जियो ने संचार मंत्री को भेजा पत्र | लिखा, इससे बुरी मिसाल होगी कायम

नई दिल्ली (ब्यूरो रिपोर्ट) | रिलायंस जियो ने दूरसंचार क्षेत्र में एक समान स्तरीय प्रतिस्पर्धा का माहौल बनाए रखने के लिए अपनी लड़ाई जारी रखा है. जियो ने दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद को पत्र लिखा है. इस पत्र में भारती एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया के लिए वैधानिक तौर पर बीते 14 सालों से बकाया राशि का भुगतान ना करने को लेकर दंडात्मक कार्रवाई को अमल में ना लाए जाने के कदम को जियो ने अनुचित ‘वित्तीय लाभ’ दिए जाना करार दिया है. जियो के अनुसार इस कदम से ना सिर्फ उच्चतम न्यायालय के हाल के फैसले का उल्लंघन किया जा रहा है बल्कि इससे कंपनियों के लिए गलत मिसाल भी कायम हो रही है.
जियो ने कहा है कि इसके 2016 में लॉन्च होने के बाद से मोबाइल फोन पर मुफ्त कॉल और बेहद सस्ते डेटा की पेशकश ने भारत को दुनिया में सबसे कम दूरसंचार दरों वाला देश बनाने में मदद की है. जियो ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने 24 अक्टूबर के आदेश में स्पष्ट रूप से इस आधार पर मामले का निपटान किया है कि दूरसंचार लाइसेंस शुल्क और स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क जैसे लेवी का भुगतान करना होगा और पिछले 14 वर्षों की देय राशि पर ब्याज और जुर्माना माफ करना फैसले का उल्लंघन होगा.
जियो के 1 नवंबर को लिखे गए पत्र के अनुसार ‘‘निर्णय दूरसंचार विभाग (डीओटी) की ओर से इस आशय की रिपोर्ट दर्ज करता है कि पार्टियों के बीच अनुबंध के अनुसार ब्याज और जुर्माना सख्ती से लगाया जा रहा है और इसमें निहित ब्याज और जुर्माना प्रावधानों में कोई कमी, संशोधन या परिवर्तन किया गया है. लाइसेंस समझौते पर समझौते को फिर से लिखने की क्षमता होगी. इस विवाद को माननीय न्यायालय ने स्वीकार किया है.’’
विदित है, सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अक्टूबर डीओटी के इस फैसले को बरकरार रखा था कि गैर-दूरसंचार राजस्व वार्षिक समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) का हिस्सा होना चाहिए – जिसका एक प्रतिशत सरकार को सांविधिक देय के रूप में भुगतान किया जाता है.
1.4 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित देनदारियों के साथ, एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया, दूरसंचार क्षेत्र की एसोसिएशन सीओएआई के माध्यम से, विलंबित भुगतानों पर कम से कम जुर्माना और ब्याज की माफी की मांग कर रहे हैं, जो कि कुल छूट का लगभग आधे हिस्सा बनता है. ये एक तरह से अतीत की सभी देनदारियों की पूरी तरह से माफी या छूट है.
जियो ने कहा कि अपनी स्थिति को दोहराते हुए कि टेलीकॉम कंपनियों के पास देयता को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं. पत्र में जियो ने कहा कि भारती एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया जैसी कंपनियों ने एक बड़ा बोनान्जा तब प्राप्त किया था जब वे लगभग दो दशक पहले सांविधिक देय राशि का भुगतान करने के लिए एक राजस्व शेयर पद्धति में चले गए थे और ऐसे में बिना किसी प्रावधान के अतीत के किसी भी बकाए को अब ऐसे ही माफ नहीं किया जाना चाहिए.
जियो ने कहा है कि ‘‘ब्याज और जुर्माना लगाने से संबंधित मुद्दे पर विचार करते समय, निर्णय विस्तृत तर्क से संबंधित होता है जो कुछ कारणों के लिए समय-समय पर विभिन्न मंचों में दूरसंचार सेवा प्रदाताओं (टीएसपी) के उदाहरण पर उठाए गए कई कार्यवाहियों की पेंडेंसी को कवर करता है और निष्कर्ष निकालता है.
यह कहते हुए कि सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार कहा है कि स्पेक्ट्रम एक परिमित और कीमती प्राकृतिक संसाधन है, जियो ने कहा कि ‘‘भारत सरकार की ओर से किसी भी कार्रवाई को अनपेक्षित बकाए पर ब्याज और दंड से संबंधित संविदात्मक प्रावधानों को संशोधित करने या माफ करने के लिए कानूनी रूप से देय नहीं होगा.’’ विशेष रूप से जब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में विशेष रूप से निपटा गया है.
अदालत ने कहा कि ‘‘न्यायालय के फैसले से उत्पन्न होने वाले लाइसेंसधारियों की वित्तीय देयता में कोई भी कमी, उनके उचित बकाए के भुगतान में देरी के लिए तुच्छ और जबरदस्त कार्यवाही शुरू करने में उनके आचरण के लिए उन्हें पुरस्कृत करेगी. छूट के किसी भी प्रस्ताव को सरकारी खजाने को नुकसान और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विपरीत माना जाएगा.’’
जियो के इस पत्र में कहा गया है कि ‘‘मामले की पृष्ठभूमि को देखते हुए, हमारा मानना है कि सरकार के पास सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ जाने का विकल्प नहीं है और सीओएआई द्वारा मांगी गई किसी भी राहत को कानूनी तथ्यों के सादा पढ़ने के बाद भी प्रदान ना किए जाने का आधार प्रदान करता है.’’