सोनपुर मेला आज से, एक बार फिर दिखेंगे हाथी

कभी साधु हाथी और पशु पक्षियों के मेले के रूप में दुनिया में था विख्यात अब थियेटरों के कारण जुटती है भीड़
यहां हुई थी ‘गज’ और ‘ग्राह’ की लड़ाई, भगवान विष्णु को करना पड़ा था हस्तक्षेप

सारण के सोनपुर में विश्व प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र मेला आज से शुरू हो रहा है. वर्ष 2003 में पशु-पक्षियों की बिक्री पर लगी रोक के बाद साल दर साल मेले की रौनक उजड़ती चली गई. कभी आठ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लगने वाला यह मेला राज्य सरकार की शिथिलता के कारण मात्र दो वर्ग किलोमीटर में सिमट गया है. लेकिन इस बार हाथियों को इस मेले में लाने की इजाजत दी गई है ताकि मेले की रौनक बनी रहे. लेकिन हाथियों की खरीद-बिक्री पर प्रतिबंध रहेगा.




कार्तिक पूर्णिमा के दिन से एक माह तक चलने वाला विश्व विख्यात हरिहर क्षेत्र (सोनपुर मेला ) अब अपने अस्तित्व की जद्दोजहद की लड़ाई लड़ रहा है. गंगा गंडक के संगम पर हरिहर नाथ बाबा को जल अर्पण करने के साथ इस मेले की शुरुआत होती है. पुरातन काल में यही संगम स्थल पर कभी ग्राह से गजराज की जान बचाने स्वर्गलोक से स्वयं हरि धरा पर उतर आए थे तब से यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता चला आ रहा है. मेले को लेकर एक पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है. मान्यता है कि भगवान के दो भक्त हाथी (गज) और मगरमच्छ (ग्राह) के रूप में धरती पर उत्पन्न हुए. कोणाहारा घाट पर जब गज पानी पीने आया तो उसे ग्राह ने मुंह में जकड़ लिया और दोनों में युद्ध शुरू हो गया. कई दिनों तक युद्ध चलता रहा. इस बीच गज जब कमजोर पड़ने लगा तो उसने भगवान विष्णु से प्रार्थना की. भगवान विष्णु ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन सुदर्शन चक्र चलाकर दोनों के युद्ध को खत्म कराया.
इस मेले के इतिहास के विषय में यह भी कहा जाता है कि इस मेले में चंद्रगुप्त मौर्य सेना के लिए हाथी खरीदने के लिए यहां आते थे. स्वतंत्रता आंदोलन में भी सोनपुर मेला क्रांतिकारियों के लिए पशुओं की खरीदारी के उद्देश्य से पहली पसंद रहा.
मेला कब से लगता है इसका तो कोई प्रमाण नहीं है. स्थानीय लोगों की मानें तो आजादी के पहले से ही इस मेले का अस्तित्व रहा है. बिहार की राजधानी पटना से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर सारण जिले के सोनपुर में यह मेला लगता है. हाथियों के मेले के रूप में पूरे विश्व में मेले की पहचान थी. ऐतिहासिक गजग्राह युद्ध की भूमि सोनपुर में विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेला अब पशु मेला की जगह थियेटर मेला बन गया है. अंग्रेजों के जमाने में हथुआ, बेतिया, टेकारी तथा दरभंगा महाराज की तरफ से सोनपुर मेला के अंग्रेजी बाजार में नुमाइशें लगाई जाती थीं. नुमाइशों में कश्मीर, अफगानिस्तान, ईरान, मैनचेस्टर से बने बेशकीमती कपड़े एवं अन्य बहुमूल्य सामग्रियों की खरीद-बिक्री होती थी. इन बहुमूल्य सामग्रियों में सोने, चांदी, हीरों और हाथी के दांत की बनी वस्तुएं तथा दुर्लभ पशु-पक्षी का बाजार लगता था.सारण और वैशाली जिले की सीमा पर लगने वाले इस मेले की प्रसिद्धि यूं तो सबसे बड़े पशु मेले की है, मगर इस मेले में आमतौर पर सभी प्रकार के सामान मिलते हैं. मेले में जहां देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोग पशुओं की खरीद-बिक्री के लिए पहुंचते हैं, वहीं विदेशी सैलानी भी यहां खिंचे चले आते हैं.बिहार में गंगा और गंडक नदी के संगम पर ऐतिहासिक, धार्मिक और पौराणिक महत्व वाला सोनपुर मेला एक महीना चलता है. विश्व प्रसिद्ध इस मेले को ‘हरिहर क्षेत्र मेला’ अैर ‘छत्तर मेला’ के नाम से भी जाना जाता है.

