रैन भई चहुँ देस: मिथिलेश्वर

मिथिलेश्वर की नई कहानी संग्रह

“रैन भई चहुं देस” मेरा नया कहानी संग्रह है, बारहवां कहानी संग्रह। मेरा पहला कहानी संग्रह “बाबूजी” वर्ष 1976 में प्रकाशित हुआ था और अब उसके 45 वर्षों बाद यह बारहवां संग्रह।इस बीच मेरे अन्य कहानी संग्रह, उपन्यास, आत्मकथाएं, लोककथाएं और बाल कथओं की पुस्तकें प्रकाशित होती रहीं।लेकिन इन सबके मूल में मेरा कथा लेखन ही रहा।इसीलिए इस नए कहानी संग्रह के प्रकाशन पर इसकी कथाभूमि की याद स्वाभाविक है।


इस संग्रह की नामित कहानी”रैन भई चहुं देस” की रचना के दौरान इस तथ्य और सत्य से मैं अवगत हुआ कि विकास की आंधी और भौतिकता की अंधी दौड़ में हमारे नितांत निजी एवं आत्मीय सम्बन्धों की तरलता न सिर्फ सूख गयी है, बल्कि उन पर क्रूरता और हैवानियत इस तरह हावी होती जा रही है कि दहशत पैदा होती है । इस कहानी के मुख्य चरित्र राजदेव राज की कहानी लिखते हुए और लिखने के बाद भी यह सवाल मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा है कि हमारे जिन निजी , पारिवारिक और सामाजिक सम्बन्धों को पूरी दुनिया आदर्श की दृष्टि से देखती थी , हमारे वे सम्बन्ध इस तरह विरूप कैसे होते चले गये ? अपने जीवन की सांध्य वेला में राजदेव राज अपने जिस पुत्र को अपना मजबूत अवलंब मान उसके साथ रहते हुए उसके प्रति – जी जान से समर्पित रहे।अन्य पुत्रों की तुलना में उसके अभाव को अपने स्तर से दूर करने का निर्णय उन्होंने ले लिया।पिता के रूप में उन्होंने अपना यह फर्ज समझा। लेकिन उनके मन की योजनाएं धरी की धरी रह गयीं।इस बीच उनसे धन हासिल करने के लिए उनके उस प्रिय पुत्र ने जो हैरतअंगेज़ कारनामा किया उससे रू-ब रू होते ही राजदेव राज को लगा जैस दुनिया उलट गयी हो।वे सर्वत्र रैन भई चहुं देस का एहसास करते हुए जड़वत् हो गये।यह सब देखने से पहले उनकी मृत्यु क्यों न आ गयी।





इस कहानी के यथार्थ और उसकी रचना ने मेरे मन को भी आहत कर दिया है। हमारा समाज और हमारे सम्बन्ध यह किस दिशा में जा रहे हैं।अगर समय रहते हम इसे नहीं रोक सके तो फिर हमारे सम्बन्धों की मार्यादा और गरिमा कभी वापस नहीं हो सकती ।
इस संग्रह की एक और कहानी है “रोशनी की राह” । स्त्रियों के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं सिर्फ भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में होती रही हैं।ऐसा नहीं कि इसका प्रतिकार नहीं हो रहा है।प्रतिकार हो रहा है।हर संवेदनशील व्यक्ति का मन ऐसी घटनाओं को जान- सुन कर आवेशित, उद्वेलित और आक्रोशित हो उठता है।मेरे रचनाकार मन के ऐसे ही आवेश,उद्वेलन और आक्रोश के तहत “रोशनी की राह” कहानी लिखी गयी।


इस सम्बन्ध में मुझे लगता है कि अब समय की मांग के तहत स्त्रियों को अपने अन्दर ऐसी प्रबल प्रतिरोध की चेतना जाग्रत करनी होगी कि अपने साथ ज्यादती करनेवाले को उन्हें किसी भी स्थिति में नहीं बक्शना।उसे मरने-मारने तक संघर्षरत बने रहना है।महाभारत की यह उक्ति “न दैन्यं,न पलायनम्” को अपनी चेतना में उतार लेना है,तभी वे ऐसी हैवानियत पर विराम लगा सकती हैं।
कभी-कभी ज्यादतियों की पराकाष्ठा पर न चाहते हुए भी सीधे- सज्जन व्यक्ति के अन्दर से भी प्रतिरोध की ऐसी प्रबल चेतना फूट उठती है जो जुल्म ढ़ाने और जोर जबर्दस्ती करने वाले अततायिओं को ठिकाने लगा कर रहती है। “गेटमैन गोवर्द्धन” कहानी की प्रेरणा एक ऐसी ही घटना पर आधारित रही है।।एक रेलवे फाटक के सीधे,सहज और शांत स्वभाव के गेटमैन गोवर्द्धन ने ऐसा ही किया।
गोवर्द्धन यह मान कर चलता था कि जो जैसा करता है,समय और प्रकृति के तहत वैसा ही पाता है।अपने कर्म की परिणति से कोई बच नहीं सकता।देर-सवेर सबको अपने कर्म का फल भुगतना ही पड़ता है।अपने इस विचार के तहत ही रेलवे फाटक के पास अड्डा जमा कर गुण्डई करने वाले गुण्डों से गेटमैन गोवर्द्धन कभी नहीं उलझता था।लेकिन मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है।परिस्थितियां कब किसको किस रूप में प्रस्तुत कर दें,कोई नहीं जानता।गेटमैन गोवर्द्धन के साथ भी ऐसा ही हुआ।फिर उसने वैसा कर डाला जिसके बारे में उसने सपने में भी नहीं सोचा था।इस कहानी की रचना के तहत इस तथ्य से मैं अवगत हुआ कि हमारी तटस्थता की वजह से ही समाज में जुल्म और जोर- जबर्दस्तियां कायम हैं।दूसरों के मामले में हमें नहीं पड़ना, की अपनी धारणा को बदल कर जब अन्याय के खिलाफ हम खड़े होने लगेंगे तभी अपने समाज को अत्याचार- अनाचार से मुक्त कर सकेंगे।
इस संग्रह की कथाभूमि की यादों के तहत “एक बार फिर” कहानी में अपने आत्मीय सम्बन्धों की तिक्त उपेक्षा का दंश झेलते खाटसायी वयोवृद्ध विमलेश जी की पीड़ा, “भीड़ के अभियुक्त” में भीड़ की आक्रामक और निर्मम हिंसा की व्यथा के समाधान की खोज के दौरान इस तथ्य से मैं अवगत हुआ कि नासमझों की ऐसी भीड़ को एक जागरूक भीड़ ही नियंत्रित कर सकती है।”प्लेटफार्म की रात” में शहरी गुणडों से बचता-छिपता गांव से आया वह नया प्रेमी जोड़ा।रेलवे प्लेटफॉर्म की रातों के मुआयने के तहत तेजी से बदलते समय की तिक्तता का एहसास, आदि।


मेरा यह नया संग्रह इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ है,जहां से तीन खणडों में मेरी संपूर्ण कहानियों का प्रकाशन हुआ है। प्रकाशक – श्री अशोक शर्मा, फोन 9811739749 , इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन , दिल्ली।