ये है ‘सुई-धागों’ की “विभूति” !

जन्माष्टमी पर पटना नाउ की सौगात “सुई-धागे की विभूति”

सुई-धागे से श्रीकृष्ण की तस्वीर बनाने वाली लड़की की कहानी 




जिस सुई-धागे से भागती थी हरदम उसी ने दिलाई पहचान

Special report

 

विभूति कुमारी

आरा,3 सितंबर. सुनने में आपको अजीब जरूर लगेगा क्या कभी सुई धागे से भी किसी की पहचान हो सकती है! या फिर यूँ भी कोई सोच सकता है कि कहीं इस खबर में 28 सितंबर को आने वाली फिल्म ‘सुई-धागा’ का प्रमोशन तो शामिल नही…! अरे नही जनाब ! आप इत्मिनान रखिये ऐसा कोई प्रमोशन का चक्कर नही है यहाँ… पटना नाउ ने खोज निकाला है इस जन्माष्टमी उस लड़की को जो सुई-धागे की मदद से कसीदाकारी कर श्रीकृष्ण की तस्वीर को कपड़े पर बना देती है. आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसी लड़की की दास्तान जिसने सुई-धागे की मदद से अपनी पहचान हर जगह बना रही है. गोढ़ना रोड के शिवपुरी निवासी आनन्द कुमार की पुत्री विभूति कुमारी ने अपनी पहचान सुई-धागे से इस कदर बनाई है कि उसके सुई-धागे के कारनामे के मुरीद बन लोग उससे मिलने आते है.

कृष्ण से बुद्ध तक की कलाकृतियां सुई-धागे से


सुई-धागे से बने कई कलाकृतियों को आपने जरूर देखा होगा लेकिन क्या आपने एप्लिक वर्क में राधा-कृष्ण और भगवान बुद्ध को देखा है? विभूति के द्वारा बनाये गए कसीदाकारी में बहुत ही बारीकियां दिखती हैं. गौर से देखने पर पता चलता है कि आकृतियों के भीतर भी आकृतियाँ हैं जो इसे खास बनाती है और सिद्ध करती है कि बनाने वाले ने कितना मेहनत किया है.

बुद्ध की बनाई गई आकृति तो इतना सरल और कपड़े में समाहित दिखता है कि लगता है जैसे प्रिंटेड प्रिंट ही हो. दरअसल कपड़े के रंग से मिलते धागे की मदद से विभूति का इतना फिनिशिंग वर्क है कि वह बिल्कुल सहज और सरल दिखता है.

कैसे बदली जिंदगी ?
जिस सुई-धागे से चिढ़ थी उसी से पहचान की बात पर विभूति मुस्कुराती है और कहती है कि उसने कभी नही सोचा था कि यही मेरी पहचान बनाएगी. बचपन से ही उसे सुई और धागे से चिढ़ थी. वह जब कभी भी सुई-धागे से काम करते लोगों को देखती तो गुस्सा आता और वह वहाँ से भाग जाती थी. घर वाले उसे समझाते भी कि लड़की को सुई-धागा का काम जानना जरूरी होता है लेकिन उसे इसकी जरा भी परवाह नही थी.

अपने परिवार की लाडली विभूति को बचपन से ही पेंटिंग में बहुत रुची थी. वह घँटों पेंसिल के सहारे कागज पर स्केच करती और फिर उसे रंगती. विभूति ने हालांकि कही प्रतियोगिताओं में भाग नही लिया जिससे उसकी प्रतिभा को आंका जा सके लेकिन एक अच्छी चित्रकार है. घर वाले उसके पेंटिंग से परेशान हो गए थे कि केवल पेंटिंग करती है कुछ परीक्षा या प्रतियोगिता की तैयारी क्यों नही करती?

