हाशिये पर जो हैं उनकी हसरत

“हाशिए पर हसरत” का लोकार्पण 30 अगस्त को बिहार में हाशिये पर रहने वालों की क्या है हसरतकैसा जीवन चाहते हैं हाशिये पर रहने वाले लोगक्या बचा है उनके जीवन में आजादी के 75 साल बाद आरा: भीम सिंह भवेश आज पत्रकारिता और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में 20 से ज्यादा वर्ष से सक्रिय है। उन्होंने बिहार और खास कर भोजपुर के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के लिए अनेक काम किए हैं । उनकी दूसरी पुस्तक “हाशिए पर हसरत” (प्रभात प्रकाशन) का लोकार्पण 30 अगस्त को हरिवंश जी (उपसभापति, राज्यसभा) के कर कमलों द्वारा किया जायेगा। पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम विधान परिषद के सभागार में 30 अगस्त को अपराह्न 3:15 बजे होगा।इस मौके पर विशिष्ट अतिथि कृषि मंत्री बिहार सरकार,वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत और मुंगेर विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति प्रो.जवाहर लाल होंगे और कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे साहित्यकार एवं पूर्व विभागाध्यक्ष वीर कुंवर सिंह विश्वविधालय आरा,के डॉ नीरज सिंह । भीम सिंह भवेश की दूसरी प्रकाशित पुस्तक ‘हाशिये पर हसरत’ का प्रकाशन किया है प्रभात प्रकाशन ने।इस अवसर पर प्रकाशन के निदेशक राजेश शर्मा भी मौजूद रहेंगे। PNC desk

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अवार्ड मिलने के बाद क्या कहा पंकज त्रिपाठी ने

मेरा इरादा अपनी क्षमता के अनुसार सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का है मुम्बई : सर्वोत्कृष्ट ‘आम आदमी’ और जनता की आवाज बने पंकज त्रिपाठी ने पर्दे पर प्रतिष्ठित पात्रों को जीवन्त कर दिया है जो हमेशा दर्शकों के दिमाग में अंकित रहेगा। विभिन्न प्लेटफार्मों पर अपने बहुमुखी और सहज प्रदर्शन के लिए जाने जाने वाले पंकज त्रिपाठी ने मनोरंजन उद्योग में अपने लिए एक जगह बनाई है। मेलबर्न के भारतीय फिल्म महोत्सव ने पंकज त्रिपाठी को सिनेमा में विविधता पुरस्कार से सम्मानित किया है। इस अवॉर्ड के बाद उनके प्रशंसकों की लगातार शुभकामनाएं मिल रही है ।बिहार के लोगों के बीच पंकज त्रिपाठी एक कुशल अभिनेता के रूप में चर्चित हैं । पुरस्कार के बारे में बोलते हुए, पंकज कहते हैं, “मेरा इरादा अपनी क्षमता के अनुसार सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का है, और मैं बहुत आभारी हूं कि दर्शकों द्वारा मेरे प्रदर्शन की सराहना की जाती है।” PNC Desk

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जीवन के महाविनाश की गाथा ‘जंगल गाथा

यह कोई फिक्शन नहीं है, लेकिन पढ़ने में फिक्शन का मज़ा देता है ; जितेन्द्र कुमार जंगल गाथा:वन जीवन के महाविनाश की गाथा

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फर्स्ट इनकाउंटर वेब सीरीज का मुहूर्त आरा में

भोजपुर के पहले एनकाउंटर की कहानी होगी फर्स्ट एनकाउंटर अल्ट्रा स्पेलबाइंडिंग प्रोडक्शन के बैनर तले बनने वाली वेब सीरिज “फर्स्ट एनकाउंटर” आरा, 22 अगस्त. रमना मैदान स्थित महावीर मंदिर प्रांगण में मेयर रूबी तिवारी ने पूर्णिमा के पावन अवसर पर नारियल फोड़ मंदिर में पूजा अर्चना की। मौका कुछ खास था क्योंकि इस पूजा में शामिल था एक वेब सीरिज के स्क्रिप्ट की पूजा। अल्ट्रा स्पेलबाइंडिंग प्रोडक्शन के बैनर तले बनने वाली वेब सीरिज “फर्स्ट एनकाउंटर” का कांसेप्ट व निर्देशन की कमान संभालेंगे शहर के चर्चित रंगकर्मी व निर्देशक ओ पी पाण्डेय। क्रिएटिव टीम में शामिल हैं वरिष्ठ रंगकर्मी और पत्रकार रविन्द्र भारती, मंगलेश तिवारी, व ओ पी कश्यप, इस वेब सीरीज के निर्माता है पुष्कर पाण्डेय, प्रोडक्शन मैनेजर रंगकर्मी मनोज श्रीवास्तव को बनाया गया है। स्क्रिप्ट की पूजा अर्चना के इस शुभ अवसर पर नारियल फोड़ शुभ मुहूर्त करने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए मेयर रूबी तिवारी ने कहा कि आरा में वेब सीरिज का निर्माण होना एक सुखद खबर है। इससे यहां के स्थानीय कलाकारों को जहां काम करने का मौका मिलेगा वही भोजपुर के इलाकों को रुपहले पर्दे पर देखने के बाद अन्य निर्माताओं को भी आने की इच्छा जगेगी। इससे पर्यटन उद्योग और फिल्म निर्माण उद्योग की दिशा में नई क्रांति आ सकती है। निर्देशक ओ पी पाण्डेय ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि फर्स्ट एनकाउंटर भोजपुर जिले के पहले एनकाउंटर की कहानी है। जल्द ही इसके लिए कलाकारों का चयन ऑडिशन के माध्यम से आरा,पटना और रांची में किया जाएगा। इस

