भारत की संस्कृति और परंपरा देखना है तो सरस मेला जरूर जायें




ग्रामीण शिल्प कला को बढ़ावा देता सरस मेला

बिहार समेत 17 राज्यों से आई ग्रामीण महिला उद्यमी

देशी अंदाज में आयोजित सरस मेला आधुनिक समाज में भी अपनी एक अलग ही अपनी पहचान बना रहा है. ग्रामीण मेला के प्रति लोगों का बढ़ रहा क्रेज इस बात का प्रमाण है कि लोग आधुनिकता से दूर गाँव की ओर लौट रहे हैं . अपने घरों को सवारने के लिए लोग ग्रामीण शिल्प और उत्पाद को ही तरजीह दे रहे हैं.  सरस मेला के आयोजन का उद्देश्य ही है ग्रामीण शिल्प कला को बढ़ावा देना एवं बाज़ार उपलब्ध कराना है. लिहाजा सरस मेला लोगों की कसौटी पर खरा उतर रहा है . बिहार समेत 17 राज्यों से आई ग्रामीण महिला उधमियों द्वारा बनाये गए ग्रामीण शिल्प और उत्पाद को हर उम्र अपने जरुरत के हिसाब से खरीद रहे हैं.

सरस मेला 2 से 11 सितंबर तक ज्ञान भवन, पटना में आयोजित है. सरस मेला में बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, हरियाणा, गुजरात, आन्ध्र प्रदेश, आसाम, मध्य प्रदेश, महारष्ट्र, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान,सिक्किम एवं पच्छिम बंगाल से स्वयं सहायता समूह से जुड़ी ग्रामीण शिल्प कार अपने यहाँ की शिल्प , संस्कृति, परंपरा एवं व्यंजन को लेकर उपस्थित हैं. मेला में कैशलेश खरीददारी की भी व्यवस्था है. साथ ही ग्राहक सेवा केंद्र से रुपये की जमा निकासी भी हो रही है. मेला के सातवें दिन गुरुवार को भी आगंतुक आये और अपने मनपसंद उत्पादों की खरीददारी की और स्वादिष्ट व्यंजनों का लुत्फ़ उठाया.

2 सितंबर से जारी सरस मेला के छठे दिन खरीद बिक्री का आंकड़ा सवा करोड़ रूपया पार कर गया. छह दिन में लगभग 1 करोड़ 20 लाख रूपये के उत्पादों और देशी खाद्य- व्यंजनों की खरीद-बिक्री हुई है. छठे दिन बुधवार को लगभग 23 हजार लोग आये बड़ी संख्या में लोग आये और लगभग उन्नीस लाख रुपये की खरी-बिक्री हुई . बांका, बिहार से आई कस्तूरबा स्वयं सहायता समूह के स्टॉल से सर्वाधिक 72 हजार रुपये के खादी के खरीद बिक्री हुई. खरीद-बिक्री का आंकड़ा मेला में आये ग्रामीण उधमियों से लिए गए बिक्री रिपोर्ट पर आधारित होती है.  

बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति (जीविका) परियोजना समन्वयक  महुआ राय चौधरी ने चौधरी ने बताया कि स्वच्छता एवं बेहतर साज-सज्जा एवं बेहतर बिक्री को बढ़ावा देने के उदेश्य से जीविका द्वारा प्रतिदिन स्टॉल धारकों को सम्मानित भी किया जा रहा है.  स्वच्छता के लिए जीविका दीदी द्वारा संचालित ग्राहक सेवा केंद्र के स्टॉल, बेहतर साज-सज्जा के लिए बुनकर जीविका स्वयं सहायता समूह, नवादा बिहार एवं सबसे ज्यादा उत्पाद की बिक्री के लिए कस्तूरबा स्वयं सहायता समूह, बांका, बिहार के स्टॉल को सम्मानित किया गया.

सरस मेला में आई ग्रामीण शिल्पकारों ने संस्कृति और परंपरा को अपने हुनर एवं स्वयं सहायता समूह के संबल से पुनर्जीवित किया है . उन्ही महिलाओं में से एक हैं कटिहार जिले के मनिहारी गईं की रविका टूडू. रविका के ससुराल में बांस से टोकरी बनाने और उसे बेचने का व्यवसाय था . इस व्यवसाय में ज्यादा मुनाफा नहीं होता था. रविका के मायके में हस्तशिल्प का व्यवसाय था. थोडा बहुत उसे भी बांस से सजावट के सामान बनाने आते थे. रविका ने अपने ससुराल में भी हस्तशिल्प को बढ़ावा देने की बात रखी. सभी सहमत तो हो गए लेकिन कुशल प्रशिक्षण एवं बाज़ार की अनुपलब्धता एक बड़ी समस्या थी. रविका आशा जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ी थी. समूह में उनसे अपनी समस्या बताई. समूह ने उन्हें प्रशिक्षण भी उपलब्ध कार्य और कच्चे माल की खरीददारी के लिए 20 हजार रुपया ऋण भी उपलब्ध कराया. रविका बांस की कलाकृतियों का व्यवसाय शुरू किया. अब रविका द्वारा बनाये गए बांस की कलाकृतियों की अपने देश के विभिन्न प्रदेशों के अलावा संयुक्त अरब अमीरात समेत कई राष्ट्रों में मांग है. बांस की कलाकृतियों को बेचकर प्रतिमाह उन्हें प्रति माह 20 से तीस हजार रूपया मुनाफा हो रहा है. सरस मेला में भी उनके स्टॉल से प्रति दिन 6 से 7 हजार के कलाकृतियों की बिक्री ही रही है. संस्कृति और परम्परा भी कायम है और मान-सम्मान भी बढ़ा है.

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