कहाँ गयी बाबू कुँवर सिंह की सुरंग ?


तो क्या किताब के पन्नो तक ही सिमट गई इतिहासकारी सुरंग ?

किताबों में पढ़ा, लोगों से सुना,कि कुंवर सिंह ने लड़ा जंग, पर आंखें खोज रही किले तक जाने वाली बाबू वीर कुंवर सिंह का सुरंग




Patna now Exclusive report

आरा, 20 अक्टूबर. 1857 की क्रांति के नायक वीर बांकुड़ा बाबू कुँवर सिंह को कौन नही जानता. उनका नाम सुनते ही शौर्य से खून में रवानित आ जाती है और किले और वहाँ तक जाने के लिए सुरंग की बातें दिमाग मे घर कर लेती है. लेकिन सुरंग की बात को लेकर ऐसा लगता है कि कहीं ये काल्पनिक बातें तो नही. हालाँकि आरा हाउस में सुरंग की बची-खुची रचनाएं सुरंग होने का प्रमाण तो जरूर देती हैं लेकिन 23 किमी तक लंबे सुरंग का उद्गम और समापन कहाँ तक था इसपर कई तरह के मंतब्य हैं. 2 साल पहले काफी चर्चा में भी यह बात थी कि जब विजयोत्सव की 160वीं वर्षगाँठ मनाई गयी थी कि बाबू कुँवर सिंह की वह सुरंग जगदीशपुर के किले तक बनाया जाएगा जिसे पर्यटकों के लिए खोला जाएगा पर आरा हाउस की घेराबंदी तक कि काम सिमट गया.

इतिहास बताता है कि 1857 में उत्तर और मध्य भारत में एक शक्तिशाली जनविद्रोह उठ खड़ा हुआ था जो ब्रिटिश शासन की जड़ें तक हिला कर रख दिया था. कहा जाता है कि इस विद्रोह का प्रमुख केन्द्र दिल्ली, कानपुर लखनऊ ,बरेली, झाँसी और आरा था. दिल्ली में प्रतीक रूप में कहने को विद्रोह के नेता सम्राट बहादुरशाह थे परन्तु वास्तविक नियंत्रण  एक सैनिक समिति के हांथों में था जिसके प्रमुख जनरल बख्त खान थे. ब्रिटिश सेना में वो तोपखाने के एक मामूली सूबेदार थे. कानपुर में विद्रोह के नेता नानासाहेब थे जो अंतिम पेशवा ,बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे. लखनऊ से विद्रोह का नेतृत्व अवध की महारानी बेगम हजरत महल कर रही थी. 1857 के विद्रोह में झाँसी का नेतृत्व झाँसी की युवा वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई कर रही थी तो वही बिहार में विद्रोह के प्रमुख नेता वीर बांकुड़ा बाबू कुंवर सिंह थे जो आरा के पास जगदीशपुर के एक तबाह और असंतुष्ट जमींदार थे. “80 वर्षों की हड्डी में जागा जोश पुराना था, सब कहते हैं कुंवर सिंह बड़ा वीर मर्दाना था.” कुंवर सिंह की वीरता के संदर्भ में उक्त पंक्तियां आज भी प्रसिद्ध हैं. कहा जाता है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में लगभग 80 वर्ष के होते हुए भी वीर कुंवर सिंह, विद्रोह के सम्भवत: सबसे प्रमुख सैनिक नेता तथा तथा गुरिल्ला युद्ध के सफल रणनीतिकार थे. उनके युद्ध से जुड़े तथ्य में यह भी सम्मिलित माना जाता है कि अंग्रेजों के साथ लड़ाई के दौरान गंगा नदी पार करते समय उनके बांह में जब गोली लगी तो उन्होंने अपनी तलवार से जख्मी बांह को काटकर गंगा में ही फेंक दिया.

“आरा से सटे जगदीशपुर है बाबू वीर कुवंर सिंह की जन्मस्थली”
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के वीर योद्धा कुंवर सिंह की जन्मस्थली जगदीशपुर आज बिहार के ऐतिहासिक धरोहर में  शामिल है. राज्य सरकार ने संरक्षित धरोहर कुंवर सिंह किले को पर्यटन स्थल और कला संस्कृति विभाग के रूप में विकसित करने की योजना पर काम शुरू कर दी है. आज ये धरोहर बाबू वीर कुंवर सिंह स्मृति संग्रहालय से ख्याति पा रही है,जिसमें कुंवर सिंह के जीवन एवं युद्ध के ऐतिहासिक पलों को सुंदर व आकर्षक कला कृतियों से सुसज्जित किया गया है जो पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं. कुंवर सिंह को जानने की पिपासा इस स्मृति संग्रहालय को देख कर पूरी हो जाती है क्योंकि यहां की कलाकृति, भित्तिचित्र,और आधुनिक पेंटिंग सभी पर्यटकों को अनायास ही अपनी ओर  करते हैं, परन्तु पर्यटकों के मन में एक कसक रह जाती है कि मैंने वो सुरंग नहीं देखा जहां से वीर कुंवर सिंह अपने घोड़े पर सवार हो कर हवा से बात करते हुए सुरंग के रास्ते कभी आरा तो कभी जगदीशपुर में मौजूद रह कर अंग्रेजों को दिग्भर्मित करते थे.
किताबों में पढ़ा, कानों से सुना पर नहीं दिखा अभी तक कहीं सुरंग

