कायस्थों के गढ़ में यादवों की जीत का भी रहा है इतिहास, रामानंद यादव ने रामकृपाल को दी थी मात, तीसरे स्थान पर रहे थे नवीन किशोर सिन्हा

डॉ रामानंद यादव जैसा परिणाम देने में कामयाब हो पाएंगे प्रशांत किशोर या रेखा गुप्ता!

पटना । अजीत कुमार (विशेष रिपोर्ट)।। पटना के हाइप्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव ने एक बार फिर बिहार की राजनीति का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. इस सीट को वर्षों से कायस्थ समाज का मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता है, लेकिन इसका चुनावी इतिहास बताता है कि यहां कई बार मतदाताओं ने जातीय गणित से अलग फैसला सुनाकर नए राजनीतिक संदेश दिए हैं. वर्ष 1990 का चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है, जब यादव समाज के दो प्रभावशाली नेताओं के बीच मुकाबला हुआ और कायस्थ समाज के प्रमुख नेता नवीन किशोर सिन्हा तीसरे स्थान पर रह गए. हालांकि बाद में नवीन किशोर सिन्हा ने इस सीट पर आजीवन अपना कब्जा बनाए रखा जिसे उनके बेटे नितिन नवीन ने भी अबतक दबदबा कायम रखने में कामयाबी हासिल करते रहे.




दरअसल, बांकीपुर का चुनावी इतिहास यह बताता है कि यहां मतदाता कई बार स्थापित राजनीतिक समीकरणों को बदल चुके हैं. ऐसे में उपचुनाव में एक बार फिर इतिहास दोहराया जाएगा या नया अध्याय लिखा जाएगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं.देखना दिलचस्प होगा कि क्या डॉ रामानंद यादव जैसा परिणाम देने में प्रशांत किशोर कामयाब हो पाएंगे या फिर बीजेपी का कब्जा बना रहेगा. पीके और बीजेपी के नए नवेले कैंडिडेट नीरज के बीच आर जे डी उम्मीदवार रेखा गुप्ता क्या करिश्मा दिखा पाएंगी.

1990 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार रामानंद यादव ने जनता दल के प्रत्याशी रामकृपाल यादव को कड़े मुकाबले में पराजित किया था. रामानंद यादव को 35,083 मत मिले, जबकि रामकृपाल यादव को 31,844 वोट प्राप्त हुए. वहीं कायस्थ समाज के प्रमुख चेहरे नवीन किशोर सिन्हा को 19,800 मत मिले और उन्हें तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा. इस चुनाव ने यह साबित किया कि बांकीपुर के मतदाता जरूरत पड़ने पर पारंपरिक समीकरण भी बदल देते हैं.

इससे पहले भी इस क्षेत्र ने कई अलग राजनीतिक संदेश दिए. वर्ष 1957 में तत्कालीन पटना पश्चिम विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के वैश्य उम्मीदवार रामशरण साव ने निर्दलीय प्रत्याशी जगन्नाथ प्रसाद को हराकर जीत दर्ज की थी. वर्ष 1972 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सुनील मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ के कायस्थ नेता शैलेंद्र नाथ श्रीवास्तव को पराजित किया. इसके बाद वर्ष 1985 में निर्दलीय उम्मीदवार रामानंद यादव ने फिर जीत हासिल कर सभी राजनीतिक दलों को चौंका दिया.

हालांकि इसके बाद बांकीपुर की राजनीति में नया दौर शुरू हुआ. कायस्थ समाज के वरिष्ठ नेता नवीन किशोर सिन्हा ने इस सीट पर जीत दर्ज कर अपनी मजबूत राजनीतिक पकड़ बनाई और लंबे समय तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. उनके जीवनकाल तक यह सीट उनके प्रभाव का केंद्र बनी रही. उनके निधन के बाद उनके पुत्र नितिन नवीन ने राजनीतिक विरासत संभाली और लगातार चुनाव जीतकर इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी की पकड़ बरकरार रखी. वर्तमान में नितिन नवीन राज्य सरकार में मंत्री हैं और बांकीपुर उनकी राजनीतिक पहचान का सबसे मजबूत आधार माना जाता है. ऐसे में यह उपचुनाव भाजपा और नितिन नवीन, दोनों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है.

दूसरी ओर, जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर इस उपचुनाव को अपनी राजनीति की बड़ी परीक्षा मान रहे हैं. उनका दावा है कि इस बार चुनाव जातीय समीकरणों से आगे बढ़कर स्थानीय मुद्दों, शिक्षा, रोजगार, कानून-व्यवस्था और विकास पर लड़ा जाएगा. वहीं राष्ट्रीय जनता दल भी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है.

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशांत किशोर बांकीपुर के स्थापित राजनीतिक समीकरण बदलने में सफल होंगे, या भाजपा अपने मजबूत संगठन और नितिन नवीन की राजनीतिक विरासत के सहारे इस सीट पर कब्जा बरकरार रखेगी. साथ ही यह भी देखने वाली बात होगी कि भाजपा के स्थानीय नेतृत्व और संगठन की रणनीति के सामने विपक्ष कितना प्रभावी मुकाबला खड़ा कर पाता है. चुनावी इतिहास और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए इस बार बांकीपुर का मुकाबला बिहार की सबसे दिलचस्प राजनीतिक लड़ाइयों में शामिल माना जा रहा है. राजद उम्मीदवार का क्या प्रभाव रहेगा यह भी काफी मायने रखता है.

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