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वर्तमान गवाह है…चिराग जैन

वर्तमान गवाह है… जिन्होंने यह कहना शुरू किया कि इस्लाम ख़तरे में है, उन्हीं के नुमाइंदों ने आज अफगानिस्तान पर जबरन कब्ज़ा कर लिया। यूएनओ में स्थायी सदस्यता की डींगें हाँकने वाले देशों के लिए यह शर्मिंदगी भरी लानत है। सबसे उम्दा हथियार बनाने वाले देशों के लिए यह डूब मरने की बात है। मानवाधिकार के नाम पर अन्य देशों की निजता में हस्तक्षेप करने वाले चौधरियों के लिए यह निर्वस्त्र होने जैसा अनुभव है।धार्मिक कट्टरता की ओट में सत्ता की गलियां तलाश रही बर्बरता का घिनौना चेहरा तालिबान की हरक़तों में साफ दिखाई दे रहा है। कट्टरता के खोल में छिपे ये लिजलिजे कीड़े अपने खोल की मज़बूती को लेकर इतने आश्वस्त हैं कि अब ये पूरी मनुष्यता को चाटने की तैयारी में जुट गए हैं। चूँकि वैचारिक स्तर पर विकसित होती मानवता इनके खोल के लिए सर्वाधिक हानिकारक है, इसलिए ज्यों ही कोई व्यक्ति इन्हें सोच के स्तर पर विकास करता दीख पड़ता है, ये तुरन्त बर्बर हो जाते हैं। मुस्कुराहट और ठहाके इनके आतंक पर सबसे बड़ा आघात हैं, इसलिए हँसाने वाले लोगों के विरुद्ध ये धर्म और संस्कृति के अपमान की निराधार दलीलें परोसने लगते हैं। उत्सव मनाते हुए लोग इन्हें अपने दहशती सम्मोहन से छूटते हुए प्रतीत होते हैं इसलिए उत्सवों की हत्या के लिए ये बम फोड़ने लगते हैं। ज्यों ही मनुष्यता को यह एहसास होने लगता है कि वह इक्कीसवीं सदी में खड़ी है, ये तुरन्त उसे घसीटकर सोलहवीं शताब्दी में ले जाने की ज़िद्द करने लगते हैं। मनुष्यता मिल-जुलकर रहना चाहती है

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रैन भई चहुँ देस: मिथिलेश्वर

मिथिलेश्वर की नई कहानी संग्रह “रैन भई चहुं देस” मेरा नया कहानी संग्रह है, बारहवां कहानी संग्रह। मेरा पहला कहानी संग्रह “बाबूजी” वर्ष 1976 में प्रकाशित हुआ था और अब उसके 45 वर्षों बाद यह बारहवां संग्रह।इस बीच मेरे अन्य कहानी संग्रह, उपन्यास, आत्मकथाएं, लोककथाएं और बाल कथओं की पुस्तकें प्रकाशित होती रहीं।लेकिन इन सबके मूल में मेरा कथा लेखन ही रहा।इसीलिए इस नए कहानी संग्रह के प्रकाशन पर इसकी कथाभूमि की याद स्वाभाविक है। इस संग्रह की नामित कहानी”रैन भई चहुं देस” की रचना के दौरान इस तथ्य और सत्य से मैं अवगत हुआ कि विकास की आंधी और भौतिकता की अंधी दौड़ में हमारे नितांत निजी एवं आत्मीय सम्बन्धों की तरलता न सिर्फ सूख गयी है, बल्कि उन पर क्रूरता और हैवानियत इस तरह हावी होती जा रही है कि दहशत पैदा होती है । इस कहानी के मुख्य चरित्र राजदेव राज की कहानी लिखते हुए और लिखने के बाद भी यह सवाल मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा है कि हमारे जिन निजी , पारिवारिक और सामाजिक सम्बन्धों को पूरी दुनिया आदर्श की दृष्टि से देखती थी , हमारे वे सम्बन्ध इस तरह विरूप कैसे होते चले गये ? अपने जीवन की सांध्य वेला में राजदेव राज अपने जिस पुत्र को अपना मजबूत अवलंब मान उसके साथ रहते हुए उसके प्रति – जी जान से समर्पित रहे।अन्य पुत्रों की तुलना में उसके अभाव को अपने स्तर से दूर करने का निर्णय उन्होंने ले लिया।पिता के रूप में उन्होंने अपना यह फर्ज समझा। लेकिन उनके मन की योजनाएं धरी

