सात समंदर पार से आए छठ मनाने

By Amit Verma Nov 7, 2016

भोजपुर की असली सांस्कृतिक पहचान है छठ

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लोक पर्व पहले आस्तलगामी और फिर उदितमान सूर्य के अर्घ्य के साथ ही आज संपन्न हो गया। छठ पर्व की तैयारी महीनो से चल रही थी लोगों के मन में की इस बार छठ ऐसे मनेगा… वैसे मानेगा…हम अपने गांव जाएंगे, छठ का ठेकुआ खाएंगे और घाटों की सफाई भी करंगे. व्रतियों को चाय,हलवा और अर्घ्य के लिए दूध की व्यवस्था करेंगे. लेकिन कइयों के इस सपने को उस समय झटका लग गया जब उन्हें ऑफिस से इस बार गांव जाने की छुट्टी ही नहीं मिली. लेकिन कई ऐसे खुशनसीब मिले जिन्हें कई वर्षों बाद इस साल ही उन्हें अपने गाँव में, शहर में छठ काने का मौका मिला. नाहाय खाय से शुरू हुआ छठ पर्व खरना के खीर और रोटी खाने के बाद निर्जला व्रत के रूप जो शुरू हुआ तो भगवान् भास्कर को पहले अस्त होते समय व्रतियों ने उनकी आराधना की और फिर  सूर्योदय के समय. उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही महान आस्था का पर्व व्रतियों के पारन के साथ ही समाप्त हो गया. इस छठ पटना नाउ ने कुछ ऐसे लोगों से मुलाकात की जो सात समंदर पार से छठ मनाने के लिए आये. अभी कुछ ही दिनों पूर्व भोजपुर की बेटी स्वस्ति पांडेय के छठ गानों ने शिकागो में ऐसी धूम मचाई कि लोग छठ पर्व के कायल हो गए.

2अमेरिका के टेक्ससास से लौटे सॉफ़्ट्वेयर इंजीनियर अम्बरीश कुमार मिश्रा आरा आठ वर्षों बाद छठ मनाने आये हुए हैं जिनकी जुबानी आइये जानते हैं छठ की महत्ता और यहाँ मनाने का एक कारण-अपने घर जैसी कोई जगह नहीं. जैसे छठी माँ इन २ दिनों के लिए अपने मायके आती हैं उसी तरह , हम दुनिया के किसी कोने मैं क्यूँ ना हो इस छठ पर्व के लिए अपने घर खींचे चले आते है. हर देश की अपनी परम्परा अपना त्योहार होता है और किसी भी परम्परा का असली मज़ा लेना हो तो उस देश की मिट्टी में ही आता है. यूँ तो मैंने ये पूजा सिंगापुर और अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी देखी है , जहाँ मैं अपने काम के सिलसिले से गया था. लेकिन वो देसीपन वहां नहीं दिखता. इस पर्व को कई देशों में मानाया जाता है पर जो बात यहाँ है वो कहीं नहीं. जो उत्साह और प्यार यहाँ मिलता है वो कहीं नई होता . जिस हर्ष और उल्लास से लोग एक दूसरे की सहायता करते और एक जुट हुए यहाँ नज़र आते है , वो ख़ुशी कहीं किसी देश में देखने को नही मिलतीं.  समय के साथ साथ यहाँ भी बहुत कुछ बदल गया है . अच्छी सुविधा दी जा रही है, साफ़ सफ़ाई का ध्यान रखा जा रहा है . ये सब से लोगों के बीच और ज़ायदा ख़ुशी नज़र आती है. सरकार और मीडिया जिस तरह से इस पूजा का समर्थन कर रहे है उससे अब ये सिर्फ़ बिहार ही नई बल्कि देश के कोने कोने में मनाया जाने वाला एक इम्पोर्टेंट पर्व हो गया है . आज इस पूजा की मान्यता हर कोई जनता है और समझता है. ये 2 दिन का पर्व हमें अपने संस्कार और परम्परा के साथ साथ एक दूसरे के साथ भी मिल जुल कर चालना सीखा देता है .

4बिहार के आरा शहर के तरी मुहल्ला के एक घर में इस बार छठ पर विशेष रौनक है. घर की बड़ी बेटी रचना सिन्हा का इस बार पहला छठ है. इसलिए वो छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से सपरिवार अपने मायका चली आयी है.
रचना कहती हैं- “बचपन का छठ बहुत याद आता है. पति की नौकरी बिलासपुर में है. वहां बिहार जैसा आकर्षण नहीं है. वहां पर जब भी छठ घाट पर जाते थे तो आरा का घाट याद आता था. आंख से आंसू नहीं रोक पाती थी. शादी को दस साल बीत गये. आरा मेरा मायका है. यहां छठ में आती रहती हूं. हर बार सोचती थी छठ करूंगी. इस बार संयोग बना तो बिहार से हीं करने का मन बनाया. आरा मेरी आत्मा मे बसती है. बहुत अच्छा लग रहा है. पहले सोचती थी कैसे कर पाऊंगी. पर मां ने आसान बना दिया. वो हर साल यह अनुष्ठान करती हैं. अब मैं भी इस ग्रुप में शामिल हो गई. सच में ऐसा लग रहा है जैसे बहुत बड़ी तीर्थ यात्रा पर निकली हूं. अपने भीतर बहुत ऊर्जा महसूस कर रही हूं.”

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वही एमपी बाग़ के रहने वाले अनुभव श्रीवास्तव इस बार बैंगलोर से छठ के लिए आये हैं. बैंगलोर में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी करने वाले अनुभव श्रीवास्तव आरा, छठ में हर साल आते हैं क्योंकि उनकी माँ हर साल छठ करती हैं. बचपन से छठ को देखते हुए बड़े हुए हैं, जिसकी अनुभूति हमेशा अकल्पनीय रहती है और स्वच्छता के लिए सबका समर्पण इस पर्व की ख़ास बात है. ख़ास बात ये है कि इस पर्व पर मुझे कुर्त्ता पहनने का बड़ा इन्तजार भी रहता है जो बेहद अच्छा लगता है. खरना का खीर, ठेकुआ और छठ के गीतों से बना जो माहौल होता है न वही असली भोजपुरी संस्कृति की पहचान है. भोजपुरी के बारे में कुछ भी बोलने वाले पहले इस असली भोजपुरी संस्कृति को जान लें तो उम्मीद है कि संस्कार, समर्पण, स्तर, और एकता की मिसाल देना भूल जायेगा. यही एक पर्व है जो सभी धर्मों को एकता के एक सूत्र में बंधता है.

लेकिन एक चीज की कमी खली. इतने बड़े पर्व के बाद भी शहर का हृदय स्थली कहे जाने वाले कलेक्ट्री तालाब की सफाई में कोताही सरकारी उदासीनता का प्रतीक है. इसे भोजपुर की जनता और इस लोक आस्था के देव भी बर्दाश्त नहीं करेंगे.

रिपोर्ट- आरा से ओपी पांडे

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