श्रेष्ठ बना बिहार : 8 बिहारियों को सर्वोच्च सम्मान


7 बिहारियों को पद्मश्री और एक को पद्म-विभूषण समेत देश मे कुल 141 शख्सियतों को सम्मान

सर्वोच्च पुरस्कारों ने मनवाया बिहार की प्रतिभा का लोहा
बिहार के मेहनत का परिचायक है 8 बिहारियों को मिला सर्वोच्च सम्मान




पटना/आरा,27 जनवरी. देश के प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कारों की घोषणा 71वें गणतंत्र दिवस पर कर दी गई है. इस बार कुल 141 हस्तियों को इसके लिए चुना गया है,जिसमें 7 पद्म- विभूषण, 16 पद्म-भूषण और देश-विदेश की 118 हस्तियों को पद्मश्री से नवाजा गया है. पद्म पुरस्कारों में इस बार सबसे ज्यादा चुने हुए व्यक्ति बिहार के हैं. राज्य की कुल 8 हस्तियों को पद्म-सम्मान के लिए चुना गया है. इनमें देश के पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज (मरणोपरांत), साइंटिस्ट वशिष्ठ नारायण सिंह (मरणोपरांत), शांति जैन (आर्ट), शांति राय (मेडिसिन) जैसे कई नामचीन लोग शामिल हैं. जार्ज फर्नांडीज, सुषमा स्वराज और अरूण जेटली को मरणोपरांत पद्मविभूषण और वशिष्ठ नारायण सिंह को मरणोपरांत पद्मश्री मिलने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी खुशी जाहिर की है. उन्होंने सभी विजेताओं को बधाई और शुभकामनाएं दीं. मुख्यमंत्री ने बिहार के सुजोय कुमार गुहा, विमल कुमार जैन, डॉ शांति राय, शांति जैन, श्याम सुंदर शर्मा एवं रामजी सिंह को पद्मश्री मिलने पर खुशी जताई.

सर्वोच्च सम्मान क्यों?
भारत सरकार ने पद्म पुरस्‍कारो की शुरुआत 1954 से की. तब से इन पुरस्कारों की घोषणा हर साल गणतंत्र दिवस के मौके पर की जाती है. इसके तहत पद्म-विभूषण, पद्म- भूषण और पद्मश्री पुरस्कारों को विभिन्न क्षेत्रों में सर्वोच्च काम करने के लिए दिया जाता है. यही कारण है कि इसे देश का सर्वोच्‍च नागरिक पुरस्‍कार माना जाता है. ये पुरस्‍कार कला,साहित्‍य, शिक्षा,खेल, चिकित्‍सा और सामाजिक कार्य जैसे सभी क्षेत्रों में विशिष्‍ट और असाधारण उपलब्धियां हासिल करने और सेवाएं देने के लिए दिया जाता है. डॉक्‍टरों और वैज्ञानिकों को छोड़कर सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले सरकारी कर्मचारी पद्म पुरस्‍कारों के पात्र नहीं होते हैं.

मरणोपरांत भी मिले पद्म-विभूषण
पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को मरणोपरांत पद्म- विभूषण से सम्मानित किया गया है. इसके अलावा पीवी सिंधु, बॉलीवुड की कंगना रनौत, करण जौहर, एकता कपूर को पद्म श्री दिया गया है. 1984 के भोपाल गैस त्रासदी पीड़ितों के हक की लड़ाई लड़ने वाले कार्यकर्ता अब्दुल जब्बार को मरणोपरांत पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. 14 नवंबर 2019 को उनका निधन हो गया था. लंगर बाबा के नाम से मशहूर जगदीश लाल आहूजा को भी इस सर्वोच्च पुस्कार से नवाजा गया है. वे रोजाना चंडीगढ़ में गरीब मरीजों के परिजनों को मुफ्त में भोजन कराते हैं.

पद्म-विभूषण पाने वाले ये हैं 7 विभूषण
जॉर्ज फर्नांडिस (मरणोपरांत), अरुण जेटली (मरणोपरांत), सर अनिरुद्ध जुगनाथ, एमसी मैरी कॉम, छन्नूलाल मिश्रा, सुषमा स्वराज (मरणोपरांत), पेजावरा मठ के महंत श्री विश्वेशातीर्थ (मरणोपरांत).

ये हैं पद्म-भूषण पाने वाली 16 हस्तियां
अजय चक्रवर्ती, मनोज दास, बालकृष्ण दोषी, कृष्णाम्मल जगन्नाथन, एससी जमिर, मुमताज अली, सैयद मुआजेम अली (मरणोपरांत), मुजफ्फर हुसैन बेग, अनिल प्रकाश दोषी, सेरिंग नंडोल, आनंद महिंद्रा, नीलकंठ रामकृष्ण माधव मेनन (मरणोपरांत), मनोहर पर्रिकर (मरणोपरांत), प्रो जगदीश सेठ, पीवी सिंधु, वेणु श्रीनिवासन को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है.