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कहानी साहित्य की सबसे लोकप्रिय विद्या – मिथिलेश्वर

कथा लेखन के पांच दशक मेरे जानते कहानी साहित्य की सबसे लोकप्रिय विधा रही है।उसकी लोकप्रियता की शक्ति अपने समय और समाज के सच की अभिव्यक्ति तथा संवेदना के नये आख्यानों की रचना में ही निहित होती है।शायद यही वजह है कि अपने जीवन में पढ़ी अनेक कहानियों को हम कभी भूल नहीं पाते हैं।”उसने कहा था” के लहना सिंह तथा “शतरंज के खिलाड़ी” के मीर मिर्जा ही नहीं, ऐसे सैकड़ों चरित्र और उनके प्रसंग हमारी चेतना को प्रेरित और प्रभावित करते रहे हैं। इन्हीं विशेषताओं के चलते कहानी से मेरा लगाव प्रारंभ से ही रहा है।शायद इसीलिए जिस उम्र में रचनाकार कविता से शुरुआत करते हैं,मैंने कहानी से की।वह 1970 का वर्ष था जब मैं कथा लेखन की दुनिया में आया।वह हिन्दी में व्यापक पाठकीयता का समय था।”धर्मयुग”,”साप्ताहिक हिन्दुस्तान”,”सारिका” जैसी जिन पत्रिकाओं में मैं लिखता था, उनकी प्रसार संख्या लाखों में थी।उस समय पठकों की उत्साहजनक प्रतिक्रियाएं हमारे रचनाकार मन को आश्वस्त करती थीं।कहने की आवश्यकता नहीं कि तब लेखन हमें सामाजिक विकास के संघर्ष में रचनात्मक भागीदारी का एहसास कराता था।इस तरह पिछले पचास वर्षों के दौरान पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों से जब-जब नए कहानी संग्रह प्रकाशित होते रहे ,हमें रचनात्मक सुख की अनुभूति कराते हुए निरंतर रचनारत रहने के लिए प्रेरित करते रहे।इसके मूल में हमारे समय की पाठकीयता की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।इस क्रम में मेरे 12 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए — बाबूजी-1976, बंद रास्तों के बीच -1978, दूसरा महाभारत-1979, मेघना का निर्णय-1980, तिरिया जनम-1982, हरिहर काका-1983, एक में अनेक-1987, एक थे प्रो.बी.लाल-1993, भोर होने से

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बांटो और राज करो सत्ता की नीति थी, आज भी है- गुंजन सिन्हा

बांटो और राज करो सत्ता की नीति थी, आज भी है. उसका नया बाना है – विभाजन विभीषिका स्मृति. इस सन्दर्भ में मेरा एक पुराना लेख भी नया हो गया. इसके लिए, थैंक्यू मोदी जी ।विषय है – भारत विभाजन सिनेमा के पर्दे पर – 2003 में एक पाकिस्तानी फिल्म आई थी. नाम था – खामोश पानी. इसमें एक महिला आयशा बच्चों को कुरान पढ़ाती है. उसका बेटा जनरल जिया-उल-हक के इस्लामिक कट्टरवाद से ग्रस्त है. बंटवारे के समय आयशा सिख थी. अस्मत बचाने के लिए वह परिवार के चाहने के बाद भी कुँए में नहीं कूदी. भाग गई. अपने अपहरणकर्ता से शादी करके और वीरो से आयशा बन कर बच गई, लेकिन इतनी खौफजदा कि कभी कुएं के पास भी नहीं जाए. उसका अतीत जान कर कट्टर मुस्लिम बेटा उससे नफरत करने लगा. तब आयशा कुएँ में कूद गई. मानवीय त्रासदी की इस असाधारण प्रतीक आयशा की भूमिका किरण खेर ने निभाई थी. अब वे भाजपा सांसद हैं. 2020 की रक्तरंजित फरवरी सवाल करती है – क्या किरण खेर आयशा की वह ऐतिहासिक भूमिका अब भी निभा सकेंगी? क्या हम फिर मुगले आज़म, गर्म हवा, धर्मपुत्र जैसी फ़िल्में बना सकेंगे?बंटवारे के दौरान हिंसा में दस लाख से ज्यादा लोग मारे गए. करोड़ो बेघर हुए. पागल अत्याचारों की प्रतिक्रिया दोनों तरफ होती रही. यह आज भी जारी है.बंटवारे के घाव ताज़ा थे, तब फिल्मकार उससे बचते रहे. बाद में उस पर फ़िल्में बनीं. उनमें वह अकल्पनीय हिंसा दिखाई देती है. आज के लोगों तक ये फ़िल्में एक ऐसे युग से

