भोजपुर की शास्त्रीय परम्परा के सशक्त युग का हुआ अंत

गायनाचार्य पं. देवनन्दन मिश्र(गुरुजी) का निधन, शोकाकुल भोजपुर

आरा, 12 अक्टूबर. पिछले छः दशक से शास्त्रीय संगीत को सींचने वाले महान शास्त्रीय संगीतज्ञ पण्डित देवनंदन मिश्रा का बीती रात निधन हो गया. वे लगभग 96 वर्ष के थे. उनके निधन की सूचना से पूरा भोजपुर ही नही बल्कि पूरा देश शोकाकुल है. पंडित देव नंदन मिश्रा ने भोजपुर के पुरानी से नई पीढ़ी तक को संगीत की एक परंपरा से पाटने का काम किया है. उनकी इस परंम्परा को कई शिष्यों ने इस परंपरा को कायम रखा है. उन्होंने 10 हजार से अधिक शिष्यों को संगीत की शिक्षा दी थी. शास्त्रीय का ऐसा कोई गायक नही होगा जिसने गुरुजी से तामील न ली हो. वे शास्त्रीय गायन के साथ-साथ तबला,पोखावज, बाँसुरी, ढोलक, मृदंग,हारमोनियम के साथ साथ वायलिन की भी शिक्षा देते थे. पुरानी पीढ़ी हो या नई पीढ़ी सबने उनसे संगीत की शिक्षा ग्रहण की है. ख्याति प्राप्त संगीतज्ञ पंडित प्रभंजन भारद्वाज ने उन्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि दी है. वही समाजसेवी व भारत स्वाभिमान आंदोलन के सशक्त प्रसिद्ध कवि पवन श्रीवास्तव ने इसे एक युग का अंत कहा है. गायिका चंदन तिवारी, भाजपा नेता ओमप्रकाश भुवन, भोजपुरी आंदोलन के सशक्त योद्धा सुनील प्रसाद शाहाबादी, युवा शक्ति सेवा संस्थान, पत्रकार नीरज कुमार शिक्षक अजय मिश्रा, नाटककार रंगकर्मी चंद्रभूषण पांडे रंगकर्मी कौशलेश पांडे, रंगकर्मी पूनम सिंह, संजय शाश्वत, संगीत शिक्षक नागेंद्र नाथ पांडे, पत्रकार देव कुमार पुखराज, संगीत के जानकार तरुण कैलाश, अशोक मानव, मनोज श्रीवास्तव, शशि भूषण मिश्रा आदि ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है.




उन्हें लोग गुरु जी के नाम से भी जानते थे. जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और शास्त्रीय संगीत के जानकार पंडित भारत भूषण आचार्य ने उनके निधन की खबर के बाद लिखा है- “अभी कुछ देर पहले प्राप्त सूचना के अनुसार महान् संगीतज्ञ एवं श्रीहनुमत्संगीतालय-बडी मठिया, आरा के संस्थापक-संचालक पं.देवनन्दन मिश्र जी(गुरुजी)का साकेतगमन हो गया है. पिछले छः दशकों से वे सहस्त्रों शिष्यों को शास्त्रीय संगीत में पारंगत करते रहे.

स्वर-ब्रह्म के महान् साधक श्रीमिश्रजी श्रीराघवेन्द्र-भगवान् श्रीसीतारामजी के उपासक तथा श्रीअवध के श्रीरामानन्दीय वैष्णव परम्परा में दीक्षित महानुभाव थे. भोजपुर जिला के संदेश प्रखंड के शोणभद्र तटवर्ती ग्राम-पिंजरोई में जन्मे श्रीमिश्रजी ने अपनी जन्मभूमि पर ही कुछ देर पहले महाप्रयाण किया. उनके साकेतवास से शाहाबाद में संगीत के क्षेत्र में महाशून्य उत्पन्न हो गया जिसकी भरपाई अभी सम्भव नहीं. पूरे जीवन वे प्रचार-प्रसिद्धि तथा सुख-सुविधाओं से सर्वथा पराङ्मुख श्रीहनुमान जी की सन्निधि में स्वर-साधना और विद्यार्थियों के शिक्षण में दत्तचित्त रहे.भावभीनी श्रद्धांजलि ! विनम्र प्रणाम ! कृतज्ञतापूर्वक स्मरण !भगवान् श्रीसीतारामजी के नित्य कैंकर्य में पधारने पर बारंबार नमन. नारायणस्मृति.

आरा से ओ पी पांडेय की रिपोर्ट