8 बिहारियों को मिला देश का सर्वोच्च सम्मान
जार्ज फर्नाडिंस- लोकसेवा पद्म विभूषण
डॉ शांति राय- मेडिसिन (पद्म श्री)
शांति जैन- आर्ट (पद्म श्री)
वशिष्ठ नारायण सिंह- साइंस एंड इंजीनियरिंग (पद्म श्री)
सुजोय कुमार गुहा- साइंस एंड इंजीनियरिंग (पद्म श्री)
विमल कुमार जैन- सोशल वर्कर(पद्म श्री)
श्याम सुंदर शर्मा- आर्ट- (पद्म श्री)
राम जी सिंह- सोशल वर्कर(पद्म श्री)

भोजपुरिया माटी ने साबित किया अपनी उर्वरता

भोजपुर की माटी ने हमेशा अपनी उर्वरता का परिचय दिया है. चाहे वह परिचय कर्मठता का हो,वीरता का हो,बलिदान का हो, या फिर कठिन मेहनत और अपने काम के जुनून का. वीर कुंवर सिंह जैसे योद्धा और बाबू जगजीवन राम जैसे दिग्गज राजनीतिक हस्ती की धरती पर एक बार फिर गौरवान्वित हुई है. इस धरती पर जन्म लेने वाले दो विभूतियों ने देश के सर्वोच्च सम्मानों से एक पद्मश्री पुरस्कार पाकर एक बार फिर धरती का मान बढ़ाया है. दुनिया मे गणित के आर्यभट्ट के नाम से प्रसिद्ध गणितज्ञ स्व. वशिष्ठ नाराय़ण सिंह और साहित्यकार डॉ शांति जैन ने पद्मश्री पाकर भोजपुरिया माटी की खुश्बू को चहु ओर फैलाया है. बस भोजपुरवासियों को अफसोस इस बात का है कि काश यह पुरस्कार स्व. वशिष्ट बाबू को जीते जी मिला जाता तो यह खुशी जिले को दुगुनी होती. सवा दो महीने पूर्व दिवंगत हुए महान गणितज्ञ के नाम पुरस्कार की घोषणा सबको चुभ रही है. गणित के आर्यभट्ट स्व. डॉ वशिष्ठ ने हमेशा आभावों में जीवन निर्वहन किया. वे गणित की दुनिया के भले ही आर्यभट्ट कहे जाते थे लेकिन असल जीवन वे आभावों के आर्यभट्ट थे.

भोजपुर की दो शख्सियतों को पद्मश्री मिलने की खबर ने हर भोजपुरिया शख्स का सीना 56 इंच का कर दिया है. आईये जानते हैं क्या है खास बात है इन शख्सियतो की.

महान वैज्ञानिक गणितज्ञ स्व. डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह

देश-विदेश में कभी अपनी प्रतिभा का डंका बजाने वाले गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह आरा के बसन्तपुर के रहनेवाले थे. बचपन से ही वे मेधावी छात्र थे. कहा जाता है कि कॉलेज के दिनों में एक महीने में ही वे सारे किताब को जैसे रट जाते थे और उसके बाद क्लास में कई दफा सोते हुए प्रोफेसरों ने जब उनसे सवाल करना शुरू किया तो वे दंग रह गए. क्लास में सोने वाला यह छात्र कॉलेज का सबसे अव्वल छात्र निकला और एक गणित को कई तरह से हल करके सबको चौका दिया. तब जैन कॉलेज से इनका नामांकन पटना के साईंस कॉलेज में हुआ मगर वह भी कुछ महीनों के बाद यही स्थिति. जब वहाँ भी प्रोफेसरों की एक टीम ने सवालो की बौछार डॉ वशिष्ठ से की तो उतर में मिले एक गणित के 19 तरीके का हल और यहीं से देश भर में हलचल मच गई कि एक जीनियस बिहार के कैम्ब्रिज(सायन्स कॉलेज) का छात्र है. इस खबर को पा अमेरिका से पटना आए प्रोफेसर कैली से उनकी मुलाकात हुई और उनके निमंत्रण पर 1963 में वे कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में शोध के लिए गए. वशिष्ठ नारायण ने ‘साइकिल वेक्टर स्पेस थ्योरी’ पर शोध किया. 1969 में उन्होंने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से PHD की और वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर बन गए. उन्होंने नासा में भी काम किया, लेकिन वे 1971 में भारत लौट आए. भारत वापस आने के बाद उन्होंने आईआईटी कानपुर, आईआईटी बंबई और आईएसआई कोलकाता में काम किया. डॉ वशिष्ठ ही वे शख्स थे जिन्होंने आंइस्टाईन के सापेक्ष सिद्धांत को चुनौती दी थी. कहा जाता है कि जब नासा में अपोलो की लॉन्चिंग से पहले 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर्स का कैलकुलेशन एक था. अपने पिता के आदेश पर स्वदेस लौटे और उनकी शादी हुई लेकिन कुछ व्यक्तिगत परेशानियों ने उन्हें रोगी बना दिया. वे मानसिक विमारी से ग्रसित हो गए. कुछ सालों तक गायब रहे. जब मिले तो पागल की अवस्था में. इलाज भी चला और लगा कि ठीक होंगे लेकिन सरकार की निष्क्रियता के कारण बड़े भाई अस्पताल से वापस लाये और आर्थिक आभाव के कारण गाँव पर ही रहने लगे. 40 साल से मानसिक बीमारी सिजोफ्रेनिया से पीड़ित वशिष्ठ नारायण सिंह पिछले काफी समय से बीमार थे. आर्थिक तंगी से जुझते गणित के आर्यभट्ट डॉ वशिष्ठ पिछले साल 14 नवंबर को पटना के PMCH में इलाज के दौरान आभावों के आर्यभट्ट बन इस दुनिया से चल बसे.

