“अभावों के आर्यभट्ट” डॉ वशिष्ठ की मौत या मारे गए ?

अभावों के आर्यभट्ट डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह को
सिस्टम ने पहले ही सुला दी थी “मौत की तीन नींद

आरा,15 नवम्बर. गणित के महान वैज्ञानिक डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह जिन्होंने न सिर्फ भोजपुर की शान का परचम पूरे विश्व मे लहराया था बल्कि पूरे भारतवर्ष का मान विश्व पटल पर स्थापित किया था. उनकी मौत के बाद सोशल मीडिया पर देश-विदेश के लोगों द्वारा उनको श्रद्धांजलि देने का सिलसिला गुरुवार से ही चालू है. उनकी मौत से आहत छात्र,सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक और साहित्यकार से लेकर पत्रकार तक अपने दर्द को सार्वजनिक साझा कर रहे हैं. दैनिक भास्कर के बक्सर ब्यूरो चीफ मंगलेश कुमार तिवारी ने दिल झकझोरने वाली बातों को बेवाकी से फेसबुक पर पोस्ट किया है. उनकी लेखनी में बातों और तथ्यों का हक्कीकत सचमुच वर्तमान में सोचने पर मजबूर कर देता है कि उनकी मौत कहीं सजिशन हत्या तो नही ? सवाल कई हैं जो हम मनुष्यो की संवेदना पर भी सवाल है.  क्योंकि मौत तो एक बार ही होती है लेकिन डर कर जीना और घूँटन व दर्द में जीना हजारों बार मरना है.




मंगलेश तिवारी ने लिखा है कि जीतू कलसरा लिखित शेर ‘मौत को तो यूँ ही बदनाम करते हैं लोग, तकलीफ तो साली ज़िन्दगी अधिक देती है’ महान गणितज्ञ बाबू वशिष्ठ नारायण सिंह पर सटीक बैठती है. क्योंकि उन्होंने मौत से अधिक दुखदाई जिंदगी न सिर्फ देखी है, बल्कि उसे जीया भी हैं। जी हां! आईन्स्टीन के सिद्धांत ई=एमसी स्क़वायर और मैथ में रेयरेस्ट जीनियस कहे जाने वाले गॉस थ्योरी को चुनौती देने वाले गणितज्ञ डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह अब इस दुनियां में नहीं रहे. पटना के पीएमसीएच में लंबी बीमारी से लड़ते हुए उनके प्राण भले गुरुवार की सुबह निकले हों. लेकिन, उनकी हत्या तो पहले ही की जा चुकी थी. मेरे हिसाब से वशिष्ठ बाबु की यह चौथी मौत है. क्योंकि इसके पहले वे तीन मौतों का सामना कर चुके थे.
                              डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह को अगर ‘अभावों का आर्यभट्ट’ कहा जाय तो कोई आतिशयोक्ति नहीं होगी. वशिष्ठ बाबू इकलौते नहीं हैं जो इस तरह की मौत मर रहे हैं. बल्कि निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के उनके जैसे सैकड़ों वशिष्ठ रोज मर रहे हैं. हां! यह दीगर बात है कि डॉ. वशिष्ठ नारायण ने मारने की लाख कोशिशों के बावजूद इतने वर्षों तक जिंदा रहकर इस सड़ियल सिस्टम को आईना दिखा दिया. उन्होंने सिर्फ आईन्स्टीन या गॉस के सिद्धांतों को ही चुनौती नहीं दी. बल्कि उन्होंने उस सिद्धांत को भी जरूर एक तगड़ी चुनौती पेश की है जिसके आधार पर आज का परिवार चल रहा है. आज का समाज चल रहा है. यह पूरा सिस्टम चल रहा है. जिस सिद्धांत पर सरकार चल रही है. उन्होंने इस सिस्टम के जर्जर हो चुकी सोच को भी चुनौती दी है जहां सैद्धांतिक तौर पर मरे हुए लोग आज उनकी लाश पर राजनीति कर रहे हैं.

