सारा साउंड प्रकृति में है- संजय उपाध्याय

“कारंत कहते थे तानपुरा नही कानपुरा बनें ध्यान से सुनें”

रायपुर में आयोजित हुआ संगीत कार्यशाला 




रायपुर . प्रकृति साऊंड का सबसे बड़ा श्रोत है. प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले साऊंड का उपयोग कर नाटक को स्वाभाविक बनाया जा सकता है. इसके अलावा मशीनी आवाज, हृयुमन वाइस भी बहुत इमापारटेंट है नाट्य संगीत में.सबसे जरूरी है सुनना. आज नाट्य संगीत पर बोलते हुए मप्र नाट्य विद्यालय के निर्देशक संजय उपाध्याय ने प्रशिक्षणार्थियों को विस्तार से नाट्य संगीत की नाटक में उपयोगिता की व्याख्या करते हुए समझाया.

उन्होंने कहा टिंबर साऊड, एनिमल साऊन्ड, पक्षियों की आवाजें, कीट-पतंगों मच्छरों, मेढकों की आवाजें ये सब अलग-अलग हैं, इन्हें सुनें महसूस करें .यह कच्चा माल है नाटक में वातावरण का निर्माण करने मे इस साऊन्ड से सहायता मिलती है. यह सब नाट्य संगीत की अमूल्य संपत्ति है.यह सब आपके कान में संग्रहित रखें, इन आवाजों को ध्यान से सुनने की आदत डालें .इसके अलावा बाजार, रेल्वे स्टेशन, मंदिर, बस स्टैन्ड, चर्च, मस्जिद, खेल का मैदान के एबियंस साऊंड, इसी तरह त्यौहारों के अलग-अलग साऊंड हैं .हमारे आसपास इतनी विविधता भरी आवाजें हैं यह हमारी संपत्ति है इसे ध्यान रखें और नाटक में उपयोग करें. जुलूस की आवाजें, सब पार्टी के नारे साऊन्ड सब अलग-अलग है इसके फर्क को समझें.

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रंग संगीत कई तरीके का होता है. इट्रोडक्शन म्युजिक जिसमें ड्रामा के मूड को बताया जाता है . ट्रांजिशन म्युजिक, मूड म्युजिक, इटरप्रटेटिव्ह म्युजिक, लिटरल म्युजिक यह कलाकार के मुव्वमेंट पर बजता है. सिग्नेचर म्युजिक नाट्यशास्त्र में इसे ध्रूवा ज्ञान भी कहा जाता है जो खास कलाकार के आने की सूचना देता है. रिप्रजेन्टेशनल म्युजिक हम नाटक के मूड के अनुसार वाद्य यंत्रों का चयन करते हैं.

हर वाद्ययंत्र अलग वातावरण का निर्माण करते हैं. लोक नाट्य में हर प्रदेश के अलग-अलग वाद्ययंत्र हैं .उनका संगीत सुनकर आप बता सकते हैं किस प्रदेश का है बाबा कारंत कहते थे तानपुरा न हों पर कानपुरा होना जरूरी है.

सारा साऊंड प्रकृति में है.आपने सुना है और कान में कैद कर लिया है यह नाटक में विविधता पैदा करने में आपको सहायता करेगा.जिस मूड का नाटक हो उस परंपरा का वाद्ययंत्र नाटक में इस्तेमाल करें .समय का माहौल क्रिएट करने नए साऊड इस्तेमाल करें.शिफ्टिंग म्युजिक सीन चेंज के लिए या मूड चेंज के लिए इस्तेमाल करना चाहिए. ग्रांड फिनाले म्युजिक इसमें कलाकारों का परिचय होता है.लोक संगीत या संगीत नाटक में गा कर भी कहानी कहते हैं .इसमें पहला है आलाप दूसरा है विलाप यह बड़ा जरूरी है.अभिनय को सशक्त करने के लिए नाटक के भावप्रद बनाने के लिए ही संगीत है.संगीत से नाटक में रस पैदा होता है बिना संगीत के नाटक रसहीन लगेगा.

उन्होंने कहा साइलेंस में बहुत सी बातें कही जा सकती है. कहा जाता है जहाँ चुप्पी है वहाँ संगीत होता है . इसलिए जहाँ आवश्यक हो तो चुप्पी भी जरूरी है. नाटक को रोचक बनाने के लिए संगीत है. नाटक के नौ रस हैं उनमें से संगीत भी एक रस है. उक्त जानकारी देते हुए छत्तीसगढ़ फिल्म एण्ड विजुअल आर्ट सोसायटी से योग मिश्र ने बताया कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली के “रंगमंच रसास्वादन पाठ्यक्रम के अंतर्गत, छत्तीसगढ़ फिल्म एण्ड  विजुअल आर्ट सोसायटी द्वारा संस्कृति विभाग रायपुर के सहयोग से आयोजित थिएटर एप्रिशिएशन कोर्स में रंग संगीत पर आयोजित विशेष सत्र में संजय उपाध्याय ने प्रशिक्षार्थियों के साथ हारमोनियम के साथ एक प्रायोगिक उदाहरण प्रस्तुत कर रंग संगीत की बारीकियों से परिचय कराया और सुर-ताल की स्वर लहरी में अपने साथ-साथ बहा ले गए.इस अवसर पर कई गणमान्य अध्यापकों के साथ नाट्य और फिल्म समीक्षक अजित राय भी उपस्थित थे.

रिपोर्ट -रायपुर से करुणा चौहान सिद्दी