पढ़ते समय कहानियों के पात्र मेरे आगे खड़े हो जाते थे- रेणु

एक अभिनेत्री की कहानी

रेणु सिन्हा की कलम से ..




पढ़ते समय कहानियों के पात्र मेरे आगे खड़े हो जाते थे, उनकी दुनिया मेरे आसपास बस जाती थी शायद उसी समय अभिनय और थियेटर के प्रति मेरे रुझान के बीज पड़ गए..

रेणु सिन्हा नाटक .राइडर्स टू द सीमें

यह कहते हुए मुझे अजीब तो लगता है लेकिन यह सच है कि बचपन में अक्षर – ज्ञान मिलते ही मैं हिंदी साहित्य का अध्ययन करने लगी थीं साथ ही कविताएँ, कहानियाँ लिखने की भी कोशिश करती थी । दस वर्ष की अवस्था तक पहुँचते – पहुँचते मैंने भी अमृत लाल नागर, भगवती चरण वर्मा, धर्मवीर भारती, श्रीलाल शुक्ल और आचार्य चतुर सेन जैसे तकरीबन सभी नामचीन साहित्यकारों की पुस्तकों का अध्ययन कर लिया और बाद में अंग्रेजी साहित्यकारों को भी पढ़ा। अभी के उपन्यासकारों में अंग्रेजी के अभिताव घोष मुझे बेहद पसंद हैं । पढ़ते समय कहानियों के पात्र मेरे आगे खड़े हो जाते थे, उनकी दुनिया मेरे आसपास बस जाती थी । शायद उसी समय अभिनय और थियेटर के प्रति मेरे रुझान के बीज पड़ गए, लेकिन उन सपनों को मूर्त रूप देने में परिस्थितियों की सहयोग नहीं मिल सका । अन्य महिलाओं की तरह मैंने भी घर-परिवार की जिम्मेदारियों में ही अपने वजूद को कहीं खो सा दिया था। लेकिन कहते “Its better late than never”.

अभिनेत्री रेणु सिन्हा

यूँ कहें कि “देर आए, दुरुस्त आएँ” तो 2017 में मेरी कविताओं का संग्रह पुस्तक रूप में “स्वयंत” नाम से प्रकाशित हुआ । इसने मुझे खुशी तो दी लेकिन पूरा संतोष नहीं मिला | जब भी नाटक था थियेटर का जिक्र होता तो लगता कि थियेटर मुझे बुला रहा है। इसीलिए एक दिन मैंने कालिदास रंगालय में एक दिन फोन किया और कहा कि मैं नाटकों से जुड़ना चाहती हूँ । तब प्रदीप गांगुली जी ने मुझे बिहार आर्ट थियेटर में कराए जाने वाले अभिनय के सर्टीफिकेट कोर्स के बारे में बताया। इसके बाद मैंने 2018 में वहाँ मेरा नामांकन हुआ । यहाँ मुझे अरुण कुमार सिन्हा, गुप्तेश्वर कुमार जैसे गुरु मिले जिनसे अभिनय की बारीकियों को सीखने का मौका मिला। मेरे साथ पढ़ने वाले कलाकारों ने भी मुझे अपने और उनके बीच के उम्र के अंतराल का एहसास नहीं होने दिया । इस कोर्स को मैंने प्रथम स्थान प्राप्त कर पूरा किया ।

राइडर्स टू द सी’ नाटक में रेणु सिन्हा

मैंने 2018 में “मैकबेथ” नाटक से अपने थियेटर यात्रा की शुरुआत की. एक विद्यार्थी की हैसियत से 2019 में ” पंच परमेश्वर” का नाट्य – रूपांतरण किया जिसका मंचन कालिदास रंगालय में ही किया गया। इसके बाद मैंने संस्कार, बिन बेटी सब सून, ज़िद, रोमियो जूलियट खून का रिश्ता, जान है तो, बिहाइंड द कैमरा, राइडर्स टू द सी जैसे नाटकों में अभिनय किया। साथ हीं मैं डिजिटल मीडिया में भी सक्रिय रही । कुछ सरकारी विज्ञापन फिल्मों, शॉर्ट फिल्मों और एक वेब सीरिज (अंडर प्रोडक्शन) में भी मुझे काम करने का मौका मिला। ये सच है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती । हर दिन् हमें कुछ-न-कुछ सीखने का मौका मिलता है और मेरी कोशिश रहती हैं कि मैं उस मौके को न गवाऊं ।

जब मैंने अपने पहले नाटक “मैकबेथ ” में काम किया था तो मेरे किरदार “लेडी मैकडफ” की हत्या कर दी जाती है । उस समय मेरी बड़ी बहन दर्शक दीर्घा में बैठी थीं। वह अपने आँसू नहीं रोक सकीं और रोने लगीं | यह वाकया मेरे लिए किसी एवॉर्ड से कम नहीं है । क्योंकि एक अभिनेता के रूप में हमें दर्शकों से ही तो जुड़ना होता है, उनके दिल को छूना होता है।