डॉ शांति जैन


आरा की दूसरी शख्सियत 75 वर्षीय डॉ शांति जैन, जो उम्र के इस पड़ाव में भी साहित्य-सृजन में मशगूल हैं. उनका मानना है कि हर मनुष्य को आत्मिक शांति के लिए खुद कुछ लिखना चहिए. वर्तमान में पटना में रह रही डॉ शांति जैन को पद्मश्री कला के क्षेत्र में असाधरण कार्यों के लिए दिया गया है. बहुमुखी प्रतिभा की धनी डॉ शन्ति जैन को सरस्वती-पुत्री कहें तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी.

आरा में जन्मी डॉ शांति जैन ने शिक्षा दीक्षा आरा में ही पूरी की और आरा के ही जैन कॉलेज में संस्कृत के  विभागाध्यक्ष पद पर विराजमान हो उसकी शोभा बढ़ाई. वे एक प्रोफेसर ही नही आकाशवाणी, दूरदर्शन की कलाकार और कवयित्री भी हैं. उनका नाम संस्कृत भाषा के बड़े विद्धानों में शुमार है. 20 से ज्यादा किताबें लिखी चुकी शांति जैन का कहती हैं कि समय पर सम्मान पाने से इंसान का उत्साह दूगुना हो जाता है और वह ज्यादा बेहतरी की ओर कदम रखता है. उन्होनें कहा कि देर से ही सहीं लेकिन आज वे पुरस्कार पाकर गौरवान्वित हैं.

डॉ शांति जैन की रचनाओं की लंबी कतार है. एक वृत्त के चारों ओर, हथेली का आदमी, हथेली पर एक सितारा (काव्य); पिया की हवेली, छलकती आँखें, धूप में पानी की लकीरें, साँझ घिरे लागल, तरन्नुम, समय के स्वर, अँजुरी भर सपना (गजल, गीत-संग्रह); अश्मा, चंदनबाला (प्रबंधकाव्य); चैती (पुरस्कृत), कजरी, ऋतुगीत : स्वर और स्वरूप, व्रत और त्योहार : पौराणिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, उगो हे सूर्य, लोकगीतों के संदर्भ और आयाम (पुरस्कृत), बिहार के भक्तिपरक लोकगीत, व्रत-त्योहार कोश, तुतली बोली के गीत (लोकसाहित्य); वसंत सेना, वासवदत्ता, कादंबरी, वेणीसंहार की शास्त्रीय समीक्षा (क्लासिक्स); एक कोमल क्रांतिवीर के अंतिम दो वर्ष (डायरी). सभी तरह की विधाओं में उन्होनें अपनी पारंगतता दिखायी है.

पहले भी मिल चुके हैं कई सम्मान
वहीं डॉ शांति जैन को मिले पुरस्कार-सम्मान की लिस्ट भी काफी लंबी है. इन्हें संगीत नाटक अकादमी सम्मान, राष्ट्रीय देवी अहिल्या सम्मान, के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा शंकर सम्मान, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा नेशनल सीनियर फेलोशिप, ऑल इंडिया रेडियो का राष्ट्रीय सम्मान, ‘चैती’ पुस्तक के लिए बिहार सरकार का राजभाषा सम्मान और  कलाकार सम्मान मिल चुका है.

एक जिले से 2 शख्सों को पद्मश्री से नवाजा जाना न सिर्फ उनका बल्कि जिले की मिट्टी का सम्मान है. यह सम्मान सिद्ध करता है कि यह मिट्टी कर्म की, मेहनत की और स्वाभिमान की भूमि है. भोजपुरी और बिहारी जैसे शब्दों पर मुँह बिजकाने वालों को समझना होगा कि इन शब्दों को सुन दरिद्रता,अपमान या लाचारगी को न दिमाग में गढ़े क्योंकि ये शब्द अभिमान और मेहनतकशो की पहचान है.

पटना नाउ के लिए ओ पी पांडेय और अपूर्वा की विशेष रिपोर्ट