क्या आप जानते हैं भोजपुर के इस संगीत शिरोमणि को ?

शख्सियत (आरा)
संगीत शिरोमणि, संगीत प्रवीण स्व० अखौरी नागेंद्र नारायण सिन्हा उर्फ नंदन जी

आरा की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि –




आरा की पावन भूमि पर साहित्य – संगीत की निर्मल धारा हमेशा प्रवाहित होती रही है और यहां की मिट्टी पर बड़े-बड़े कला के साधकों ने अपनी साधना से यहां की मिट्टी को काफ़ी ही समृद्ध किया। इनकी साधना की आभा अभी तक जीवित है साथ ही साथ गुरु शिष्य की परम्परा भी यहां अभी तक देखी जा सकती है। इतना ही नहीं इस मिट्टी से निकले सभी साधकों की लोकप्रियता राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय तक फैली है। शास्त्रीय संगीत और नृत्य में आरा को छोटकी बनारस कहे जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इतना ही नहीं वर्तमान समय में आरा के कथक गुरु बक्शी विकास ने आरा की सांस्कृतिक सुगंध को कई देशों में जाकर बिखेरने का कार्य किया है, साथ ही साथ अपने शिष्यों को भी ऐसी तालीम दी है जिससे सभी आरा की सुगंध को बिखेरने में अग्रणी हैं।

कंठ संगीत के सुकोमल शिल्पकार कलाकार स्व० अखौरी नागेन्द्र नारायण सिन्हा

कला एवं संगीत जगत में एक विख्यात नाम स्व० अखौरी नागेन्द्र नारायण सिन्हा भी है। इनका जन्म 21 मार्च 1934 ई0 को आरा में में स्व० अखौरी हरेंद्र नारायण सिन्हा के घर में हुआ जो जाने माने वकील थे। इनका पैतृक घर भोजपुर के धमार गावं में हैं । इनके पिता कभी नहीं चाहते थे की नंदन जी संगीत के क्षेत्र में कैरियर बनाये, किन्तु संगीत उस नदी के समान है जिसके बहाव को कोई रोक नहीं सकता और इस धारा के मुख्य सूत्राधार इनके दादा स्व० ब्रह्मदेव बाबू थे। ये सितार वादन के बड़े ही शौकीन थे एवं इनकी पहचान उस ज़माने में सम्मानित कला प्रेमियो में थी।
नंदन जी ने कंठ संगीत की प्रारंभिक शिक्षा स्व० तसद्दुक हुसैन के शिष्य पंडित सकलदीप लाल जी से प्राप्त की , इसके बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में संगीत की शिक्षा-दीक्षा पंडित ओमकार नाथ ठाकुर एवं पटियाला घराना के पंडित कुंदन लाल शर्मा से प्राप्त किया । कुछ वर्ष तक नन्दन जी ने उस्ताद बड़े गुलाम अली से भी संगीत की शिक्षा ली। इन्होंने गन्धर्व महाविद्यालय, पुणे से संगीतालंकार व प्रयाग संगीत समिति , इलाहबाद द्वारा संगीत प्रवीण की उपाधि हासिल की । इन्होनें अपनी पढ़ाई – लिखाई इलाहबाद विश्वविद्यालय तथा पटना विश्वविद्यालय से पूरी की।

ध्रुवपद( ध्रुपद ) धमार की दीक्षा होते हुए भी नंदन जी की गायकी मूलतः ख़्याल शैली की थी। वही पटियाला घराने की शिक्षा से इन्होंने ठुमरी पर विशेष पकड़ बनाई थी। इनकी गायकी में मीड, मुर्की का अंदाज व चमत्कारिक बोलतान व तैयारी असाधारण व अद्भुत हुआ करती थी, तो वही भजन व ग़ज़ल के स्वरों की मधुरता इनके गले से रस की भांति टपकती थी । हार्मोनियम पर अंगुलियों की तैयारी का जवाब न था । लिहाजा प्रस्तुति की रंजकता अद्वितीय होती थी। राग-मालकौंश, भोपाली,दरबारी, जयजयवंती ठुमरी “का करूँ सजनी आये न बालम ” भजन ” चलो मन गंगा यमुना तीर” की प्रस्तुति तो जीवंत हो उठती थी जिसकी चर्चा कई मशहूर पत्र-पत्रिकाओ में हुई । इनको सुने हुए लोग कहते है की आँख बंद हो और सिर्फ स्वर सुने जाये तो इनकी गायकी पर पूर्ण रूप से पंडित ओमकार नाथ ठाकुर की छाप दिखाई देती थी किन्तु प्रस्तुतीकरण के माध्यम से इन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई जिसकी सुगंध पूरे भारत में फैली । इनको संगीत शिरोमणि की उपाधि से नवाज गया । 30 नवम्बर 2001 को बनारस में नंदन जी का निधन हो गया l

         प्रस्तुतियां (प्रमुख ) - प्रयाग  संगीत समिति संगीत सम्मलेन (1955), प्रयाग विश्वविद्यालय संगीत सम्मलेन (1956),उदयपुर , राजस्थान के  महाराजा कुम्भ संगीत समारोह(1962), दिल्ली  के  पंडित विष्णु दिगंबर जयंती संगीत समारोह(21अगस्त 1962)  अलीगढ़   संगीत सम्मलेन (1963), दिल्ली विश्वविद्यालय संगीत सम्मलेन (1966) आदि देश के प्रमुख संगीत सम्मेलनों के अलावे इलाहबाद , लखनऊ जालंधर , दिल्ली तथा कोलकात्ता के  अखिल भारतीय आकाशवाणी केंद्र में  इन्होंने अपने गायन की कई सफल प्रस्तुति दी । जहाँ इन्हें कई पुरस्कार व सम्मान  भी प्राप्त  हुए ।

आरा से सावन कुमार की रिपोर्ट

          

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