सॉयल हेल्थ कार्ड – भोजपुर में क्या है हकीकत!

“सॉयल हेल्थ यानि मृदा स्वास्थ्य कार्ड”- बनता या बिगड़ता मिट्टी का हेल्थ ? 
विभाग ने कहा- पिछले साल लगभग 20000 किसानों को बाँटा गया “सॉयल हेल्थ कार्ड”
किसानों ने कहा- हमें नहीं पता क्या है सॉयल हेल्थ कार्ड
आरा (ओ पी पांडेय और अपूर्वा की रिपोर्ट) 23 फरवरी । एक तरफ सरकार किसानों को सुदृढ और आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही हैं तो दूसरी ओर किसानों को ये योजनाएं बताने वाला कोई नही है. भोजपुर के किसानों को सॉयल हेल्थ कार्ड यानि मृदा स्वास्थ्य कार्ड के बारे में कोई जानकारी नही है. पटना नाउ ने कई गॉवो के किसानों से जाना कि कितने किसान लाभान्वित हैं इस कार्ड से. एक खास रिपोर्ट….
विश्वनाथ, किसान,बड़का गॉंव
मिंटू कुमार, किसान, पकड़िया बर

कड़ी मेहनत से अनाज उपजा उससे जीविका चलाने वाला किसान सरकार से मदद की उम्मीद लगाए रहता है और हर बार वो यही सपना देखता है कि आने वाली सरकार उसकी आर्थिक तंगी दूर कर देगी. किसानों के अनाज उठाव से लेकर उसके रख-रखाव में मदद करेगी. क्योंकि मौजूदा हालात में मेहनत के बावजूद भी उन्हें उतना लाभ नही हो पाता है. पकड़िया बर गांव के मटर की खेती करने वाले किसान मिंटू कुमार,बड़का गॉंव के गेहूं की खेती करने वाले किसान विश्वनाथ और चौकीपुर गॉंव के किसान सुरेश ने बताया कि उन्हें ऐसे किसी कार्ड की योजना की जानकारी नही है. किसान सलाहकार कभी गॉंव आते ही नही.

सरकार भी हर बार किसानों के लिए तरह-तरह की स्कीम निकालती है. इसी कड़ी में किसानों के लिए 2015 में सरकार ने सॉयल हेल्थ कार्ड की योजना लागू हुई. स्कीम चलाये भी जाये हैं और उनसे लाभान्वित होने वालों के आंकड़े भी सरकारी कार्यालयों के रजिस्टर में दर्ज हो जाते हैं. लेकिन हकीकत यह है कि ऐसे स्कीमों से लाभुकों की संख्या गिनती भर ही होती है. भोजपुर के किसानो को कृषि विभाग या कृषि सलाहकारों से सॉयल हेल्थ कार्ड के बारे में कोई जानकारी कभी नही मिलती है. किसानों की माने तो कृषि सलाहकार कभी आते ही नही.

पटना नाउ ने किसानों से जब यह सवाल किया कि अगर किसानों तक ये जानकारी नही पहुंचती तो किसान क्यों नही कृषि विभाग तक पहुँचते? इस




सुरेश, किसान, चौकीपुर

सवाल के जवाब में किसानो ने बताया कि कृषि नॉन-प्रॉफिट व्यवसाय है. ऐसे में जिला मुख्यालय आकर जानकारी लेना उनके घाटे का सौदा होता है क्योंकि आने-जाने में जो रकम खर्च होती है उसकी पूर्ति करना उनके लिए बड़ी बात होती है. वही कृषि विभाग में कार्यरत लैब असिस्टेंट उपेन्द्र सिंह के अनुसार जागरूक किसान मिट्टी के नमूने लेकर जांच के लिए आते हैं.

उमेश साहू, ARO, मृदा जांच प्रयोगशाला, कृषि विभाग आरा

इधर कृषि विभाग के अधिकारी और तकनीकी काम करने वाले लोगों का कहना है कि हर वर्ष 5 दिसम्बर को मृदा दिवस के मौके पर सॉयल हेल्थ कार्ड को कैम्प लगा कर  किसानों को बांट दिया जाता है. कृषि विभाग के मिट्टी जाँच प्रयोगशाला के ARO उमेश साहू ने बताया कि सॉयल हेल्थ कार्ड का सलेक्शन एक ग्रिड पद्धति द्वारा किया जाता है. जिसमे सिंचित भूमि के लिए 2.5 हेक्टेयर भूमि को 1 ग्रिड और असिंचित भूमि के लिए 10 हेक्टेयर भूमि को 1 ग्रिड माना जाता है. विभाग अपने जांच के दौरान यह ग्रिड तय करती है. विभाग इन ग्रिडों में पडने वाली भूमि मालिको को सॉयल हेल्थ कार्ड मिट्टी के नमूनों के जांच के बाद प्रदान करती है. यहां खुद से भी किसानों द्वारा लाये गए मिट्टियों की जांच की जाती है. लेकिन ऐसे किसानों को सॉयल हेल्थ कार्ड प्रदान नही किया जाता. कृषि विभाग के अनुसार लगभग 20,000 किसानों को ये कार्ड 5 दिसम्बर 2017 को बांट गए थे.

