बिहार में अवैध बूचड़खानों का पसर रहा जाल!


बिहार में शराब बंदी के बाद जिस तरह यूपी, बंगाल, और झारखण्ड सहित कई बिहार से सटे बॉर्डर इलाकों पर शराब के कारोबार ने अपना पाँव पसारा, ठीक उसी प्रकार अब मवेशी तश्करों के लिए भी ये इलाके किसी सोना से कम साबित होने वाले नहीं हैं. यूपी में योगी के अवैध बूचड़खानों पर पर चले तलवार के बाद तो मवेशियों और उसके माँस का ब्यापार करने वालों की नजर इन्हीं इलाकों में है जो उनकी आँखों में हीरे की चमक दे रहा है.




यूुपी में बंद हुए एक अवैध बूचड़खाने की तस्वीर
भोजपुर जिले में एक भी बूचड़खाने का लाइसेंस सरकार द्वारा नहीं है, बावजूद इसके मिल्की मुहल्ला, रानी सागर, बिहियाँ, सहित कई जगहों पर गाय,भैंस और साँढ़ों के माँस को बेचा जाता है। भोजपुर से बाहर की बात करें तो बक्सर से यूपी के सटे हुए इलाको में भी यही स्थिति है.

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यूपी में बूचड़खानों के बंद होने के बाद कई प्रसिद्ध कबाब दुकानों और चिड़िया घरों में जानवरों के लिए भी जरुरी मांस की कमी हो गयी. इससे मांस के औने-पौने रेट भी तय होने शुरू हो गए हैं. भोजपुर के गड़हनी, बिहियां, ब्रह्मपुर के साथ बिहटा और डुमरांव में साप्ताहिक पशु मेले लगते हैं जहां दूर-दराज से इन पशुओं के क्रेता और विक्रेता आते हैं. इन मेलों में क्रेता के रूप में कई मवेशी तश्कर भी होते हैं जो इन पशुओं को खरीदने के बाद बूचड़खाने संचालकों को बेच देते हैं. बता दें कि बजरंग दल के सदस्यों ने आरा में कई बार ऐसे अवैध मवेशी कारोबारियों को पकड़ा था. मवेशियों के साथ पकडे गए इन व्यापारियों के पास किसी तरह का चालान या रसीद नहीं था. हंगामा होने के बाद पुलिस ने मामले को अपने हाथ में लिया था.
इन मवेशी तश्करों का नेटवर्क इतना मजबूत हो गया है कि गांव में छोड़े गए सांढ़ और भैंसों को भी इनके दलाल इन्हें चुपके से खपा रहे हैं. हर गांव या पंचायत में काली माँ की पूजा कर सांढों को छोड़ दिया जाता है, जो आजाद घूमता रहता है. लेकिन कुछ दिनों पहले अगिआँव बाजार के अमेहता पंचायत में भी दो साँढ़ों के इसी तरह से गायब होने का मामला सामने आया था. जिसकी सूचना ग्रामीणों ने थाने में भी की थी लेकिन साक्ष्य के आभाव में पुलिस कुछ भी कार्रवाई नहीं कर पाई. ऐसी खबरें कई बार जिले में विभिन्न जगहों से आते रहती हैं लेकिन कोई ध्यान नहीं देता. पहले भी बिहार और बंगाल के मवेशियों की अधिक मांग रही है. अब इस बढ़ती मांग से कच्चे मांस की कीमत में तीन गुना बढ़ोत्तरी होने की संभावना है.

वाद्य यंत्रों के भी बढ़ गए दाम


बताते चलें कि कई ऐसे वाद्य यंत्र है जिसमे मवेशी के चमड़े उपयोग में लाये जाते हैं. इन वाद्य यंत्रों में तबला,ढोलक,नाल,डमरू,डफली, मृदंग और हुडुक जैसे कई यंत्र हैं. इन वाद्य यंत्रों को जानवरों के चमड़े से ही मढ़ा जाता है. अब इन वाद्य यंत्रों के लिए मढ़ने वाले इन चमड़े की कीमत महज एक डमरू जैसे छोटे यंत्र के लिए 200 रुपये हो गए हैं जबकि नाल या ढोलक के लिए 1000 रूपये हो गए हैं. बॉर्डर इलाकों में अब इन मवेशियों के तश्करों की हलचल के बाद कई तंत्रों की बल्ले-बल्ले हो रही है. शराब के साथ अब मांस की सप्लाई या मवेशियों की सप्लाई अच्छे कारोबार का रूप ले रहा है.

रिपोर्ट- आरा से ओ पी पांडे