देशी मुर्गी विलायती बोल के चक्कर में पिछड़ रही है मगही

नई दिल्ली / पटना (ब्यूरो रिपोर्ट) | रविवार 6 जनवरी को विश्व पुस्तक मेला, प्रगति मैदान में कविता कोश द्वारा आयोजित “उत्तर भारतीय भाषा, बोली और साहित्य : एक परिचर्चा ” में मगही भाषा पर संवाद हेतु आमंत्रित नालंदा के युवा कवि संजीव कुमार मुकेश से जब यह सवाल किया गया कि मगही आज भोजपुरी और मैथिली से क्यों पिछड़ रही है. इस पर मुकेश ने कहा कि देशी मुर्गी विलायती बोल के चक्कर में मगही पिछड़ रही है. आज हम अपने स्टेटस को मेन्टेन करने के लिये घर में भी हिंदी तो छोड़िये अंग्रेजी को बोल चाल की भाषा बना रहे हैं. बच्चों से संवाद की भाषा भी अंग्रेजी बनती जा रही है. जबकि लोकभाषा में संवाद एक अपनापन पैदा करता है. किसी व्यक्ति तक कोई बात लोक भाषा में आसानी से दिल के करीब तक पहुंचाई जा सकती है, क्योंकि लोक भाषाएं दो व्यक्तियों को वैसे ही जोड़ती है जैसे माँ की कोख. यही कारण है कि बड़े बड़े मंचो से भी शुरुआत इस क्षेत्र की लोकभाषा के अभिवादन शब्दों के साथ खूब किया जा रहा है. मुकेश ने मगही के शुरुआती दौर से आज मगही में हो रहे समृद्ध साहित्यिक विकास की चर्चा की. इस अवसर अंगिका से प्रसून लतांत, अवधी से अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी, बज्जिका से हरि नारायण हरि, मैथिली से कैलाश मिश्र, ब्रज से श्रुति पुरी व भोजपुरी से विनय भूषण जी ने भाग लिया. कार्यक्रम का संचालन रश्मि भारद्वाज ने किया. इस अवसर पर सभी आमंत्रित कवियों साहित्यकारों को प्रतीक चिन्ह से कविता कोश के निदेशक ललित कुमार, संयुक्त

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