स्थानीय कुछ छात्रों का कहना है कि हमने किताबों में पढ़ा ,बड़े बुजुर्गों से सुना पर अपनी उम्र में कहीं गुफा नहीं देख सका. मेरे बड़े-बुजुर्गों ने भी सिर्फ सुना है कि इस किले में जगदीशपुर से आरा तक का सुरंग है पर कभी देखने को नहीं मिला. कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यहां सुरंग है तो सरकार को इस पर गंभीरता से ध्यान देकर इस गौरवशाली धरोहर को संजोने का प्रयास करना चाहिए. यह सुरंग पूरे बिहार ही नही देश-दुनिया के लिए भी आकर्षण का केन्द्र एवं गौरवशाली साबित होगा. कुछ लोगों का कहना है कि जब-जब चुनाव का विगुल बजता है तब-तब जगदीशपुर का अहम मुद्दा बाबू वीर कुंवर सिंह का ऐतिहासिक किला एवं सुरंग रहता है परन्तु चुनाव खत्म और ये मुद्दा ख़त्म. वीर कुंवर सिंह की जयंती पर पूरा ताम- झाम होता है, बड़े -बड़े भाषण होते हैं, कोई भी ये नहीं बोलता कि अगली जयंती तक बिहार का ऐतिहासिक धरोहर सुरंग भी देखने को मिलेगा.

स्थानीय निवासी मनीष कुमार


       यहां के कुछ स्थानीय लोग अपनी उम्र के तजुर्बे के अनुसार कहते हैं कि यहां कोई सुरंग नहीं है सिर्फ इतिहास के पन्नों पर सुरंग को बताया गया है. उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि  जगदीशपुर से आरा के बीज दो बड़ी बड़ी नहरें हैं जिसकी गहराई लगभग 60 से 70  फिट है. उन्होंने कल्पना करते हुए बताया  कि जैसा इतिहास के पन्नों पर लिखा है कि बाबू वीर कुंवर सिंह अपने घोड़े पर सवार होकर जगदीशपुर से आरा सुरंग के रास्ते से होकर जाते थे. गौरतलब है कि वीर कुंवर सिंह और उनके घोड़े की  कम से कम 10 से 12 फीट की होगी और बीच में जो  नहर की गहराई है यदि  उसकी गहराई 60 फीट के आसपास है यदि  कुंवर सिंह की लंबाई इसमें जोड़ें तो   सुरंग की गहराई 70 फीट के आसपास होगी जो कि  इस समय भी इस इलाके में 70 फीट नीचे से भूमिगत जल प्राप्त होता है .  तो  उनका सुरंग इतनी गहराई में कैसे हो सकता  है? उन्होंने आगे कहा कि हमने यहां अपना पूरा जीवन व्यतीत किया परंतु ऐसा कहीं भी नहीं लगा कि यहां सुरंग होगा. सबसे अहम बात उन्होंने यह बताया कि सुरंग के बीच में झरोखा रहता है जो ऑक्सीजन आने का  माध्यम होता है तो इतनी गहराई में ऑक्सीजन की क्या व्यवस्था होगी यह सोचनीय है और यहां की जो मिट्टी है वैसी नहीं है जो ऑक्सीजन बनाती हो. आगे यह भी बात आती है कि यदि इतिहास के पन्ने सही हैं तो बिहार सरकार पर्यटन विभाग को इसकी गंभीरता से छानबीन करनी चाहिए,  जिससे धरोहर की गरिमा और बिहार का गौरव बढ़े.

सूरक्षकर्मी दिनेश्वर सिंह

यहां के सुरक्षाकर्मी दिनेश्वर का कहना है कि वह जब से यहां आए हैं तब से वह सुरंग देखने की कोशिश में है परंतु उनको कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि यहां कोई सुरंग कभी रहा होगा. इनका कहना है कि इस संग्रहालय में यात्रियों, पर्यटकों को एवं यहां रहने वाले लोगों के लिए शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है. साथ ही साथ इस परिसर में कोई भी हैंड पंप नहीं है. बिजली चले जाने के उपरांत यहां पानी की समस्याएं बढ़ जाती हैं जिससे वह जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग का ध्यान इस समस्या की तरह  आकृष्ट करवाना चाहते हैं. सबसे अहम बात यहां काम करने वाले कर्मियों के सैलरी की ज्यादा हैं, वह बिलखते हुए कहते हैं कि हम यहां नौकरी कर रहे हैं परंतु हमें  कई महिनों से सैलरी नहीं मिल रही है.
यहां के कुछ स्थानीय युवकों का कहना है कि सुरंग की खोज होनी चाहिए. हर बार सिर्फ एक चुनावी मुद्दा बनकर ही रह जाता है और उस पर कोई काम नहीं हो पाता है.?? यदि वास्तव में ऐतिहासिक धरोहर को बचाते हुए पर्यटन स्थल बनाना है तो विरासत को बचाने की जिम्मेवारी सरकार और समाज दोनों की बनती है और इस पर सकारात्मक पहल होनी चाहिए.

आरा से सावन कुमार की रिपोर्ट