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Live पेंटिंग नहीं हो सकी लाइव

लाइव पेंटिंग पर नही गया किसी का ध्यान कैसे होगा कला का संरक्षण! आरा,19 अगस्त। कला की कोई भी विधा अपने आप मे किसी को आकर्षित करने के लिए काफी होता है लेकिन पेंटिंग की भाषा कुछ ऐसी होती है जो लोगों को घन्टों अपने आप मे बांधे रखता है। पेंटिंग की रंगों और उनकी लकीरों में कई कल्पना के गोते दर्शक घन्टों लगाए उसमें अपनी उस कल्पना की दुनिया को खोजते और जीते रहते हैं। भोजपुर की धरती पर आजादी के 75वें साल के उपलक्ष्य में जिला प्रशासन की ओर से कला को सम्मान देते हुए लाइव पेंटिंग के लिए कुछ चित्रकारों को आमंत्रित किया गया। चित्रकारों ने लाइव पेंटिंग को रमना मैदान के ऐतिहासिक मैदान में जीवंत बनाया भी एयर भी खासे बड़े आकार में बड़े मनमोहक अंदाज में पर अफसोस कि खबरों पर अपनी पैनी नजर बनाने वाली मीडिया जो ब्रेकिंग के लिए किसी हद तक पार कर जाने की होड़ में आगे रहना चाहती है उसे क्राइम और राजनीतिक खबरें तो बड़े आसानी से दिख जाती है लेकिन इस लाइव पेंटिंग को किसी ने देखने के बाद भी अपनी खबरों में शामिल नही किया । 15 अगस्त के कार्यक्रम के 4 दिन बीत जाने के बाद भी किसी मीडिया में यह कला की खबर नही आयी। पटना नाउ ने हमेशा से कला पर अपनी पैनी नजर रखा है और इस बार भी इसे जनता के समक्ष लाया है। कलाकारो की मेहनत के बाद भी गुमनामी में गुम कलाकारों को खोज लाए हैं आपके समक्ष….एक रिपोर्ट। भोजपुर

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एक फ़िल्म निर्देशक की पुकार

अफ़ग़ानिस्तान की फ़िल्म निर्देशक सहरा करीमी का ख़तदुनिया के नाम मेरा नाम सहरा करीमी है और मैं एक फ़िल्म निर्देशक हूं। साथ ही अफ़ग़ान फिल्म की वर्तमान महानिदेशक हूं, जो 1968 में स्थापित एकमात्र सरकारी स्वामित्व वाली फ़िल्म कंपनी है।मैं इसे टूटे दिल के साथ लिख रही हूं और इस गहरी उम्मीद के साथ कि आप मेरे ख़ूबसूरत लोगों को, ख़ासकर फ़िल्ममेकर्स को तालिबान से बचाने में शामिल होंगे। तालिबान ने पिछले कुछ हफ़्तों में कई प्रांतों पर कब्ज़ा कर लिया है। उन्होंने हमारे लोगों का नरसंहार किया। कई बच्चों का अपहरण किया। कई लड़कियों को चाइल्ड ब्राइड के रूप में अपने आदमियों को बेच दिया। उन्होंने एक महिला की हत्या उसकी पोशाक के लिए की। उन्होंने हमारे पसंदीदा हास्य कलाकारों में से एक को प्रताड़ित किया और मार डाला। उन्होंने एक ऐतिहासिक कवि को मार डाला। उन्होंने सरकार के कल्चर और मीडिया हेड को मार डाला। उन्होंने सरकार से जुड़े लोगों को मार डाला। उन्होंने कुछ आदमियों को सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया। उन्होंने लाखों परिवारों को विस्थापित कर दिया।इन प्रांतों से भागने के बाद, परिवार काबुल में शिविरों में हैं, जहां वे बदहाली की स्थिति में हैं। वहां इन शिविरों में लूटपाट हो रही है। दूध के अभाव में बच्चों की मौत हो रही है। यह एक मानवीय संकट है। फिर भी दुनिया ख़ामोश है।हमें इस चुप्पी की आदत है, लेकिन हम जानते हैं कि यह उचित नहीं है। हम जानते हैं कि हमारे लोगों को छोड़ने का यह फ़ैसला ग़लत है। 20 साल में हमने

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