क्या है मृदा स्वास्थ्य कार्ड ?
मृदा स्वास्थ्य कार्ड, मृदा के स्वास्थ्य से सम्बंधित सूचकों और उनसे जुडी शर्तों को प्रदर्शित करता है. ये सूचक स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के सम्बन्ध में किसानों के व्यावहारिक अनुभवों और ज्ञान पर आधारित होते है. इसमें फसल के अनुसार, उर्वरकों  के प्रयोग तथा  मात्रा का संक्षिप्त ब्यौरा प्रस्तुत किया जाता है, ताकि भविष्य में किसान को मृदा की गुणवत्ता सम्बन्धी परेशानियों का सामना नहीं करना पड़े और फसल उत्पादन में भी कमी नहीं हो.
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के लाभ
किसानों को अपने खेत की मिट्टी के स्वास्थ्य के बारे में सही जानकारी मिलेगी.
इससे किसान मनचाहे अनाज/फसल उत्पादन कर पाएंगे.
हर 3 वर्ष में यह कार्ड प्रदान दिया जाएगा जिससे किसान  अपने खेत की मिट्टी के बदलाव के बारे में भी बीच-बीच में जान पाएंगे
किसानों को अच्छी फसल उगाने में मदद मिलेगी.
कितनी सफल रही यह योजना?
फरवरी 2015 में योजना की शुरुआत के बाद प्रथम चरण में 84 लाख किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरण का लक्ष्य रखा गया था लेकिन जुलाई 2015 तक केवल 34 लाख किसानों को ही मृदा स्वास्थ्य कार्ड प्रदान किया गया. देश के सभी राज्यों में मृदा स्वास्थ्य कार्ड प्रदान करने  में आंध्र प्रदेश सबसे आगे है. तमिलनाडु और पंजाब दो अन्य राज्य है जिनमे खरीफ में सबसे अधिक संख्या में मृदा परीक्षण के लिए मृदा नमूने एकत्रित किये. यद्यपि, तमिलनाडु में अभी तक मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरित नहीं किये गए. उत्तर प्रदेश, पंजाब, छत्तीसगढ़, तेलगाना और ओडिसा मृदा स्वास्थ्य कार्ड के वितरण एवं आवंटन में अन्य अग्रणी राज्य है. हरियाणा, केरल, मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश,सिक्किम,गोवा तथा पश्चिमी बंगाल आदि राज्यों के किसानों को 2015-16 के लक्ष्य के हिसाब से कम मृदा स्वास्थ्य कार्ड प्रदान किये गए.
उपेन्द्र सिंह, लैब असिस्टेंट, मृदा जांच प्रयोगशाला(कृषि विभाग आरा)

मृदा स्वास्थ्य कार्ड के लिए वेब  पोर्टल भी तैयार किया गया है जहां सभी जानकारी कोई भी ग्रहण कर सकता है. कोई भी व्यक्ति के लिए इस पोर्टल – www.soilhealth.dac.gov.in  पर जानकारी ले सकता है. भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद द्वारा विकसित इस सिस्टम का मुख्य उद्देश्य मृदा परीक्षण-फसल प्रणाली प्रत्युत्तर (STCR) फॉर्मूले अथवा राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध सामान्य उर्वरक सुझावों के आधार पर स्वत: मृदा स्वास्थ्य कार्ड तैयार करना है.

दावे अजीब हैं. यही नही पूरे देश की यदि बात करें तो सॉयल हेल्थ कार्ड 10 करोड़ किसानों को बाँटे गए हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या इस देश मे 10 करोड़ ही किसान है? कृषि विकास और किसानों के समृद्धि की योजना ढाक के तीन पात है. अधिकारी कार्ड बांटने के दावे कर रहे हैं और किसान कार्ड मिलना तो दूर उसके बारे में जानते तक नही हैं. मतलब साफ है कि टीवी, अखबार,सोशल मीडिया और सरकारी तकनीकों के जरिये भले ही किसानों तक योजनाएं पहुचाने के दावे हो रहे हों लेकिन अभी भी किसान तक योजनाएं नही पहुंच पा रही है. अब कृषि विभाग के अधिकारी तो अपना काम कर जाते हैं, मिट्टी की जांच भी होती है लेकिन किसानों तक बात पहुँचाने वाले ही डंडी मार जाते हैं. इसमें सबसे ज्यादा दोषी तो कृषि सलाहकार हैं, जो गांव में किसानों को इन योजनाओं से रूबरू नही करा पाते हैं वहीं अशिक्षित किसानों के लिए ये योजनाएं काली अक्षर भैंस बराबर.
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