मानवीय मूल्य और कला की समृद्धि के लिए मिल कर प्रयास हो

बिहार के लिए गौरव और सम्मान का एहसास करा गया बिनाले 

छात्रों की प्रस्तुति से बोधगया बिनाले का समापन




बोधगया बिनाले के दूसरे संस्करण की घोषणा

कई सवाल भी छोड़ गया बोध गया बिनाले 

स्थानीयता के अस्तित्व पर खतरा

परंपरागत कला के साथ-साथ आधुनिक कला का प्रयोग 

बिनाले में पेंटिंग,मूर्तिशिल्प, परफॉर्मंस और वीडियो के नए प्रयोग दिखे

बोधगया बिनाले में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों का शामिल होना साथ ही अपनी कलाकृतियों के जरिए अपने कल्पना लोक और धरातल की बातें प्रस्तुत करना अपने आप में एक बड़ी बात होती है .कलाकारों ने अपनी कला से लोगों को मंत्रमुग्ध किया वहीँ कई सवाल भी छोड़ गए .बोध गया के सुजाता विहार में चल रहे बोधगया बिनाले का अंतर्राष्ट्रीय कला उत्सव बोधगया बिनाले का विधिवत समापन शुक्रवार को मधुबनी के लोकगायक बिसुनदेव पासवान के लोकगायन से हुआ. बिसुनदेव पासवान ने गरीब-गुरबों के नायक राजा सलहेस के वीर गाथाओं की गीतीमय प्रस्तुति से बिनाले एरिया में उपस्थित समस्त कलाप्रेमियों का दिल जीत लिया.

 

बोधगया बिनाले के अंतर्राष्ट्रीय कला उत्सव के समापन के अवसर बिनाले के आर्टिस्टिक डायरेक्टर और क्यूरेटर विनय कुमार ने अगले बोधगया बिनाले की भी घोषणा की. विनय कुमार ने कहा कि बोधगया में हर दो साल पर बोधगया बिनाले का आयोजन किया जाएगा. उन्होंने अगले बिनाले की तारीखों की भी घोषणा की.

बोधगया बिनाले के दूसरा संस्करण 1 दिसंबर से 31 दिसंबर, 2018 तक चलेगा, जिसमें न सिर्फ राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय कलाकारों की कलाकृतियां प्रदर्शित की जाएंगी बल्कि, प्रथम संस्करण की तरह ही टॉक शो, स्थानीय समुदाय और छात्रों की भी भागीदारी रहेगी. इस बारे में विस्तृत जानकारी जल्दी ही बिनाले समिति की तरफ से दी जाएगी, जिसमें बिनाले के क्यूरेटर की भी घोषणा की जाएगी.रोज की तरह ही बोधगया बिनाले का अखिरी दिन युवा कलाकारों और स्कूलों के नाम रहा है. शुक्रवार को सिद्धार्थ ट्रस्ट स्कूल, सूर्य भारती स्कूल और सरस्वती शिशु निकेतन के छात्र-छात्रों ने अपने नृत्य संगीत से सबका मन मोह लिया.

 

बोधगया बिनाले पर विचार  

 विनय कुमार, आर्टिस्टिक डायरेक्टर एवं क्यूरेटर, बोधगया बिनाले –बोधगया बिनाले के जरिए देश में एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप करने की कोशिश की गयी है. वैसी परिस्थितियों में जबकि पूरी देश-दुनिया में भूमंडलीकरण का दौर है और स्थानीयता के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है, आम आदमी की अस्मिता खतरे में है, बोधगया बिनाले के जरिए हम जीवन मूल्यों की तलाश करने की कोशिश करेंगे. इस तलाश का मुख्य उपकरण कला होगी, पर दूसरे उपकरणों को भी बोधगया बिनाले का हिस्सा बनाया जा सकता है. इस तरह से बोधगया बिनाले जीवन और कला के रिश्तों की तलाश का एक जरिया होगा और यही बोधगया बिनाले का अपना मॉडल भी होगा.