                            वैसे तो वशिष्ठ बाबू से मेरी दो बार की मुलाकात है. लेकिन, मैं उनको महसूसता रहा हूं हरदम. मुझे उनके दर्द को करीब से जानने का अवसर इसलिये मिला क्योंकि पत्रकारिता के सिलसिले में मैं उनके पास चार बार जाकर भी कुछ न तो लिख पाया, और न ही कुछ जानकारी निकाल पाया. उनसे मेरी पहली मुलाकात सम्भवतः 2006-07 के रमना मैदान में लगे पुस्तक मेले में हुई थी. वे आमंत्रित अतिथि थे और मैं शौकिया नौसिखुआ पत्रकार था. वे अधिकांश मौन ही रहते. मिलते ही मूक अभिवादन हुआ और मेरा सवाल कि 2 में 2 जोड़ने से क्या होगा? उन्होंने जवाब नहीं दिया. उठे, पॉकेट से कलम निकाली और मंच के पीछे लगे पर्दे पर लिखा 2+2 =0, हालांकि इसका अर्थ क्या था वे पूछने पर भी नहीं बताये. तब उनकी लिखते हुए तस्वीर कई अखबारों में छपी थी. बाकी के दो बार उनसे मुलाकात नहीं हो सकी थी.

                           एक बार की मुलाकात उनसे खेत मे हुई थी तब हमने पूछा था कि आप बहुत सुखी आदमी हैं. आपको कौन नहीं जानता इस धरती पर, आपने विश्व के सबसे बड़े वैज्ञानिक के सिद्धान्त को चुनौती देकर अपनी बात मनवाई है. एक बात बताईये आखिर आपके दर्द का आलम क्या है..? उन्होंने कहा था ना जाने क्यों जख्मों-चोटों से मोहब्बत सी हो गई है. ये होते हैं तो खुद के वजूद का एहसास होता है. वरना लोग जन्म लेते हैं. मर जाते हैं, पर कभी चैन से जख्मी होकर नहीं जी पाते! मैं जख्मी होकर जी रहा हूं। क्योंकि इस दर्द से हमें मोहब्बत है. अब सोचता हूं कि 2+2 ही जीरो नहीं था. उन महान गणितज्ञ के लिए यह पूरी दुनिया ही जीरो के समान थी.

                             हमने पहले भी कहा था कि मेरी नजर में वशिष्ठ बाबू की यह चौथी मौत है.इसे इस प्रकार से समझा जा सकता है. सबसे पहले उन्हें परिवार ने मारा. तब जब उनकी मर्जी के विरुद्ध शादी कर दी गयी. जानकार बताते हैं कि कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में उनकी डॉक्टरेट सलाहकार जॉन केली थे, शोध करते करते न जाने कब जॉन कैली की बेटी लेडी कैली से उन्हें इश्क़ हो गया. लेकिन बिहार के बसंतपुर गाँव में कुछ और ही माहौल था, पिता के चिट्ठी पहुंचते ही वशिष्ठ नारायण सिंह अमेरिका से वापस आये और 1973 में उनका विवाह वन्दना रानी के साथ संपन्न हुआ. प्रोफेसर डॉ. केली अपनी बेटी की शादी वशिष्ठ बाबू से करना चाहते थे. वशिष्ठ नारायण भी इसके लिए तैयार भी थे. लेकिन, उनके पिताजी ने इस रिश्ते से इनकार कर दिया और डीएसपी की बेटी से उनकी शादी कर दी. उक्त डीएसपी वशिष्ठ नारायण सिंह के पिताजी के सीनियर अफसर थे. वशिष्ठ बाबू के पिताजी पर उनके बड़े एहसान थे. इसलिए वशिष्ठ बाबू के पिताजी ने उनके सपनों का गला घोंट डीएसपी की बेटी के साथ शादी के बन्धन में बांध दिया. 1973 में शादी हुई और 1974 में उन्हें सिजोफ्रेनिया (एक तरह की मानसिक बीमारी) हो गयी. पत्नी से उनके रिश्ते ठीक नहीं रहे। घर में हमेशा होने वाले अनबन पर वशिष्ठ बाबू चुप्पी साध लेते थे.उन्हें कुछ ही दिनों बाद पत्नी ने तलाक दे दिया. इस तरह पिता, मां और पत्नी के अंतर्द्वंद में चल रहे शीतयुद्ध की चक्की में पिसते हुए एक महान गणितज्ञ का पहली निधन हो गया.

