सिविल कोर्ट कर्मियों के 46 दिनों के जज्बे को सलाम!

रियल लाइफ के नायक हैं ये सरकारी कर्मी
गरीबों और जरूरतमन्दों को मुफ्त बाँटा डेढ़ महीने तक भोजन

आरा,17 मई. आमतौर पर कोर्ट का नाम सुनते ही लोगों में खुशी से ज्यादा मायूसी छा जाती है. क्योंकि तारीख की हाजरी में सुख चुकी अधिकांश आँखे न्याय नही पाती हैं. बस इंसाफ की आशा लिए कोर्ट का चक्कर काटती हैं. ये एक आम तस्वीर है जिसे जनता मसहूस करती है लेकिन वैश्विक महामारी के दौरान आरा के सिविल कोर्ट कर्मियों ने मिलकर ऐसा काम किया जिसने न सिर्फ लोगों की अवधारणा बदल दी बल्कि वे लोगों के लिए रियल लाइफ के नायक बन गए.




एक रिपोर्ट :-

इंसान का बेसिक जरूरत है भोजन और वैश्विक महामारी चीनी वायरस कोरोना ने लोगों के भोजन पर ही आफत ला दिया. सबसे ज्यादा प्रभावित मेहनतकशों का वर्ग हुआ जो दिहाड़ी मजदूरी से दो वक्त का भोजन जुटाता था. लॉक डाउन के बाद सुनी सड़को पर न तो कोई दुकान खुला था और न ही कोई छोटी-बड़ी औद्योगिक इकाईयां जहाँ मजदूर वर्ग काम कर अपने भोजन की जुगाड़ कर सके. जी हाँ, ऐसे कठिन और मुश्किल दौर में सिविल कोर्ट कर्मियों के हाथ जो मदद के लिए उठे, परोपकार के लिए डेढ़ महीने तक निःस्वार्थ भाव से डटे रहे. लगभग 300 लोगों को रोज फ्री भोजन कराते रहे. इस बीच सोशल डिस्टेंस का पालन भी होता रहा ताकि किसी को महामारी का खतरा न रहे. सप्ताह में 3 दिन दुकानों के खुलने की घोषणा के बाद भी परोपकार का यह सिलसिला चलता रहा. जब बाजारों में हर तरफ आवागमन तेज हो गई तो 46 दिनों के बाद इस नेक काम को विराम दिया गया.

कैसे बना कारवाँ?
कोरोना के संक्रमण के कारण लॉकडाउन में कोई किसी राज्य में तो कोई किसी दूसरे शहरों में फँस गया. हर जगह बिगड़ती हालातों ने मानव के अंदर परोपकार की बैठी भावना स्वाभाविक तौर पर बाहर आ गयी. लॉकडाउन के बाद लोगों की समस्याओं का जब ध्यान आया तो युवा कर्मचारियों ने एक दिन भूखे लोगों को खाना खिलाने का प्लान किया. सिविल कोर्ट में कार्यरत उज्ज्वल नारायण और उनके साथियों ने इसे धारातल पर लाने के लिए चर्चा की.

इधर लॉकडाउन से पहले सदर अस्पताल के सामने पास्ता का दुकान चलाने वाले ज्ञान कुमार पांडेय जिनका दुकान लॉक डाउन की वजह से बंद हो गया था वे भी अपने साथियों के साथ मिलकर दो रोज जरूरतमन्दों को भोजन खिलाने का प्लान बना चुके थे.
उज्ज्वल और ज्ञान बचपन के मित्र थे तो इस बात पर चर्चा हुई. चुकि दोनों का लक्ष्य एक था तो जब इस नेक काम के बारे में ज्ञान ने सुना तो उसने खाना बनाने का जिम्मा अपने दुकान के चंद कर्मचारियों के संग ले लिया और 2 अप्रैल को सदर अस्पताल के सामने ही सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए फ्री भोजन का वितरण शुरू कर किया. ज्ञान का 2 दिनों का प्लान और सिविल कोर्ट कर्मियों का भी 1-2 दिन का ही प्लान था इस नेक काम के लिए. फिर शुरू हो गया यह सिलसिला.