राहुल देव, सह-क्यूरेटर, बोधगया बिनाले – बोधगया बिनाले का आयोजन पूरी तरह से सफल रहा है. हम चाहते थे कि परंपरागत कला के साथ-साथ आधुनिक कला भी आमलोगों तक पहुंचे और मुझे लगता है कि जिस तरह से इस बिनाले से स्थानीय लोगों और बोधगया के स्कूलों की भागीदारी हुई, उन्होंने कलाकृतियों को करीब से देखा, उसके बारे में जानकारी जुटाई, वह महत्वपूर्ण है और यही हमारी उपलब्धि है. बिहार सांस्कृतिक रूप से कितना समृद्ध है, इसका पता यहां आनेवाले लोगों की संख्या और उनकी उत्सुकताओं को देखकर चलता है.

रशीद अमीन, एसोसिएट प्रोफेसर, ललित कला विभाग, जगन्नाथ विश्वविद्यालय, ढाका, बांग्लादेश – बिनाले एक अंतर्राष्ट्रीय विचार है जो आमतौर पर कलाकारों, कला मर्मज्ञों, कला संग्रहकर्ताओं और कला-संरक्षकों के बीच घूमती है, इसमें आमलोगों की भागीदारी बहुत कम ही देखने को मिलती है. बोधगया बिनाले ने इस अवधारणा को तोड़ा है. यह बिनाले इस मायने में भी अलग है कि पहली बार कला आमलोगों काफी तक पहुंचती दिखी और इसका प्रमाण है बड़ी संख्या में स्कूल के छात्र-छात्राओं और स्थानीय लोगों की इसमें भागीदारी. यह सुखद आश्चर्य है क्योंकि बोधगया जैसे धार्मिक स्थल पर इस तरह की प्रदर्शनी को लेकर लोगों में काफी उत्सुकता देखने को मिली.

मिथिलेश मिश्र, एमडी, बिहार स्टेट बेवरेज कॉरपरेशन लिमिटेड –बोधगया बिनाले बोधगया जैसे ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक शहर में आयोजित होना बिहार की कला संस्कृति के साथ ही पर्यटन के विकास एवं अंतर्राष्ट्रीय पहचान के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है. आयोजन की निरंतरता के साथ ही आयोजन से प्राप्त अनुभव एवं संवाद लोगों तक पहुंचना चाहिए.

सुमन सिंह, वरिष्ठ कलाकार, दिल्ली –बिहार की कला परिस्थितियों में बिनाले का होना एक सुखद आश्चर्य है, क्योंकि इसकी संकल्पना तक नहीं की जा सकती थी. फिर भी यह बिनाले सफलतापूर्वक संपन्न हुआ. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहली बार बिहार में कला संरक्षक भी सामने आये, और यह बिहार के युवा कलाकारों के बेहतर भविष्य के लिए एक सुखद संकेत है.

 संजीव कुमार, प्रो वीसी, दिल्ली पब्लिक स्कूल, गया  – बोधगया बिनाले बिहार के कला जगत में मील का पत्थर साबित होगी क्योंकि यह पहली बार है जब राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों के कलाकृतियों की इतनी बड़ी प्रदर्शनी देखने को मिली है. निश्चित तौर पर भविष्य में इस बिनाले का विस्तार होगा, जो न केवल कला जगत के लिए हितकर होगा बल्कि कला शिक्षा के लिहाज से भी यह महत्वपूर्ण है.

रवींद्र त्रिपाठी, कला समीक्षक -बोधगया बिनाले कई तरह के समकालीन कला प्रयोगों को समेटनेवाला और उनको सामने लानेवाला रहा है. इसमें पेंटिग के अलावा मूर्तिशिल्प, परफॉर्मंस और वीडियो के नए प्रयोग दिखे. इसकी एक बड़ी खूबी समकालीन भारतीय कला की मह्त्त्वपूर्ण  सर्जनात्मकता को बीच बहस में लाना है. जिन लोगों ने इस बिनाले में अलग अलग कलाकृतियों को देखा उनके मन में इसका याद हमेशा रहेगा और मुझे पूरा विश्वास है कि ये बिनाले आनेवाले बरसों में बिहार और भारत के कई समकालीन कलाकारों को अवसर देगा.

 

वेब डेस्क