प्रस्तुति के पहले दिन ही दर्शकों से खचाखच रही ओपन थियेटर गैलरी

लगभग 2 घंटे देरी से शुरू हुई प्रस्तुति, नही हिले दर्शक

नाटक के सकरात्मक संदेश ने अंत तक दर्शकों को जोड़े रखा




रंगमंच के मंजे कलाकारों ने दिखाया अभिनय का जलवा, नवोदित कलाकारों में दिखी गजब की ऊर्जा

आरा,28 मई. प्रभाव क्रियेटिव सोसाइटी द्वारा तैयार भिखारी ठाकुर रचित सुप्रसिद्ध नाटक ‘गंगा स्नान’ का मंचन शुक्रवार की शाम वीर कुंवर सिंह स्टेडियम में कलाकारों द्वारा बनाए गए बाबू ललन सिंह मुक्ताकाश मंच पर किया गया. नाटक का शुभारंभ मुख्य अतिथि के रूप में भावी मेयर प्रत्याशी विष्णु सिंह दीप प्रज्जवलित कर किया, जिसमें पूर्व पार्षद व भावी मेयर प्रत्याशी जितेंद्र शुक्ला, समाजसेवी अभय विश्वास भट्ट और संस्था के सचिव कमलेश कुंदन भी संयुक्त रूप से शामिल हुए. मुख्य अतिथि ने कम शब्दों में आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि कला से उनका पुराना नाता है. कला न सिर्फ मनोरंजन बल्कि जीवन जीना भी सिखाता है.

दो दिवसीय इस कार्यक्रम के पहले दिन कार्यक्रम लगभग दो घंटे विलंब से शुरू हुआ. बावजूद इसके दर्शकों ने नाटक के अंत तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा यह जरूर साबित कर दिया कि न सिर्फ वे नाट्य प्रेमी हैं बल्कि नाटक ने उन्हें अपने रस से बांधे रखा.

ग्रामीण समाज में गंगा स्नान करने के महत्व पर आधारित इस नाटक में एक घर की कहानी है जिसमें मलेछु बहु और अटपट बहु गंगा स्नान करने के लिए जाना चाहती है लेकिन उनके पति तैयार नहीं होते हैं. इसी बीच उनकी बुढ़ी मां भी गंगा स्नान के लिए चलने को कहती है. बेटा मां को ले जाने के लिए तैयार हो जाता है लेकिन उसकी पत्नी उसे ले जाने से मना करती है वह कहती है कि अगर वह बुढ़िया को ले जाएगा तो जहर खा कर मर जायेगी. पत्नी के इस हठ के कारण वह अपनी बूढ़ी मां को मारता पीटता और अंत में वह इस बात पर तैयार होता है कि समान बूढ़ी मां को ढोना पड़ेगा. बेचारी बूढ़ी मां तैयार हो जाती है. सभी गंगा स्नान के लिए जाते हैं. गंगा किनारे मेला लगा है बूढ़ी माता से समान गिर जाने के कारण वे उसे वही छोड़ कर चले जाते हैं. मेले में मलेछू को एक बाबा मिलते हैं. वह उनके जाल में फंस जाता है. पुत्र की प्राप्ति के चक्कर में अपनी पत्नी को बाबा के हवाले कर देता है. बाबा उसकी पत्नी के सारे गहने लूट लेता है. अब मलेछु अपनी पत्नी को भटकता मेले में खोजता है. जब उसकी पत्नी मिलती है तब उन्हें अपने किए पर पछतावा होता है और दोनो मिलकर फिर अपनी बूढ़ी मां को खोज घर वापस आते हैं.

भिखारी ठाकुर ने गंगा स्नान के माध्यम से परिवार में बुज़ुर्गों की जिस उपेक्षा को दिखाया था प्रभाव क्रियेटिव सोसाइटी की प्रस्तुति ने उसे बेहद ही प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया,जिसके लिए युवा निर्देशक व रंगकर्मी मनोज सिंह बधाई के पात्र हैं.
वहीं गीत संगीत को अपने सुरों में पिरोकर नाटक में ठेठ देसीपन का जो आनंद लोकगीतों के माध्यम से श्याम शर्मिला ने दिया कि दर्शक अभिनय और लोकसंगीत के इस जादू में अंत तक फंसे रहे.

मलेछु की भूमिका में डॉ पंकज भट्ट, मलेछु बहु की भूमिका में खुशबू स्पृहा, मां की भूमिका में आशा पाण्डेय, अटपट की भूमिका में युवा रंगकर्मी शुभम दूबे, अटपट बहु की भूमिका में ऋतु पांडेय, ढोंगी बाबा की भूमिका में हर्ष जैन ने जहां नाटक में अपनी जीवंत अभिनय से दर्शकों के बीच अपनी जादूगरी कायम की, वही विभिन्न भूमिकाओं में प्रिंस शर्मा , दीपक तिवारी ट्रेन,कुणाल, रितेश टाइगर, मुकेश ओझा,अभिषेक, राजू कुमार सिंह,सुन्दरम बाबा ने अपनी ऊर्जा का परिचय उपस्थित दर्शकों को दिया.

संगीत में तबला पर अभय ओझा और नाल पर हरिशंकर निराला ने साथ दिया तो झाल व अन्य वाद्य यंत्रों के साथ सह गायन में जागृति कुमारी,तारकेश्वर चौबे,संतोष चौबे और वीरेंद्र ओझा ने संगीत को प्रभावी बनाने में समूह गायन का लोहा मनवाया. प्रस्तुति संयोजक मनोज श्रीवास्तव, प्रस्तुति नियंत्रक ओ पी पांडेय और मंगलेश तिवारी थे. धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ रंगकर्मी अंबुज कुमार ने किया.

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