‘मास्ससाहब’ में भागती-दौड़ती जिंदगी के संवेदनशील दृश्य व समस्याओं का चित्रण

हर एक घटना एक कहानी का प्लॉट
रणजीत बहादुर माथुर के कहानी संग्रह ‘मास्ससाहब’ का हुआ लोकार्पण

नियोजित शिक्षकों की समस्या को लेखक ने बड़ी ही वेदना के साथ उकेरा




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पुस्तक मास्ससाहब में….

हर व्यक्ति के भागती – दौड़ती जिंदगी में दिखने वाली संवेदनशील दृश्य व समस्याओं को रणजीत बहादुर माथुर ने अपनी रचना मास्ससाहब में उकेरने की कोशिश की है. इनकी रचनाओं में हिंदी – उर्दू का स्वाद मिलता रहेगा. भाषा काफी सरल और सहज है जिससे सभी पाठक लेखक की रचना के साथ एक अच्छा सफर तय कर सकते है. मास्ससाहब इसलिए भी एक सार्थक रचना है क्योंकि लेखक ने अपनी बात में ये स्पष्ट कर दिया कि ये उनकी आप बीती घटनाओं पर आधारित है , सिर्फ लेखनी को संवारने के लिए थोड़ी बहुत कल्पनाओं का सहारा लिया गया है। इस रचना में एक अनुभव है जिसमें लेखक रेलवे प्लेटफॉर्म पर एक भिखारी की वेदनाओं को समझता है और फिर उसका शीर्षक “अब मैं यहीं रहूंगा देता है”.

रेलवे प्लेटफॉर्म पर एक भिखारी जिसका एक पैर कटा हुआ है और वो अपनी जिंदगी रेलवे प्लेटफॉर्म पर ही गुजरता है. भिक्षाटन से वो काफी अच्छा पैसा कमाता है लेकिन माँ की ममता उसे भीख मांगने से किस तरह रोकती है. इस घटना का एक सचित्र चित्रण लेखक ने किया है. इसी तरह लेखक अपनी इस रचना में अगला शीर्षक ” कहानी का प्लॉट ” देता है जिसमें लेखक ने समाज में होने वाली हर एक घटनाओं पर एक कहानी कैसे लिखी जा सकती है . इस बात को समझाने की पूरी कोशिश की है. हर एक घटना एक कहानी का प्लॉट है. इसी तरह और भी अन्य कहानियां इसमें सम्मिलित है. इस पुस्तक में नियोजित शिक्षकों की व्यथा को उकेरने की पूरी कोशिश की गई है. एक शिक्षक कई – कई महीनों तक बिना वेतन के किस प्रकार अपनी जिंदगी गुजारा करता है. साथ ही साथ बिना वेतन के कई प्रकार के उत्तरदायित्वों का निष्पादन कैसे करना पड़ता है लेखक ने इस बात को बड़ी ही सहजता से बताया है , क्योकि लेखक स्वयं एक सेवानृवित शिक्षक है. लेखक की संवेदना शिक्षकों के प्रति काफी झलकती है, जिससे अपनी इस पुस्तक का नाम मास्ससाहब दिया होगा. इस रचना में नियोजित शिक्षकों की समस्या को लेखक ने बड़ी ही वेदना के साथ उकेरा है.

आरा के नागरी प्रचारिणी सभागार के प्रांगण में भू भूमिका के बैनर तले वरिष्ठ साहित्यकार एवं सेवानिवृत्त शिक्षक रणजीत बहादुर माथुर का कहानी संग्रह ‘मास्ससाहब’ का लोकार्पण हुआ . मौके पर आलोचक रामनिहाल गुंजन, कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार, कवि जनार्दन मिश्र, कथाकार सिद्धनाथ सागर, कवि सुमन कुमार सिंह ने रणजीत बहादुर माथुर के कहानी संग्रह मास्ससाहब  का लोकार्पण किया. मंच पर कहानी संग्रह के लेखक भी मौजूद थे. परिचर्चा, लोकार्पण और सम्मान सत्र का संचालन सुधीर सुमन ने किया.इससे पहले भी रणजीत बहादुर माथुर की  कई  रचनाएं  प्रकाशित हो चुकी है जिसमें  मुख्य है असमंजस, यथार्थ, दावत अभी बाकी है, लोगवा का कही (भोजपुरी कहानी संग्रह) इत्यादि.

लेखक के बारे में जाने

रणजीत बहादुर माथुर का जन्म, आरा में एक कायस्थ परिवार के घर 27अप्रैल 1940 काे हुआ . इनसे पिता स्वर्गीय श्याम बहादुर माथुर डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के हेडक्लर्क पद से सेवा निवृत्त थे . इस मध्यमवर्गीय परिवार में साधारण खाने -पीने, पहनने – ओढ़ने , लिखने -पढ़ने की माेहताजी ताे नहीं थी पर शायद इतना भी कभी ना हो पाया कि इतने में संतुष्ट हुआ जा सके . इसी आर्थिक स्थिति के बीच माथुर जी का बचपन गुज़रा है।

वरिष्ठ साहित्यकार एवं सेवानिवृत्त शिक्षक रंजीत बहादुर माथुर का कहानी संग्रह ‘मास्ससाहब’ का लोकार्पण