जिला जज की बड़ी रही भूमिका
चन्द दिनों के भोजन बाँटने के इस जज्बे और फैसले की सूचना जब जिला न्यायाधीश फूलचंद चौधरी को मिली तो उन्होंने इस कार्य को प्रोत्साहित करते हुए इसे रेगुलर चालू रखने के लिए कहा. चुकि सहयोग सभी को अपनी जेब से करना था कोई सरकारी फंड नही था इसलिए चन्द संवेदनशील सिविलकर्मियों के सहयोग से ज्यादा दिनों तक यह बोझ नही उठ पाता. लेकिन जिला जज के प्रोत्साहन के बाद सिविल कोर्ट के कर्मियों ने बढ़ चढ़कर अपनी भूमिका निभाई और भूखों को भोजन देने का कार्य प्रारंभ होने के बाद कुछ अन्य सामाजिक लोगों ने भी सहयोग देना शुरू किया. जिला जज व उनकी पत्नी ने भी इस दौरान कई बार उक्त स्थल पर आ भूखों को भोजन बाँटा और मानव सेवा में लगे लोगों का हौसला भी बढ़ाया.

उत्तम कोटि का भोजन कराया गया मुहैया

खाना भले ही कोई खाये लेकिन कभी भी स्वाद या रिपीट मेन्यू नही चलाया गया. यहाँ हर रोज मेन्यू चेंज कर राहगीरों, ठेलेवालों, रिक्शेवाले, व गरीबों के साथ उन सभी को खिलाया जाता जो कोरोना संकट के इस दौर में एक जगह से, दूसरे जगह जा रहे थे. सदर अस्पताल के ठीक सामने यह भोजन व्यवस्था होने की वजह से हालांकि बीच में 2 दिन भोजन वितरण का कार्य जिले में कोरोना के मरीजों की संख्या में हुई अचानक बढ़ोतरी के बाद स्थगित भी किया गया. लेकिन पुनः सेफ्टी के साथ कार्यकर्ता डट गए ताकि भूखों को भोजन लगातार मिलता रहे.

ऐसे होता था कार्य
*इस कार्य मे लगभग 15 लोगों की टीम सोशल डिस्टेंसिग का ख्याल रखती थी.
*खाना बनाने से लेकर खिलाने तक का काम सदस्यों में बंटा हुआ था.खाना बनाने में ज्ञान कुमार पांडेय, अजय मिश्रा, ध्यानु, ज्ञानू सिन्हा सहयोग करते थे. यहाँ तक कि ज्ञान पांडेय की माँ लीलावती पांडेय व पिता जीतन पांडेय का भी भरपूर सहयोग मिलता था. पिता तो बाजार से सामान तक खरीद कर उपलब्ध कराते थे. वही अजय मिश्रा की पत्नी गुड़िया मिश्रा व उनकी सास किशुन कुमारी का भी अतुलनीय योगदान खाना बनाने में रहा. रातभर वे खाना बनाने की तैयारी में जुटे रहते.
*10 बजे तक भोजन वितरण से पूर्व भोजन खिलाने वाले खास सदस्य उज्ज्वल व सुशील के साथ मिलकर सभी जरूरत मन्दो को 1 मीटर की दूरी पर खड़ा करते
*भोजन वितरण हाथ मे ग्लब्स और मास्क लगा कर किया जाता था.

टीम में ये थे शामिल:
महामारी के इस दौर में लोगों के बीच अपनी संवेदनशीलता के ज़रिए नायकत्व को पाने वाले रियल लाईफ़ के नायकों में शामिल थे सिविल कोर्ट के क्लर्क सुधाकर चौबे, सुशील राय, संदीप, सौरभ, जितेंद्र, सन्तोष गिरी, विनय, उमेश दुबे,अनिल कुमार, रवि, मानस रंजन, प्रवीण और आशुतोष.

पिछले 46 दिनों से चलने वाले इस भोजन वितरण का कार्यक्रम आज भले ही समाप्त हो गया लेकिन छोड़ गया इन अमिट नामों की ऐसी दास्ताँ जिसे सदियों तक उन भूखे आत्माओं की दुआ मिलेगी जिन्होंने इनके जज्बे को खुद से देखा था. ऐसे रियल नायको को पटना नाउ की टीम का भी सलाम!

आरा से ओ पी पांडेय की रिपोर्ट