निर्धारित मापदंडों से भी नहीं बन पाया बिहार में फुटपाथ

क्या कहती है बिहार की जनता

पदयात्री सम्यक सूची में पटना सबसे पीछे

विलुप्त हो रहे फुटपाथ, कैसे मिले पैदल को अधिकार




फुटपाथ हो गए अतिक्रमण के शिकार

कृष्ण कुमार सिंह कहते हैं कि फुटपाथ के अभाव में पदयात्री के पास मुख्य सड़क पर चलने के अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं रहता. ऐसे में वह हादसे का शिकार भी हो जाता है. शहरीकरण की दौड़ में सबसे अधिक ध्यान कहीं दिया जाता है, तो वह है सड़कों को चौड़ा करने के काम पर. सड़कों के दोनों ओर विलुप्त होते फुटपाथ बहुसंख्यक आबादी को पल-पल असुरक्षा की ओर धकेल रहे हैं. पैदल चलने वाले 90 प्रतिशत लोग चलते वक्त स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं. छोटे शहरों में कहाँ दिखते हैं फुटपाथ.

रविन्द्र कुमार कहते हैं कि कई बार जारी किए गए दिशा-निर्देशों और कानूनी प्रावधानों के बावजूद पैदल चलने वाली आबादी के लिए उपयुक्त मार्ग विकसित नहीं हुआ है. फुटपाथ या तो हैं ही नहीं और यदि हैं भी तो इनकी चौड़ाई बढऩे की जगह निरंतर कम होती जा रही है और उनका अतिक्रमण के बारे में तो सोचिये मत. फुटपाथ के अभाव में पदयात्री के पास मुख्य सड़क पर चलने के अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं रहता. ऐसे में वह हादसे का शिकार भी हो जाता है. शहरीकरण की दौड़ में सबसे अधिक ध्यान कहीं दिया जाता है, तो वह है सड़कों को चौड़ा करने के काम पर. सड़कों के दोनों ओर विलुप्त होते फुटपाथ बहुसंख्यक आबादी को पल-पल असुरक्षा की ओर धकेल रहे हैं.

गुप्तेश्वर प्रसाद कहते हैं कि सड़क हादसों में मृत्यु की दर लगभग 19 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ रही है. करीब साढ़े चार सौ व्यक्ति प्रतिदिन या यों कहें कि औसतन 20 व्यक्ति प्रति घंटे सड़क हादसों का शिकार हो जाते हैं. दुर्भाग्य से सड़कों के विकास के साथ-साथ पैदल चलने वालों की हादसों में मौत का आंकड़ा भी बढ़ता जा रहा है. औसतन 60-70 लोग  प्रतिदिन पैदल चलते हुए हादसों का शिकार बन मौत के मुंह में चले जाते हैं. गौर करने वाली बात यह है कि लगभग 30 फीसदी कामकाजी आबादी और 60 फीसदी छात्र-छात्राओं की आबादी पैदल ही चलती है. यह उल्लेख करना भी उचित होगा कि मोटर व्हीकल (ड्राइविंग) रेगुलेशन, एक्ट के अनुसार जहां फुटपाथ नहीं है अथवा विद्यालय या अस्पताल स्थित है, वाहनों की गति सीमा 25 किलोमीटर प्रतिघंटा से अधिक नहीं होनी चाहिए.

अमरेन्द्र कुमार कहते हैं कि साल  2019 संशोधित मोटर व्हीकल कानून में भी पैदल चलने वाले व्यक्तियों के लिए बने अनुच्छेद 138 में परिवर्तन के लिए राज्यों को निर्देशित किया गया है. इन सबके बावजूद नई बनने वाली व चौड़ी होती सड़कों से निरंतर फुटपाथ विलुप्त होते जा रहे हैं. भारतीय रोड कांग्रेस की ओर से 2012-13 में तय मानदंडों के अनुसार पदयात्रियों के लिए आवासीय क्षेत्र में न्यूनतम 6 फीट, व्यावसायिक क्षेत्र 8.4 फीट और बड़े व्यावसायिक क्षेत्र में 13 फीट जगह स्पष्ट रूप से फुटपाथ के रूप में विकसित की जानी चाहिए.

