गीय विडंबनाओं को उकेरा। वरिष्ठ कवि ओमप्रकाश मिश्र ने कोरोना काल की अपनी कई छोटी कविताएँ प्रस्तुत की जिनमें महामारी के स्याह और रौशन दोनों पहलू थे। चर्चित कवि अरुण शीतांश ने ‘वृक्षों से लिपट कर रोना चाहता हूँ’ और ‘नज़री नक्शा’ कविताओं से अपने परिवेश में होने वाली असंवेदनशील घटनाओं की तरफ ध्यान आकृष्ट किया। नीलाम्बुज सरोज

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