                        अब बारी आई सरकार की. उनके बड़े भाई रिटायर्ड मिलिट्री पर्सन ने उन्हें संभालने की भरसक कोशिश की. जितना कर सकते थे उतना किया.लेकिन, सरकार ने उस विलक्षण प्रतिभा के धनी वैज्ञानिक के लिये अपने दायित्व का निर्वहन नहीं किया. जिनकी वजह से विश्व पटल पर बिहार का नाम रोशन हुआ.जिनके बारे में ऐसा कहा जाता है कि नासा में अपोलो की लांचिंग से पहले जब 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए काम करना बंद कर दिए थे तब वशिष्ठ नारायण सिंह ने उंगली पर कैलकुलेशन शुरू कर दिया था और ताज्जुब तब हुआ जब कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर्स का कैलकुलेशन एक था. जब 1974 में ही उन्हें रांची के कांके स्थित मानसिक आरोग्यशाला में भर्ती कराया गया. जहां इलाज शुरू होने के बाद सरकार ने खर्च वहन करने का ऐलान किया. दो वर्षों तक खर्च दिया. लेकिन, उसके बाद सरकार अपने वादे से मुकर गयी और वक्त के मारे गणितज्ञ जिंदगी के हिसाब में फेल होने लगे. इस दौरान सरकार ने वशिष्ठ बाबू की दूसरी बार हत्या की. यहां वशिष्ठ बाबू जीते जी एकबार पुनः मर गए.

                    समाज की तरफ से पागल घोषित किये जाने के बाद वशिष्ठ नारायण सिंह लम्बे समय तक गुमनामी के अंधकार में चले गए. वर्ष 1998 से कई सालों तक गायब रहने के बाद वे बदहाली के हालत में छपरा के डोरीगंज में मिले. उनके परिचितों ने पहचाना.बिहार सरकार ने उन्हें इलाज के लिए बैंगलोर भेजा. लेकिन, ईलाज का खर्चा देना सरकार ने बंद कर दिया. उनके घरवाले बताते है कि अगर सही ढंग से इलाज कराया जाता तो उनके ठीक होने की संभावना थी, लेकिन गरीबी की मार और सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिलने के कारण वे बचाये नहीं जा सके. जईद आदमी ने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की नौकरी छोड़ अपने देश अपने समाज के लिए भारत में आकर यहां के कॉलेजों में नौकरी को प्राथमिकता दिया. उसके प्रति समाज का भी दायित्व बनता था. लेकिन, तब समाज ने भी उन्हें ठुकरा दिया. जब लोग उनके बारे में सुनते तो मिलने जाते और फिर उनके साथ एक तस्वीर क्लिक कर उसे सोशल मीडिया में डाल देते या अपनी प्रोफाइल के फाइल में चिपका कर खुद को गौरवान्वित महसूस करने के लिए रख लेते. लेकिन, कभी किसी संस्था, राजनीतिक दल या सामाजिक कार्यकर्ता ने उनके इलाज की पहल नहीं की. जो शख्स भारतीय सांख्यकीय संस्थान, कोलकाता, आईआईटी कानपुर, भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा व टीएफईआर बॉम्बे जैसे देश के ख्यातिलब्ध संस्थानों में नौकरी किया. उसे न तो उनके साथ पढ़ने वाले, न ही साथ पढ़ाने वाले, और न ही उनके साथ नौकरी करने वालों ने कभी उनके इलाज के बारे में पहल की. ऐसे में यही कहा जायेगा कि परिवार समाज और सरकार तीनों ने ही वशिष्ठ बाबू की मिलजुल कर हत्या कर डाली. तीनों ही अपनी जिम्मेदारी से मुकर गए. जिससे इस महान गणितज्ञ को गुमनामी के अंधेरे में अपनी जिंदगी की आखीरी सांस लेनी पड़ी.

आभार : ✍️मंगलेश मुफ़लिस
प्रस्तुति : ओ पी पांडेय