दो दशक पहले हाजीपुर के कोनहारा घाट से सारण के पहलेजा घाट तक फैले सोनपुर मेला घूमने में पर्यटकों को तीन से चार दिन लग जाते थे. हर साल हजारों विदेश पर्यटक मेला देखने आते थे. अब पांच से छः घंटे में सोनपुर मेला देखने का कोरम पूरा हो जाता है. सिर्फ कार्तिक पूर्णिमा स्नान के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश से जुटने वाले लाखों के भीड़ ही इस मेले को एहसास कराती है कि अब भी मेला जिंदा है.
पंजाब की गाय-बैल, आसाम और पश्चिम बंगाल की भैंस और उत्तर भारत के कई राज्यों के घोड़े और हाथी से कभी सोनपुर मेला गुलजार होता था. अब सिर्फ सारण जिले के कुछ लोग गाय और घोड़ा का बाजार लगाते हैं.
नब्बे के दशक में सोनपुर के बड़े जमींदारों में गिने जाने वाले बच्चा बाबू का घोड़ा, हाथी, शेर, बाघ, पशु-पक्षी सोनपुर मेला के आकर्षण का बड़ा केंद्र होता था.
सोनपुर मेले में हाथियों की बिक्री बंद होने के बाद कारोबारियों का क्रेज कम होता चला गया. 2007 के मेले में कारोबारी 77 हाथी लेकर मेले में पहुंचे जो 2014 में घटकर 39 हो गया. 2015 में 17, 2016 में 13 और 2017 में सिर्फ तीन हाथी मेले में दिखाई दिए. 2018 में केवल अनंत सिंह की हथिनी मेले में थी.

खेती की बदली शैली और कृषि आधुनिकीकरण (ट्रैक्टर हार्वेस्टर) ने कभी 35 हजार बैल बेचने वाले सोनपुर मेले में अब महज 100 से 150 बैल आ रहे हैं, वह भी सिर्फ कोरम के नाम पर. भैसों की बुकिंग पर रोक से भैंस बाजार भी खत्म सा हो गया है. हाथी की बिक्री बंद होने के बाद स्थानीय लोग दो से तीन हाथी सिर्फ दिखाने के लिए बाजार में रखते हैं. पशु बाजार के नाम पर विख्यात इस मेले में अब सिर्फ गाय, घोड़े और कुत्ते का बाजार लग रहा है.

पिछले दो वर्षों से पर्यावरण एवं वन विभाग की कड़ाई के कारण पक्षियों का बाजार करीब-करीब खत्म हो गया. लुधियाना और दिल्ली से गर्म कपड़े लाकर बेचने वाले ही अब इस बाजार में बच गए हैं. रात में सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर थियेटर देखने वालों की भीड़ इस मेले में जुटती है. आज का सोनपुर मेला बस यही है.

सोनपुर मेले के अस्तित्व को बचाने के लिए आवाज उठा रहे स्थानीय विधायक
सारण के सांसद राजीव प्रताप रूढ़ी मेले के अस्तित्व को बचाने के लिए वर्षों से लड़ाई लड़ रहे हैं. उनका मानना है कि अगर सोनपुर को किसानों के प्रशिक्षण का राजस्तरीय केंद्र, कृषि उपकरणों का राष्ट्र स्तरीय बाजार और एग्रोप्रोसेस्ड इंडस्ट्री का केंद्र बनाया जाए तो फिर से सोनपुर मेला अपने ऐतिहासिक मुकाम पर पहुंच सकता है. वो सोनपुर मेला को ऑटोमोबाइल बाजार का भी केंद्र बनाने के पक्षधर हैं. चूंकि, बिहार की 75 से 80 फीसदी आबादी कृषि से जुड़ी हुई है और बिहार के आम, लीची, मकई, मखाना, केला पूरे देश में प्रसिद्ध हैं ऐसे में सोनपुर मेला को कृषि से जुड़ी उत्पादों का बाजार बनाया जाए तो सोनपुर मेला फिर से गुलजार हो उठेगा.

तवायफो के तंबू से थिएटर तक
जानकारी के मुताबिक आजादी के पहले इस मेले में राजवाड़ो और जमींदारों के तरफ से तवायफों के तंबू लगाए जाते थे. जिनकी तरफ से सबसे ज्यादा तंबू लगाए जाते थे उन्हें सबसे बड़ा रईस माना जाता था. लेकिन बाद में धीरे-धीरे तवायफ की तंबू की जगह थिएटर मंडलियों ने ली. अब तो बड़ी संख्या में लोग थियेटर देखने के लिए ही सोनपुर मेला पहुंचते हैं.

सोनपुर से अजीत की रिपोर्ट