अवनीश चन्द्र श्रीवास्तव कहते हैं कि यदि एकल सड़क है, तो फुटपाथ की चौड़ाई और अधिक होनी चाहिए. इन मानदंडों के अनुसार फुटपाथ के दोनों ओर निर्धारित स्थान छोड़े जाने चाहिए. आमतौर पर शहरों में फुटपाथ और सड़क पार करने वाले स्थलों पर मानकों के विपरीत अतिक्रमण, हरियाली इत्यादि पाई जाती है, जो पदयात्री के लिए बाधक है. ऐसे में वह मजबूरन मुख्य सड़क का रुख करता है. कानून की नजर से देखें, तो सड़क पर सर्वप्रथम अधिकार पदयात्री का है. यह अधिकार विकास की इस अंधाधुंध दौड़ में गौण हो गया है. नियम स्पष्ट उल्लेख करते हैं कि जहां पदयात्री नियंत्रण के लिए यातायात सिग्नल नहीं है, वहां वाहन चालक को गति अत्यन्त धीमी करनी होगी. यदि पदयात्री सड़क से गुजर रहा है तो उसे राह देनी होगी. साथ ही अनावश्यक हॉर्न न बजाया जाए, यातायात सिग्नल, फुटपाथ व सड़क पार करने वाले स्थान पर किसी भी रूप में वाहन खड़ा न करें.

ओम प्रकाश राजीव कहते हैं कि पैदल चलने लायक शहरों की सूची का अवलोकन करने पर एक अत्यन्त आश्चर्यजनक तथ्य उभर कर आता है. इस पदयात्री सम्यक सूची में जहां पटना सबसे पीछे है. स्थापित महानगरों यथा नई दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, कोलकाता, पुणे, चेन्नई में तो फिर भी पदयात्रियों लायक सुविधाएं औसत या उससे कुछ ऊपर हैं. लेकिन, नए उभरते शहर विकास का अर्थ मात्र चौड़ी सड़कों को मान रहे हैं. सही अर्थ में विकास तब तक नहीं माना जा सकता, जब तक वह समावेशी न हो. मात्र मोटर वाहन की सुगमता ध्येय नहीं होना चाहिए, पदयात्री, दिव्यांग, वृद्ध इत्यादि भी पथ निर्माण योजना में शामिल होने चाहिए. अराजकता, आवासीय योजनाओं में अपनी सीमाओं से परे हो रहे निर्माण, अतिक्रमण, ऊंचे-ऊंचे ढलाव, इत्यादि के कारण हादसे हो रहे हैं. नई बसावटों में आयोजना की कमी व अतिक्रमण की प्रवृत्ति से छोटी-छोटी राहें पगडंडियों का स्वरूप ले रही हैं. यहां भी हादसे होते रहते हैं.

आलोक कुमार कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि राजनेता, नीति निर्धारक आदि फुटपाथ के अभाव में होने वाले इन खतरों से अनजान हैं. जरूरत पहल करने के सामर्थ्य की है, जिसकी कमी नजर आती है. वर्ष 2014  में जिस तरह से स्वच्छ भारत अभियान के माध्यम से कचरा प्रबंधन व सफाई की अलख जगाई गई, वैसे ही अभियान की जरूरत है. ऐसी राजनीतिक इच्छाशक्ति से काम हो, तो पदयात्रियों को फुटपाथ भी उपलब्ध हो पाएंगे. वाहन स्क्रैपिंग नीति में कबाड़ हो रहे वाहनों को नष्ट करने की पहल भी सड़कों पर वाहनों का दबाव कम करने वाली होगी. लेकिन, सड़कों का दबाव और कम तब ही होगा, जब निर्धारित मापदंडों से फुटपाथ विकसित किए जाएं.

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