इनकी शिक्षा -दीक्षा घर से ही शुरू हुई क्योंकि इनके पड़ोसी जाे इनके परिवार के अभिन्न अंग थे वाे गोस्वामी तुलसीदास और  भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की वृहद जीवनियों के सर्वप्रथम स्वनामधन्य बाबू शिवनंदन सहाय के एकमात्र पुत्र ब्रजनंदन सहाय ‘ब्रजवल्लभ’ जी थे जिन्हें माथुर जी बाबू जी कह कर पुकारते थे. सिर्फ पुकारते ही नहीं बल्कि बाबू जी का मतलब सहाय जी काे ही समझते थे और अपने पिता को चाचा जी कह कर संबोधित करते . घर पर आने वाला मेहमान यदि इनसे अपने बाबू जी बारे में भी पूछता ताे ये सहाय जी के पास दाैड़े -दाैड़े पहुंच जाते . जब सहाय जी बाेलते कि चाचा के पास लेकर जाओ तब ये उस व्यक्ति काे अपने पिताजी के पास ले कर आते . ब्रजवल्लभ जी देर शाम तक इन्हें बैठाकर अपना लिखा हुआ इन्हीं  से साफ कागज़ पर उतरवाते . उस समय ताे माथुर को ये काम सजा लगती थी परन्तु ये अब मानते है कि वाे सजा नहीं बल्कि साहित्य साधक बनने का वाे पहला अध्याय था . सहाय जी के घर पंडित बालमुकुन्द गुप्त, कविवर हरिऔध , मैथिलीशरण गुप्त, राजा राधिकारमण, बनारसी प्रसाद भोजपुरी,आचार्य शिवपूजन सहाय जैसे महान साहित्यकारों का आना -जाना लगा रहता था , इन्हीं लाेगाें से कहानी, कविता, निबंध लिखने का प्रोत्साहन मिलता रहता  था . साहित्य के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए ‘बनारसी प्रसाद भोजपुरी’ इनकी कविता काे प्रोत्साहित करते और साथ ही साथ अपनी साप्ताहिक पत्रिका नागरिक में इनकी कविताओं  को जगह देते जिससे उनका रुझान साहित्य के प्रति बढ़े . छोटी सी उम्र में साहित्य के प्रति समर्पण देख कर बनारसी प्रसाद भोजपुरी इन्हें कवि नाम से सम्बोधित करते . जब ये आठवीं वर्ग में थे उस समय माथुर जी की कविता “दाढ़ी” खूब लोकप्रिय हुई ,जिसमें इन्होंने  नाटकीय रूप में प्रस्तुत किया था .

साहित्यकार ,पत्रकार और शिक्षक रंजीत बहादुर माथुर

 इनकी अभिरुचि बचपन से ही साहित्य, संगीत, और ड्रामा में थी . इनकी शिक्षा-दीक्षा हर प्रसाद दास जैन स्कूल आरा, महाराजा कॉलेज आरा एवं एस, आई, आर, एल, मैसूर से पूरी हुई .माथुर जी ने अपने विद्यालय, कॉलेज, एवं विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व फुटबॉल एवं हॉकी में किया . अध्यापन, खेलकूद के साथ ही पत्रकारिता में भी अपना परचम लहराया है . पटना से प्रकाशित “इंडियन नेशन” एवं “सर्चलाइट” के लिए फ्री लांसर के रूप में कार्य किया है . साथ ही साथ छ:वर्ष तक आकाशवाणी पटना से भी जुड़े रहे . दूरदर्शन से प्रसारित होने वाला सीरियल “माई” की पटकथा एवं संवाद भी लिखा है . शिक्षा व्यवसाय में 1 फरवरी 1965 से अपना योगदान मल्टी परपस हायर सेकेंडरी स्कूल भभुआ में दिया उसके बाद मॉडल इंस्टीट्यूट आरा में अवकाश प्राप्ति तक शिक्षण कार्य से जुड़े रहे . बच्चों से इतना लगाव है कि जाे बच्चा इनसे मदद मांगने आता ये तन, मन,धन  से पूरी मदद करते कितने ही बच्चे इनके सानिध्य में रहकर अपने लक्ष्य तक पहुंचे हैं . इनका लगाव खेल -कूद से इतना था कि आरा के मथवलिया ग्राम में कई वर्षाे तक  इनके नाम से जिला स्तरीय खेल -कूद प्रतियोगिता का आयोजन होता रहता था . काफी समय से  रंगमंच से भी जुड़े है और ये आज भी आरा का रंगमंच  भू “भूमिका” के अध्यक्ष है . आज भी उनका व्यक्तित्व और कृतित्व दाेनाें ही अनुकरणीय हैं .
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 सम्मान – लायन्स क्लब ऑफ आरा अपूर्व की तरफ से सम्मान पत्र, चित्रांश समिति आरा से सम्मान पत्र, अखिल भारतीय विद्वत परिषद द्वारा “विद्वत सम्मान पत्र” ,भिखारी ठाकुर भोजपुरी शाेध संस्थान की तरफ से सम्मानित .

-सावन कुमार

पुस्तक – मास्ससाहब
प्रकाशक – निखिल पब्लिशर्स ,आगरा।
पुस्तक मूल्य – मात्र 40 रुपये ।

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