पिता आनंद कुमार बिहार सरकार के जुट क्राफ्ट विभाग में JCI हैं जो सुपौल में पोस्टेड हैं. एक दिन विभूति पापा के कहने पर उनके दोस्त श्याम कुमार के घर गयी जहां उसे उनके संस्था “नेशनल साइंटिफिक रिसर्च एंड सोशल एनालिसिस ट्रस्ट” में कौशल विकास ट्रेंनिग कर रहे लोगों को देखने का मौका मिला.

वहाँ उसने महिलाओं को एप्लिक वर्क कर तरह-तरह के डिजाइन बनाते देखा तो उसे भी ट्रेनिंग का मूड बना हालांकि सुई-धागा अभी भी उसे चुभ ही रहा था लेकिन जब ट्रेंनिग में वह जाने लगी तो उसके बनाये गए पेंटिंग के डिजाइन कपड़ो पर उकेरने में उसे आत्मिक सुख मिलता और फिर 3 महीने के ट्रेनिंग उसकी जिंदगी की टर्निंग पॉइंट बन गई. इन 3 महीनों के दौरान हाथों में कसीदाकारी के लिए जो सुई और धागे ने जो उसका हाथ थामा कि अबतक वह उससे दूर जाने का नाम नही लेता है. अब सुई-धागे से उसे प्यार हो गया है क्योंकि उसके सहारे उसने जो भी डिजाइन बनाये सबने उसे सराहा. अब तो घर वाले उसके सुई-धागे से इस घनिष्ठता के कारण परेशान है.

विभूति की माँ आनन्दी देवी

विभूति की माँ आनंदी देवी जो एक कुशल गृहणी हैं, बताती हैं कि दिनभर इसे सुई-धागे लेकर डिजाइन बनाते देख हमे डर लगता है कि कहीं इसकी आंखे न खराब हो जाये लेकिन ये मानती कहाँ, दिनभर अपने जुनून में मस्त रहती है.

विभूति 4 बहनों में तीसरे नम्बर पर है. एक भाई – इंटर मनोविज्ञान hons की स्टूडेंट, विभूति की बड़ी बहन की शादी हो गयी, तो एक Ph.D. कर रही है. उसकी छोटी बहन पार्ट वन में और उसका छोटा भाई इंटर में पढ़ रहा है. विभूति बताती है कि उसकी बनाई डिजाईनो को माँ हमेशा पुराना बतातीं और कहती कि आधुनिक डिजाइनों को बनाना सीखो ये तो पुराने जमाने मे बनाया जाता था. सुई-धागा के जरिये अपने हुनर से अपनी पहचान बनाने वाली विभूति अपने शिक्षकों को इसका श्रेय देती है. भले ही मेहनत उसकी है लेकिन इस ज्ञान के लिए उसके शिक्षक ही उसके लिए सर्वोपरी हैं. आज जो उसे आस-पड़ोस, शहर, दोस्तों और इंस्टिच्यूट में उसे इतना प्यार और दुलार मिलता है उसके पीछे शिक्षकों की सही शिक्षा और प्रशिक्षण ही है जिसने उसके भीतर के हुनर को तराश दिया.

विभूति की बड़ी बहने

अब जहाँ इस फील्ड में उसे अपना करियर दिख रहा है वही परिवार में माँ, बहन और भाइयों को भी लगता है कि विभूति इस क्षेत्र में ही कुछ नया कारनामा करेगी.

विभूति कुमारी, सुई-धागे की उम्दा कलाकार

जैसा नाम वैसा काम…विभूति एक सहज और सरल स्वभाव की अन्तःमुखी लड़की है जिसे देखकर कोई नही कह सकता कि वह इतनी प्रतिभाशाली है लेकिन एक बार जो उसके सुई-धागे के हुनर को देख ले तो फिर उस धागे में कैद हो जाये. अब देखना यह होगा कि भोजपुर के धरती की यह “विभूति”, कब ‘विभूति’ बनकर देश मे नाम करती है!

आरा से ओ पी पांडेय और अपूर्वा की रिपोर्ट